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सबरीमाला मंदिर ने महिलाओं की एंट्री का विरोध किया

New Delhi, May 22 (ANI): A view of the Supreme Court of India, in New Delhi on Thursday. (ANI Photo/Rahul Singh)

नई दिल्ली। सबरीमाला मंदिर में हर उम्र की महिलाओं के प्रवेश के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मंदिर प्रशासन ने विरोध किया है। सर्वोच्च अदालत की नौ जजों की संविधान बेंच इस मामले में पहले दिए गए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। बुधवार को चौथे दिन इस मामले में सुनवाई हुई। इस दौरान मंदिर का प्रबंधन संभालने वाले त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड यानी टीडीबी ने कहा कि यह खिलौने की दुकान या रेस्टोरेंट का मामला नहीं है। यह आजन्म ब्रह्मचारी माने जाने वाले देवता का मंदिर है।

मंदिर प्रबंधन का पक्ष रखते हुए सीनियर एडवोकेट अभिषेक सिंघवी ने कहा, ‘10 से 50 साल के उम्र की महिलाएं देवता के स्वरूप और पहचान के विपरीत हैं। भारत में अयप्पा के करीब एक हजार मंदिर हैं। अगर महिलाओं को दर्शन करना है, तो वहां जाएं। उन्हें इसी खास मंदिर में क्यों आना है’। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि करोड़ों लोगों की आस्था को गलत ठहराना सबसे मुश्किल कामों में से एक है। साथ ही यह भी कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता।

गौरतलब है कि केरल हाई कोर्ट ने 1991 में सबरीमाला में 10 से 50 साल की महिलाओं की एंट्री पर पाबंदी लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इसे भेदभावपूर्ण बताते हुए पाबंदी हटा दी। इस फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं। सुप्रीम कोर्ट में दायर 50 से अधिक याचिकाओं के आधार पर सात महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों पर बहस हो रही है। सबसे पहले केंद्र सरकार ने अपना पक्ष रखा और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को गलत ठहराया। सरकार ने कहा कि मंदिर की परंपरा के मुताबिक महिलाओं को प्रवेश नहीं दिया जाना चाहिए।

बहरहाल, बुधवार को अभिषेक सिंघवी ने कहा कि धार्मिक मामलों में जनहित याचिका से बचना चाहिए। इससे बाहरी लोग परंपराओं में दखल देने लगते हैं। कोर्ट ने भी यह सवाल पूछा कि क्या कोई भी व्यक्ति आस्था से जुड़े नियमों को चुनौती दे सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि सामाजिक सुधार जरूरी है, लेकिन इसके नाम पर धर्म को कमजोर नहीं किया जा सकता। जजों ने स्पष्ट किया कि सुधार और धार्मिक मान्यता के बीच संतुलन जरूरी है।

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