nayaindia Flights trains delayed as dense fog यात्री विमान का या ट्रेन का, सबकी औकात मवेशी क्लास!
नब्ज पर हाथ

यात्री विमान का या ट्रेन का, सबकी औकात मवेशी क्लास!

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देश में हाहाकार मचा है। राजधानी दिल्ली से लेकर वित्तीय राजधानी मुंबई तक यात्री विमान 12-12 घंटे की देरी से उड़ रहे हैं। यात्री घंटों हवाईअड्डे पर और विमान के अंदर और यहां तक कि एयरोब्रिज पर अटके रह रहे हैं। हिंदी फिल्मों को एक सफल अभिनेत्री राधिका आप्टे ने ट्विट करके बताया कि वे मुंबई से भुवनेश्वर जाने वाली उड़ान में कई घंटे एयरोब्रिज पर फंसी रहीं। मतलब विमानन कंपनी वालों ने बोर्डिंग करा दी और यात्रियों को अंदर भेज दिया लेकिन एयरोब्रिज के दूसरे सिरे पर जहाज आकर नहीं लगा। सो, यात्री न जहाज में जा सके थे और न वापस हवाईअड्डे पर लौट सके। इसी तरह कांग्रेस के एक नेता ने ट्विट करके बताया कि मुंबई से गुवाहाटी जाने वाली उनकी उड़ान तीन घंटे की देरी से उड़ी और उसके बाद 12 घंटे में गुवाहाटी पहुंची। इस बीच उनके जहाज को बांग्लादेश की राजधानी ढाका डायवर्ट किया गया था, जहां करीब सात घंटे लोग जहाज के अंदर ही बैठे रहे थे। गोवा से दिल्ली जाने वाले एक जहाज को 17 घंटे की देरी के बाद मुंबई भेज दिया गया, जहां भूख से बिलबिला रहे यात्रियों को विमानन कंपनी के लोगों ने रनवे पर बैठा कर खाना खिलाया। इसके लिए कंपनी को नोटिस भी जारी किया गया है। इसके बाद दिल्ली से गोवा जाने वाले एक विमान के यात्री ने तो 13 घंटे की देरी से नाराज होकर पायलट को थप्पड़ मार दिया। ये सब पिछले एक हफ्ते की खबरें हैं।

कहा जा रहा है कि घने कोहरा की वजह से उड़ान में देरी हो रही है। सवाल है कि क्या इन सबके लिए सिर्फ कोहरा जिम्मेदार है? नहीं! कोहरा सिर्फ एक बहाना है। इसके लिए सिर्फ यह मानसिकता जिम्मेदार है कि भारत के नागरिक भेड़-बकरी होते हैं। उनका कोई अधिकार नहीं होता है। उनकी कोई हैसियत नहीं होती है। शशि थरूर ने इकोनॉमी क्लास में बैठने को वालों कैटल क्लास यानी मवेशी क्लास का नागरिक बताया था लेकिन क्या सिर्फ इकोनॉमी क्लास वाले ही भेड़-बकरी हैं? क्या 12 घंटे या 17 घंटे की देरी बिजनेस क्लास वालों को नहीं भुगतनी पड़ रही है? क्या उनका विमान डायवर्ट नहीं हो रहा है? क्या बिजनेस क्लास वाले हवाईअड्डे पर बैठ कर झक्ख नहीं मार रहे हैं या घंटों एयरोब्रिज पर अटके नहीं रह रहे हैं? सबकी हालत और हैसियत एक जैसी है। एक बार जहाज में बैठने के बाद सबकी स्थिति एक जैसी हो जाती है। सब एयरलाइन कंपनी के रहमोकरम पर होते हैं। वहां किसी को अपना गुस्सा जाहिर करने की इजाजत भी नहीं होती है। वह चुपचाप असहाय होकर बैठा रहे अगर उसने गलती से गुस्सा जाहिर कर दिया तो उसको नो फ्लाई लिस्ट में डाल दिया जाएगा।

भारत में विमानन मंत्रालय को नागरिक विमानन मंत्रालय कहा जाता है। क्या विडम्बना है कि इसमें नागरिक को छोड़ कर सबका ध्यान रखा जाता है। विमानन कंपनियों के ग्राउंड स्टाफ से लेकर चालक दल तक सबसे काम करने के घंटे तय हैं। उनके अधिकार परिभाषित हैं। अगर किसी कारण से विमानों के उड़ने में देरी हो रही है तब भी चालक दल तय समय से ज्यादा काम नहीं करेगा। बिना उड़ान भरे उसकी ड्यूटी खत्म हो जाएगी और दूसरा चालक दल आगे का काम संभालेगा। लेकिन इस तरह की कोई सुविधा नागरिकों को नहीं है। उन्हें तो बताने तक की जरुरत नहीं समझी जाती है कि उनके विमान की उड़ान में किस वजह से और कितने समय की देरी हो रही है। लोग परिवार के बुजुर्गों, बच्चों और महिलाओं के साथ हवाईअड्डे पर, एयरोब्रिज पर या विमान के अंदर विमानन कंपनी के कर्मचारियों को टुकुर-टुकुर देखते रहते हैं और अपने अपने भगवान को याद करते रहते हैं कि जल्दी से जल्दी अपने गंतव्य तक पहुंचे। क्या उनकी मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना का कोई मतलब नहीं है? सचमुच सब कुछ भगवान भरोसे है।

