अवसरहीनता से जूझ रही नई पीढ़ी ‘अतीत के गौरव की वापसी’, ‘विकसित भारत’, या ‘विश्व गुरु’ जैसी कहानियों से प्रभावित नहीं है। वह मोदी सरकार से उसके 12 साल के कार्यकाल का हिसाब मांग रही है।
एक मंत्री को इस्तीफा देने पर मजबूर करने की कॉकरोच आंदोलन की सफलता से जनमत के एक हिस्से में “लोकतंत्र के जिंदा होने” का बना अहसास यही बताता है कि हालिया वर्षों में “लोकतंत्र की स्थिति” लेकर इस दायरे में कितनी मायूसी छायी रही है। यह भावना जवाबदेही तय करने वाली संस्थाओं के पंगु होने और लोकतांत्रिक अधिकारों के सिकुड़ते जाने की धारणा से पैदा हुई है। कॉकरोच आंदोलन दरअसल, इन सबसे ही गहराती हताशा एवं बढ़ते आक्रोश की सामूहिक अभिव्यक्ति का जरिया बना।
इस दौरान दिखी खासकर युवा वर्ग की उत्साही भागीदारी एवं जोश भरी प्रतिक्रियाओं ने कुछ ठोस संकेत दिए। मसलन, यह कि हवाई कथानकों के जरिए जमीनी नाकामियों को छिपाने में सत्ता पक्ष को मिली कामयाबियों का दौर अब ठहर चुका है। अवसरहीनता और अंधकारमय भविष्य से जूझ रही नई पीढ़ी ‘अतीत के गौरव की वापसी’, ‘विकसित भारत’, या ‘विश्व गुरु’ जैसी कहानियों से प्रभावित नहीं है। वह नरेंद्र मोदी सरकार से उसके 12 साल के कार्यकाल का हिसाब मांग रही है। इस अर्थ में कहा जा सकता है कि नैरेटिव कंट्रोल की मोदी की क्षमता पहली बार चूकती नज़र आई। मध्य एवं उच्च मध्यम वर्ग से आए पढ़े-लिखे एवं नई संचार तकनीक के इस्तेमाल में माहिर नौजवानों ने जो किताबों में पढ़ा और सरकारी प्रचार-तंत्र से सुना, उसका परीक्षण वे हकीकत के बरक्स कर रहे हैं।
इससे लोकतांत्रिक पहल का नया दरवाजा खुला है। लेकिन हमें सचेत रहना चाहिए कि अक्सर स्वतःस्फूर्त, असंगठित, एवं नेतृत्व-विहीन आंदोलन ऐसा अवसर पैदा करने के बाद बिखराव का शिकार हो जाते हैं। ऐसे अवसरों का लाभ उठाने का दायित्व संगठित राजनीतिक दलों पर होता है। फिलहाल, इस बिंदु पर आशाजनक संकेत नहीं हैं। इसलिए कि नई पीढ़ी के आंदोलन से उपजी संभावना को उम्मीद जगाने वाले जिस एजेंडे से राजनीतिक पूंजी में तब्दील किया जा सकता है, भाजपा विरोधी दलों में वैसा करने की क्षमता या जज्बे का अभाव नजर आता है। अतः इस आंदोलन से मोदी की आभा भले धुंधली हो गई हो, लेकिन संभव है कि सत्ता तंत्र पर उनकी पकड़ कमजोर करने का रास्ता अभी भी दुरूह बना हुआ हो।
