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चंद देश एजेंडा नहीं थोप सकते: जयशंकर

संयुक्त राष्ट्र संघ (न्यूयॉर्क)। संयुक्त राष्ट्र महासभा में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने दुनिया की महाशक्तियों को दो टूक संदेश दिया। उन्होंने कहा कि दुनिया बदल रही है और अब वह समय नहीं रहा, जब चंद देश दुनिया का एजेंडा तय करते थे। उन्होंने कहा कि अब सबको सुनना होगा। विदेश मंत्री जयशंकर ने यह भी कहा कि दुनिया में जो तनाव है उसे बातचीत और कूटनीति के जरिए कम किया जाएगा। उन्होंने कनाडा के साथ चल रही तनातनी का जिक्र किए बगैर कहा कि राजनीति के लिए आतंकवाद को बढ़ावा देना ठीक नहीं है।

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र संघ की जनरल असेंबली को संबोधित किया और इस दौरान उन्होंने कहा कि दुनिया चुनौतीपूर्ण वक्त से गुजर रही है। उन्होंने भारत की जी-20 शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता की तारीफ करते हुए कहा- हमारी पहल से अफ्रीकी संघ इस संगठन का हिस्सा बना। ऐसा करके हमने पूरे महाद्वीप को एक आवाज दी, जो काफी समय से इसका हकदार रहा है। कनाडा का नाम लिए बगैर जयशंकर ने कहा- राजनीतिक सहूलियत के मुताबिक आतंकवाद, चरमपंथ और हिंसा पर एक्शन नहीं लेना चाहिए। सहूलियत के हिसाब से क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं हो सकता है।

गौरतलब है कि न्यूयॉर्क में 13 सितंबर से संयुक्त राष्ट्र महासभा यानी यूएनजीए की बैठक चल रही है, जिसमें सभी सदस्य देश अपनी बात रख रहे हैं। यूएनजीए की 77वीं बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जगह एस जयशंकर भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बदलावों की भारत की मांग को दुनिया के सामने दोहराया है। गौरतलब है कि जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री ने भी संयुक्त राष्ट्र में सुधार का मुद्दा उठाया था।

बहरहाल, विदेश मंत्री ने मंगलवार को कहा- समय बदल रहा है, अब दूसरे देशों की बात सुननी होगी। चंद देशों का एजेंडा दुनिया पर नहीं थोपा जा सकता है। इससे पहले जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस से भी मुलाकात की थी। अपने भाषण उन्होंने कहा- विश्व उथल-पुथल का असाधारण दौर देख रहा है। भारत के ‘वन अर्थ वन फैमिली वन फ्यूचर’ विजन में केवल कुछ लोगों के छोटे फायदे नहीं, बल्कि अनेक लोगों की चिंताए शामिल हैं।

उन्होंने कहा- वे दिन खत्म हो गए जब कुछ देश एजेंडा तय करते थे और उम्मीद करते थे कि दूसरे भी उनके साथ आ जाएंगे। गुटनिरपेक्षता के युग से, अब हम विश्व मित्र के युग में पहुंच गए हैं। जब हम लीडिंग पावर बनने की आकांक्षा रखते हैं, यह आत्मप्रशंसा के लिए नहीं, बल्कि बड़ी जिम्मेदारी लेने, योगदान देने के लिए है।

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