नई दिल्ली। ईरान के खिलाफ जंग में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अकेले पड़ गए हैं। यूरोप के सहयोगी देशों ने उनको अकेला छोड़ दिया है। ट्रंप ने होरमुज की खाड़ी खुलवाने के लिए नाटो और यूरोपीय देशों से मदद मांगी थी। लेकिन यूरोप के लगभग सभी देशों ने इस मामले में किसी भी तरह की मदद देने से इनकार कर दिया है। जर्मनी ने तो यहां तक कहा है कि यह यूरोप की जंग नहीं है। ब्रिटेन, फ्रांस से लेकर इटली और स्पेन तक सबने मना किया है और अब यूरोपीय संघ ने भी आगे बढ़ कर कह दिया है कि उसका कोई सैनिक इस जंग में किसी रूप में हिस्सा लेने नहीं जा रहा है।
गौरतलब है कि एक दिन पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने चेतावनी देने के अंदाज में कहा था कि अगर नाटो देश होरमुज की खाड़ी को फिर से खोलने में मदद नहीं करते हैं, तो नाटो का भविष्य खराब हो सकता है। इस पर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने कहा कि उनका देश इस बड़े युद्ध में नहीं फंसेगा। उन्होंने माना कि होरमुज की खाड़ी को फिर से खोलना जरूरी है ताकि तेल बाजार स्थिर रहे, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि ये आसान काम नहीं है। स्टार्मर ने यह भी कहा कि कोई भी कदम ज्यादा से ज्यादा देशों की सहमति से ही उठाया जाएगा।
ब्रिटिश मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक जर्मनी ने भी किसी सैन्य कार्रवाई में हिस्सा लेने से मना कर दिया है। जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने कहा कि इस मामले में कभी कोई फैसला नहीं हुआ, इसलिए जर्मनी के सैन्य योगदान का सवाल ही नहीं उठता। जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने भी अमेरिका पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि यह यूरोप का युद्ध नहीं है और जब अमेरिकी नौसेना खुद इतनी ताकतवर है, तो कुछ यूरोपीय जहाज क्या कर लेंगे।
उधर इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी ने कहा कि इस संकट का हल बातचीत से ही निकलना चाहिए और उनका देश किसी नौसैनिक मिशन को बढ़ाने के पक्ष में नहीं है। ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और जापान ने भी साफ कर दिया है कि वे अपने युद्धपोत नहीं भेजेंगे। दूसरी ओर, ट्रंप लगातार दबाव बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि जिन देशों को इस समुद्री रास्ते से फायदा होता है, उन्हें इसकी सुरक्षा में हिस्सा लेना चाहिए। ट्रंप ने खासतौर पर ब्रिटेन से नाराजगी भी जताई।
इस बीच यूरोपीय संघ के विदेश मंत्रियों ने भी अपने लाल सागर मिशन को होरमुज की खाड़ी तक बढ़ाने से इनकार कर दिया है। यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा कालास ने कहा कि फिलहाल मिशन का दायरा बढ़ाने की कोई इच्छा नजर नहीं आती। यूरोपीय देश अमेरिका और इजराइल के युद्ध के मकसद को लेकर भी स्पष्टता चाहते हैं। एक और यूरोपीय देश एस्टोनिया के विदेश मंत्री ने कहा कि उन्हें समझना है कि ट्रंप की रणनीति क्या है और आगे की योजना क्या होगी।
