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ज़ुबान पर ना जाइए!

अमेरिका के हालिया व्यवहार को ध्यान में रखें, तो ट्रंप का यह कहना कि जब तक नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं, हमला होने पर अमेरिका भारत की मदद के लिए खड़ा होगा, मज़ाक जैसा महसूस हुआ है!

नरेंद्र मोदी से डॉनल्ड ट्रंप की मुलाकात से कुछ घंटे पहले ही अमेरिकी युद्ध मंत्रालय ने अपने इंडो-पैसिफिक कमांड के नाम से ‘इंडो’ शब्द हटा दिया। अब उसे यूएस पैसिफिक कमांड के पुराने नाम से जाना जाएगा। 2018 में ट्रंप-1 प्रशासन ने जब इंडो-पैसिफिक नाम रखा, तब तत्कालीन अमेरिकी रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने कहा था- ‘हमें हिंद महासागर, भारतीय उपमहाद्वीप, और निश्चित रूप से खुद भारत के बढ़ रहे महत्त्व को समझने की जरूरत है। इसलिए मैं सुनिश्चित करना चाहता हूं नाम यथार्थ को प्रतिबिंबित करे।’

ट्रंप-2 प्रशासन की निगाह में वो “यथार्थ” बदल गया है- यह उसके नए राष्ट्रीय सुरक्षा दस्तावेज से जाहिर हो गया था, जिसमें भारत का उल्लेख संदर्भवश हुआ। ट्रंप के व्यवहार और उनके प्रशासन के कदमों का सार भी यही है कि उनकी रणनीतिक सोच में भारत की पहले जैसी अहमियत नहीं रही। आठ साल पहले चीन को घेरना और उसका उदय रोकना अमेरिका की प्राथमिकता बनी थी। ट्रंप-2 प्रशासन का आकलन है कि चीन महाशक्ति बन चुका है और अब चुनौती उसके साथ तालमेल बनाकर टकराव टालने की है। इसीलिए अपनी बीजिंग यात्रा के दौरान ट्रंप ‘रणनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करने वाले रचनात्मक संबंध’ के चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के प्रस्ताव पर सहमत हो गए।

चीन के राष्ट्रपति से अपनी मुलाकात को उन्होंने जी-2 कहना शुरू किया है। जी-7 शिखर बैठक के मौके पर फ्रांस के एवियन में हुई प्रेस कांफ्रेंस के दौरान मोदी की मौजूदगी में उन्होंने सितंबर में तय “जी-2 बैठक” का जिक्र किया। तो यह साफ है कि अमेरिकी रणनीति में भारत का महत्त्व चीन को घेरने की उसकी प्राथमिकता के तहत बढ़ा था। अब चूंकि प्राथमिकता बदल गई है, तो क्वॉड जैसे समूह या इंडो-पैसिफिक जैसे फ़ौरी जरूरत के हिसाब से अपनाए गए नाम उसके लिए अप्रासंगिक हो गए हैँ। अब उसकी प्राथमिकता है भारत से अधिकतम कीमत वसूलना। ऐसे में मोदी से मुलाकात के दौरान ट्रंप का प्रधानमंत्री को “सबसे खूबसूरत व्यक्ति” और “कातिलाना शख्स” कहना या यह कहना कि जब तक मोदी प्रधानमंत्री हैं, हमला होने पर अमेरिका भारत की मदद के लिए खड़ा होगा, मज़ाक के जैसा महसूस हुआ है!

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