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जांच की परमिशन पर जजों का फैसला बंटा

New Delhi, May 22 (ANI): A view of the Supreme Court of India, in New Delhi on Thursday. (ANI Photo/Rahul Singh)

नई दिल्ली। भ्रष्टाचार के मामले में सरकारी कर्मचारियों की जांच के लिए पहले अनुमति लेने की अनिवार्यता पर सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने बंटा हुआ फैसला सुनाया है। जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा है कि सरकारी कर्मचारी के खिलाफ किसी भी जांच के लिए पहले से अनुमति लेना अनिवार्य नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह प्रावधान करने वाले भ्रष्टाचार निरोधक कानून यानी पीसी एक्ट की धारा 17ए असंवैधानिक है। हालांकि जस्टिस केवी विश्वनाथन ने इससे असहमति जताई। उन्होंने कहा कि जांच की मंजूरी लेने की अनिवार्यता होनी चाहिए।

जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस विश्वनाथन की बेंच ने एक गैर सरकारी संगठन की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई की थी। इस याचिका में पीसी एक्ट की धारा 17ए की संवैधानिकता को चुनौती दी गई थी। सुनवाई के बाद जस्टिस नागरत्ना ने कहा, ‘धारा 17ए असंवैधानिक है। किसी भी जांच के लिए पहले परमिशन लेना जरूरी नहीं’। वहीं, जस्टिस विश्वानाथन ने कहा, “धारा 17ए संवैधानिक रूप से वैध है। इस प्रावधान को खत्म करने मतलब ‘नहाने के पानी के साथ बच्चे को फेंकने’ जैसा होगा”।

जस्टिस विश्वनाथन ने यह भी कहा कि सरकारी कर्मचारियों की जांच की लोकपाल या राज्य लोकायुक्त के जरिए तय की जाए। जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस विश्वनाथन की अलग अलग राय के चलते अब मामला चीफ जस्टिस सूर्यकांत के पास भेजा गया है। चीफ जस्टिस इस मुद्दे पर सुनवाई के लिए बड़ी बेंच गठित करेंगे, जो अंतिम फैसला देगी। सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन की ओर से यह याचिका दायर की गई है। याचिकाकर्ता की ओर से प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट ने दलील दी और कहा कि यह प्रावधान भ्रष्टाचार विरोधी कानून को कमजोर करता है, क्योंकि सरकार से अक्सर जांच की मंजूरी नहीं मिलती।

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