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कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन को सुप्रीम कोर्ट से लगा झटका, याचिका खारिज

मध्य प्रदेश से कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र रद्द किए जाने के मामले पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस अतुल एस चंदूरकर की बेंच में सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट से मीनाक्षी नटराजन को राहत नहीं मिली। सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी याचिका खारिज कर दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता इलेक्शन पिटीशन हाईकोर्ट मे दाखिल कर सकते हैं। 

मीनाक्षी नटराजन की तरफ से वकील अभिषेक मनु सिंघवी पेश हुए। उन्होंने दलील देते हुए कहा कि एक प्राईवेट शिकायत पर नोटिस हुआ है। जस्टिस प्रशांत मिश्रा ने कहा कि मजिस्ट्रेट कोर्ट ने प्रथमदृष्टया शिकायत में कुछ वजन देखने के बाद ही समन किया होगा।

अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि ये एक निजी शिकायत है। जिसमें संज्ञान नहीं लिया गया है। आरपी एक्ट का कानून कहता है कि कम से कम आरोप तय होने चाहिए। लेकिन इस मामले में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है।

सिंघवी ने कहा कि अगर रिटर्निंग ऑफिसर मनमाने ढंग से काम करता जिससे किसी एक पार्टी को फायदा होता है, तो उसमें कोर्ट दखल दे सकता है।

सिंघवी ने कहा कि कानून में साफ है जब तक आरोप तय न हो, तब तक नामांकन पत्र में घोषणा करना जरूरी नहीं है। उन्होंने कहा कि जिस शिकायत में मीनाक्षी नटराजन का जिक्र है और घटना का जो समय बताया गया है, उस वक्त मीनाक्षी नटराजन तेलंगाना की प्रभारी नहीं थीं; ये उनके अप्वाइंट होने के 3 साल पहले की बात है।

सिंघवी ने कहा कि इस मामले में कोई आरोप तय नहीं हुआ है, तो इसकी जानकारी उन्हें क्यों देनी चाहिए? अगर कोई क्रिमिनल केस पेंडिंग है, तो वह कैंडिडेट के तौर पर बताएंगी। हम लोग केंद्रीय चुनाव आयोग भी गए थे, एक घंटे तक बहस की और आयोग इस मामले पर चुप है, यह निंदनीय है।

सिंघवी ने दलील में कहा कि कल मुझे अदालत में नहीं सुना गया। इसका नतीजा ये हुआ कि कोई चुनाव नहीं हुआ और दूसरा प्रत्याशी निर्विरोध चुनाव जीत गया। उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण में ये साफ हुआ था कि चुनाव के लिए लेवल प्लेइंग फील्ड होना चाहिए।

सिंघवी की ओर से कहा गया कि इस चुनाव में चुनावी प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने की जगह उसे खत्म किया गया।

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जस्टिस मिश्रा ने कहा कि हमें कोई ऐसा जजमेंट दिखाइए, जिसमे हमने आरओ द्वारा रिजेक्ट किए जाने के बाद नॉमिनेशन स्वीकार करके मामलों में दखल दिया है, जहां पार्लियामेंट्री या लेजिस्लेटिव इलेक्शन में नॉमिनेशन के बाद हमने आरओ के ऑर्डर को खारिज किया हो।

जस्टिस मिश्रा ने कहा कि कोर्ट बार-बार कहता रहा है कि अगर एक बार नॉमिनेशन रद्द हो जाए, सही या गलत, तो इलेक्शन पिटीशन ही एकमात्र रास्ता है।

सिंघवी ने कहा कि यहां आरओ ने 2+2 को 6 बता दिया। कानून के खिलाफ जाकर रिटर्निंग ने फैसला लिया।

उन्होंने कहा कि मीनाक्षी नटराजन को चुनाव तक लड़ने नहीं दिया गया, लड़ कर हारती या जीतती उससे तय होता। इसपर चुनाव आयोग की चुप्पी हैरान कर देने वाली है।

सिंघवी की ओर से कहा गया, “कल कोई चुनाव नहीं हुआ, बल्कि एकतरफा नतीजे घोषित कर दिए गए। आरओ की जिम्मेदारी कानून का पालन करना था। जो फैसला दिया गया, उसके हिसाब से आरओ का फैसला पलटना ही नहीं चाहिए, बल्कि उसे पद से हटा देना चाहिए।

चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता का कहना है कि आरओ ने ऑर्डर पास किया और हम चुनाव आयोग के पास गए और उन्होंने दखल नहीं दिया। आरपी एक्ट की धारा 100(1सी) में कहा गया है कि यह एक ऐसा मामला है, जिस पर हाई कोर्ट में इलेक्शन पिटीशन के जरिए सुनवाई होनी चाहिए।

चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि हमने समय से पहले रिजल्ट घोषित कर दिया है, लेकिन आरपी एक्ट का सेक्शन 53 (चुनाव लड़े और बिना लड़े चुनाव में प्रोसेस) सब-सेक्शन 3 में कहा गया है कि अगर ऐसे कैंडिडेट की संख्या सीटों से कम है, तो चुनाव आयोग तुरंत रिजल्ट घोषित करेगा।

प्रत्याशी महेश केवट के वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि 2018 के संशोधन के बाद से ये साफ है कि हर तरह के पेंडिंग केस बताना जरूरी है, चाहे संज्ञान हुआ है या नहीं।

रोहतगी ने कहा कि आर्टिकल 32 या 226 के तहत ये याचिका सुनवाई लायक नहीं है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता के किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं हुआ है। चुनावी याचिका लगाना मौलिक अधिकार नहीं है, बल्कि कानूनी अधिकार है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने ज्योति बसु जजमेंट में साफ किया था।

सिंघवी ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के दलीलें रखने पर विरोध किया। क्योंकि केंद्र सरकार इसमें पक्षकार नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहले हम यह तय करेंगे कि याचिका मेंटेनेबल है या नहीं।

Pic Credit : ANI

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