नई दिल्ली। केरल के सबरीमाला मंदिर में हर उम्र की महिलाओं के प्रवेश के मामले में बुधवार को सुनवाई पूरी हो जाएगा। फैसले का ऐलान बुधवार को ही हो जाएगा या नौ जजों की संविधान पीठ फैसले सुरक्षित रखेगी, यह स्पष्ट नहीं है। इससे पहले मंगलवार, 21 अप्रैल को सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कई अहम सवाल उठाए। अदालत ने पूछा, ‘मूर्ति छूना ईश्वर का अपमान कैसे हो सकता है और वे अपवित्र कैसे हो जाते हैं’? सुप्रीम कोर्ट ने आगे पूछा, ‘क्या संविधान उस भक्त की मदद के लिए आगे नहीं आएगा, जिसे केवल उसके वंश और जन्म के कारण देवता को छूने से रोक दिया जाता है’?
सबरीमाला मंदिर की ओर से पेश वकील एडवोकेट वी गिरी ने इस पर कहा किसी भी मंदिर में होने वाले रीति रिवाज उस धर्म का अभिन्न हिस्सा होते हैं। पूजा देवता की विशेषताओं के उलट नहीं हो सकती। भगवान अयप्पा ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ हैं, इसलिए वहां की परंपराएं उसी के अनुरूप तय की गई हैं। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में नौ जजों की संविधान पीठ सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामले पर सुनवाई कर रही है। इसके साथ धार्मिक आस्था के 66 मामले और जुड़े हैं।
गौरतलब है कि केरल हाई कोर्ट ने 1991 में सबरीमाला में मासिक धर्म वाली महिलाओं यानी 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में यह पाबंदी हटा दी। फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं लगाई गईं, जिस पर अब सुनवाई हो रही है। मंदिर प्रशासन और केंद्र सरकार दोनों महिलाओं के प्रवेश का विरोध कर रहे हैं। इस मामले पर सात अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई है। पहले केंद्र सरकार ने महिलाओं के प्रवेश के विरोध में दलीलें रखीं। सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों का प्रवेश भी प्रतिबंधित है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