बिल्कुल यही स्थिति ट्रेनों की है। हालांकि उनकी ज्यादा चर्चा नहीं हो रही है लेकिन हर दिन दर्जनों ट्रेनें कई कई घंटों की देरी से चल रही हैं। लोग ट्विट करके ट्रेनों के अंदर की गंदगी और खास कर शौचालय की गंदगी की तस्वीरें शेयर कर रहे हैं। लेकिन कोई सुनवाई नहीं है। वहां भी स्लीपर क्लास में बैठे व्यक्ति की हालत भी वैसी ही जैसी फर्स्ट क्लास में बैठे यात्रियों की है। सब एक जैसे मवेशी क्लास वाले हैं। वैसे भी रेलवे से कमाई बढ़ाने की सोच में सरकार ने स्लीपर क्लास के डब्बे कम कर दिए हैं और एसी क्लास के डब्बे बढ़ा दिए हैं। सो, ट्रेन में एसी क्लास में सफर करने वाले भले अपने को महत्वपूर्ण मानते हों लेकिन हैं वे भी मवेशी क्लास के ही। उनका भी हाल पूछने वाला कोई नहीं है। चाहे जनरल बोगियों में भेड़-बकरियों की तरह ठूंस कर जाने वाले यात्री हों या एसी फर्स्ट क्लास वाले सबकी हालत एक जैसी है।

सवाल है कि क्या यह इतना मुश्किल है कि हवाईजहाज या रेलवे में यात्रियों को समय से देरी की सूचना दी जा सके या देरी होने पर उनके लिए आराम से ठहरने या खाने की व्यवस्था की जा सके? अब बताया जा रहा है कि सरकार ने नियमों में बदलाव किया है और कहा है कि तीन घंटे से ज्यादा की देरी होने पर विमानन कंपनियां उड़ान को रद्द कर सकेंगी। इसके अलावा विमानन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बताया है कि छह महानगरों के हवाईअड्डों पर वॉर रूम बनाया जाएगा और दिन भर में तीन बार देरी की सूचना देनी होगी। साथ ही उन्होंने कहा कि 24 घंटे सीआईएसएफ की तैनाती सुनिश्चित की जाएगी। इसमें भी नागरिक कहां हैं? उन्होंने यह तो बताया नहीं कि देरी होने पर यात्रियों को क्या सुविधाएं मिलेंगी। उलटे 24 घंटे सीआईएसएफ तैनात करेंगे ताकि यात्री डर कर रहें और विमानन कंपनी वालों से सवाल नहीं पूछ सकें।

सोचें, यात्रियों को उड़ान से कम से कम एक घंटे पहले हवाईअड्डे पर पहुंचना होता है और तीन घंटे बाद अगर उड़ान रद्द होती है तो उनका क्या होगा? उन्हें फिर कितनी देर में दूसरी उड़ान मिलेगी और उस अवधि में उनके ठहरने, खाने की क्या व्यवस्था होगी? विमान में बैठाने के बाद देरी होने पर क्या होगा? क्या यात्रियों को विमान से उतार कर वापस हवाईअड्डे पर लाने की व्यवस्था होगी? ध्यान रहे विमानों में ज्यादा से ज्यादा यात्रियों को बैठाने के लिए सीटों के बीच की जगह बहुत कम कर दी गई है और ऊपर से हर सीट के लिए किराए के अलावा एक कीमत तय कर दी गई है। लंबे समय तक ऐसी सीटों पर बैठना लोगों के लिए मुसीबत की तरह है। ऊपर से शौचालय तीन ही होते हैं और ज्यादा देरी होने पर उनकी साफ-सफाई की कोई व्यवस्था नहीं होती है। यही हाल ट्रेनों का है। वहां भी ज्यादा यात्रियों को एडजस्ट करने के लिए सीटों की दूरी घटाई गई है और रियल टाइम में शौचालयों की सफाई की कोई व्यवस्था नहीं होती है। बरसों से कहा जा रहा है कि कोहरे में ट्रेनें समय से चलती रहें इसके लिए तकनीक आ गई है लेकिन उन तकनीकों के बावजूद ट्रेनें समय से नहीं चल रही हैं। चाहे हवाईजहाज हो ट्रेन सेवा अगर सरकार यात्रियों को नागरिक मान कर उनके अधिकारों का ख्याल रखे तो सब कुछ ठीक हो सकता है। परंतु बड़ा सवाल यह है कि भेड़-बकरियों को सरकार नागरिक क्यों मानेगी?

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By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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