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सबरीमाला पर तीसरे दिन भी हुई सुनवाई

New Delhi, May 22 (ANI): A view of the Supreme Court of India, in New Delhi on Thursday. (ANI Photo/Rahul Singh)

नई दिल्ली। केरल के सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर गुरुवार को लगातार तीसरे दिन भी सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ जजों की संविधान बेंच ने सुनवाई के दौरान सरकार के सामने कई अहम मुद्दे उठाए। सुनवाई के दौरान मंदिरों के रीति रिवाजों का जिक्र हुआ और जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि मंदिरों में सिर्फ खास समुदाय की एंट्री और बाहरी लोगों की मनाही से समाज बंटेगा। यह हिंदु धर्म के लिए ठीक नहीं है।

जस्टिस नागरत्ना ने उदाहरण देते हुए कहा, ‘मान लीजिए, अगर यह कहा जाए कि सिर्फ गौड़ सारस्वत लोग ही एक मंदिर में आएं या कांची मठ के लोग सिर्फ कांची ही जाएं, दूसरे मठ न जाएं तो यह ठीक नहीं होगा। बल्कि जितने ज्यादा लोग अलग अलग मंदिरों और मठों में जाएंगे, उतना ही धर्म मजबूत बनेगा’। इससे पहले भी जस्टिस नागरत्ना ने संविधान के अनुच्छेद 17 के हवाले यह पूछा था कि यह कैसे हो सकता है कि महिलाओं को हर महीने तीन दिन के लिए अछूत बना दिया जाए। सुनवाई में विभिन्न धर्मों में प्रचलित धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और दायरे पर भी विचार किया जा रहा है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 17 छुआछूत खत्म करता है। छुआछूत न सिर्फ कानून के तहत अपराध है, बल्कि संविधान भी इसे अपराध घोषित करता है। यह कानूनी ही नहीं, संवैधानिक स्तर पर भी गंभीर मामला है। अदालत ने आगे कहा कि अगर सरकार सामाजिक सुधार के लिए कानून बनाती है और उसका असर धार्मिक प्रथाओं पर पड़ता है, तो उसका असर अनुच्छेद 26 पर भी पड़ेगा। गौरतलब है कि अनुच्छेद 26 धार्मिक संस्थाओं के अधिकार की गारंटी करता है।

इस पर सरकार की ओर से कहा गया कि अगर सिर्फ अनुच्छेद 26 (बी) के आधार पर देखें, तो मंदिर में प्रवेश से जुड़ा कानून गलत हो सकता है। धार्मिक संस्था को यह अधिकार है कि कौन मंदिर में आएगा, यह वह खुद तय करे। अगर प्रवेश या पूजा धार्मिक नियमों से तय होता है, तो यह धर्म का हिस्सा है। जबरन एंट्री कराने वाला कानून इस अधिकार का उल्लंघन है।

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