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क्रीमी लेयर के आरक्षण पर अदालत नाराज

New Delhi, May 14 (ANI): A general view of the Supreme Court of India, in New Delhi on Wednesday. (ANI Photo/Ishant)

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने क्रीम लेयर के अभ्यर्थियों के आरक्षण का लाभ लेने पर गंभीर सवाल उठाया है। सर्वोच्च अदालत ने शुक्रवार को एक मामले की सुनवाई करते हुए इस पर चिंता जताई। अदालत ने सवालिया लहजे में कहा, ‘अगर माता, पिता दोनों आईएएस अधिकारी हैं, तो उनके बच्चों को आरक्षण क्यों मिलना चाहिए’? अदालत ने इस मामले में कुछ संतुलन बनाने की जरुरत बताई।

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइंया की बेंच ने यह भी कहा कि शिक्षा और आर्थिक सशक्तीकरण के साथ साथ सामाजिक गतिशीलता भी आती है। ऐसे में अगर संपन्न बच्चों के लिए फिर से आरक्षण मांगा जाए, तो हम कभी भी इस चक्र से बाहर नहीं निकल पाएंगे। जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस भुइयां की बेंच कर्नाटक हाई कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रहे थी। याचिकाकर्ता को क्रीमी लेयर के आधार पर आरक्षण के दायरे से बाहर रखा गया था, क्योंकि उसके माता, पिता दोनों ही राज्य सरकार के कर्मचारी हैं।

मामला कर्नाटक की कुरुबा जाति से जुड़े एक व्यक्ति है, जिसका चयन ‘कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन लिमिटेड’ में ‘सहायक इंजीनियर’ के पद पर हुआ था। उसकी आरक्षित कोटे के तहत नियुक्ति की गई थी। हालांकि, ‘जिला जाति और आय सत्यापन समिति’ ने उम्मीदवार को ‘जाति प्रमाण पत्र’ देने से इनकार कर दिया और कहा कि वह ‘क्रीमी लेयर’ के दायरे में आता है। उम्मीदवार के परिवार की सालाना आमदनी लगभग ₹19.48 लाख आंकी गई थी।

नियम के मुताबिक अन्य पिछड़ी जाति यानी ओबीसी आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ की मौजूदा आय सीमा सालाना आठ लाख रुपए है। इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा कि जिन परिवारों ने सामाजिक और आर्थिक रूप से तरक्की कर ली है, उन्हें भी आरक्षण के फायदे मिलते जा रहे हैं। अदालत ने यह भी कहा कि उच्च शिक्षा और बेहतर आर्थिक स्थिति के साथ साथ सामाजिक रुतबे में भी सुधार आता है। इसके बाद बेंच ने कहा कि सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए आरक्षण ठीक है लेकिन सबको नहीं दिया जा सकता। इसमें कुछ संतुलन होना चाहिए।

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