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ईरान युद्ध का लक्ष्य कैसे हासिल होगा?

पुरानी कहावत है कि ‘चुनाव से पहले, युद्ध के दौरान और शिकार के बाद सबसे ज्यादा झूठ बोले जाते हैं’। सो, ईरान में युद्ध चल रहा है और झूठ की चौतरफा बौछार हो रही है। अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने पेंटागन में प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि युद्ध अमेरिका ने शुरू नहीं किया लेकिन इसे खत्म अमेरिका करेगा। हालांकि सारी दुनिया ने देखा कि अमेरिका और इजराइल ने दिन दहाड़े हमले की शुरुआत की और एक संप्रभु देश के सर्वोच्च नेता को मार डाला। दूसरी ओर अमेरिका से ही एक रिपोर्ट आई है, जिसमें कहा गया है कि पेंटागन ने कांग्रेस की समिति के सामने कहा है कि उनके पास कोई खुफिया सूचना नहीं थी कि ईरान हमला करने जा रहा है। इसका अर्थ है कि कांग्रेस के सामने पेंटागन की ओर से कुछ और कहा जा रहा है और पेंटागन के प्रमुख मीडिया के सामने कुछ और कह रहे हैं!

इसी तरह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अभी तो हमला शुरू हुआ है। उन्होंने कहा कि अमेरिका अभी सबसे बड़ा हमला करेगा और उधर पेंटागन से खबर है कि वहां के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ से लेकर तमाम रक्षा जानकार इस बात की चिंता में हैं कि अमेरिका के मिसाइल और हथियारों का भंडार तेजी से खत्म होता जा रहा है। अमेरिकी रक्षा क्षेत्र में यह चिंता इसलिए है क्योंकि जितनी तेजी से मिसाइल और दूसरे हथियार खर्च हो रहे हैं उतनी तेजी से उन्हें बनाया नहीं जा सकता है। इस चिंता का एक पहलू यह भी है कि अगर युद्ध का कोई नया मोर्चा खुला या उत्तर कोरिया और चीन की ओर से कुछ हुआ, जिसका जवाब अमेरिका को देना पड़े तो क्या होगा? लेकिन ट्रंप सबसे बड़े हमले की बात कर रहे हैं।

ऐसे ही राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि जरुरत पड़ी तो वे अमेरिकी सेना को ईरान की जमीन पर उतारेंगे। उन्होंने कहा कि वे पिछले राष्ट्रपतियों की तरह नहीं हैं, जिन्होंने हमेशा जमीनी सेना उतारने से इनकार किया। ट्रंप ने यह ऐसी बात कही है, जिस पर किसी को यकीन नहीं होगा। ईरान में जमीनी सैनिक उतारना अमेरिका के लिए बहुत मुश्किल वाला फैसला होगा। इसका कारण यह है कि ईरान में उसके पास कोई जमीनी सपोर्ट सिस्टम नहीं है। दूसरे, ईरान के पास 11 लाख से ज्यादा की संख्या वाली बहुत व्यवस्थित सेना है, जिसमें दो लाख आईआरजीसी के प्रशिक्षित कमांडो जैसे सैनिक हैं। तीसरे, ईरान नौ करोड़ से ज्यादा आबादी वाला देश है। चौथे, उसकी भोगोलिक सीमाएं बहुत विशाल हैं।

वह इजराइल से 70 गुना बड़े क्षेत्रफल वाला देश है। पांचवें, ईरान में लंबी लंबी पहाड़ों की शृंखलाएं हैं और दुर्गम क्षेत्र बहुत बड़ा है। सोचें, गाजा जैसे छोटे से इलाके में दो साल से युद्ध चल रहा है, जिसमें 70 हजार लोग मारे गए हैं फिर भी इजराइल जीत नहीं पाया है, जबकि गाजा एक ऐसा जमीन का टुकड़ा है, जो इजराइल और मेडिटेरेनियन समुद्र के बीच दबा हुआ है। जब वहां दो साल से लड़ाई खत्म नहीं हो रही है तो ईरान जैसे विशाल और बड़ी आबादी वाले देश में कैसे अमेरिका जमीन पर सैनिक उतारेगा? सो, ऐसा लग रहा है कि यह झूठ भी ईरान की फौज को डराने और लोगों को बगावत के लिए उकसाने के मकसद से बोला गया है।

बहरहाल, यह इतिहास का संभवतः पहला युद्ध होगा, जो वार्ता विफल होने की वजह से नहीं, बल्कि वार्ता सफल होने की वजह से लड़ा जा रहा है। ईरान और अमेरिका की वार्ता में मध्यस्थता कर रहे ओमान के विदेश मंत्री बदर बिन हमाद अल बुसैदी ने 28 फरवरी को कहा कि दोनों देशों के बीच वार्ता अंतिम दौर में है और समझौते का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि ईरान यह गारंटी देने को तैयार हो गया है कि वह कभी भी परमाणु बम नहीं बनाएगा। साथ ही वह इस बात के लिए भी तैयार हो गया है कि इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी यानी आईएईए की टीम उसके परमाणु ठिकानों का दौरा करके जांच कर ले। लेकिन बुसैदी के यह कहने के तुरंत बाद अमेरिका और इजराइल ने साझा हमला शुरू कर दिया। याद करें इसी तरह पिछले साल जून में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को 14 दिन का समय दिया था और तीसरे ही दिन हमला शुरू कर दिया था।

फरवरी 2026 के हमले में गोलपोस्ट कैसे बदल रहा है यह देखना भी बहुत दिलचस्प है। पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि ईरान के परमाणु ठिकानों को नष्ट करने के लिए हमला हुआ है। हालांकि यहां भी सवाल उठता है कि जब जून 2025 के हमलों के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि ईरान के परमाणु संयंत्रों को ‘ओबलिटेरेट’ कर दिया गया यानी नामोनिशान मिटा दिया गया तब फिर आठ महीने में ही परमाणु संयंत्र कैसे काम करने लगे। बहरहाल, युद्ध शुरू होने के बाद ट्रंप ने कहा कि इस्लामिक क्रांति के बाद बनी इस्लामिक रिपब्लिक की सत्ता बदलने के लक्ष्य से हमला किया गया है। यानी परमाणु ठिकानों को खत्म करना लक्ष्य नहीं है, बल्कि सत्ता बदलना लक्ष्य है।

अब पहला सवाल है कि सत्ता क्यों बदलनी है? इसका सीधा जवाब है कि अमेरिका को पश्चिम एशिया की भू राजनीतिक स्थितियों को हमेशा के लिए बदल देना है। उसे स्थिर सत्ता और सैन्य ताकत वाले इकलौते मजबूत देश ईरान को समाप्त करना है। सद्दाम हुसैन का इराक खत्म हो गया, गद्दाफी का लीबिया और असद का सीरिया भी समाप्त हो गया। अगर ईरान की इस्लामिक रिपब्लिक की सत्ता समाप्त हो जाती है तो पूरे पश्चिम एशिया में इजराइल इकलौती महाशक्ति बचेगा। ध्यान रहे अमेरिका ने पश्चिम एशिया के बाकी देशों का आर्थिक हित या तो अपने साथ जोड़ लिया है या इजराइल से जुड़वा दिया। सो, यह युद्ध एक बड़े लक्ष्य के लिए है, जिसे निश्चित रूप से इजराइल ने तय किया है।

अब दूसरा सवाल है कि सत्ता कैसे बदलेगी? हवाई हमले में नेताओं को और कुछ सैनिक कमांडरों को मारा जा सकता है या इमारतें ध्वस्त की जा सकती हैं। सत्ता परिवर्तन तो उससे नहीं हो सकता है। सत्ता परिवर्तन के दो मॉडल हैं। या तो अमेरिका जमीनी फौज उतारे और ईरान के तमाम फौजी कमांडरों, गार्जियन कौंसिल के सदस्यों और धर्मगुरुओं को मार डाले या उनको बंधक बना कर वहां अपने समर्थन वाले किसी व्यक्ति को गद्दी पर बैठाए। इराक में उसने ऐसा किया था। दूसरा मॉडल लीबिया और सीरिया वाला है। इन देशों में पहले से सशस्त्र संघर्ष चल रहा था। सीरिया में तो 2012 से ही गृह युद्ध छिड़ा हुआ था। इसलिए वहां अमेरिका को अपनी फौज उतारने की जरुरत नहीं पड़ी थी।

आतंकवादियों के हथियारबंद गिरोहों में से एक गिरोह को समर्थन देकर सत्ता में बैठा दिया गया। सीरिया में अमेरिका ने उस जिहादी को गद्दी पर बैठाया है, जिस पर करीब सौ करोड़ रुपए का इनाम खुद अमेरिका ने रखा था। बहरहाल, यह मॉडल भी ईरान में नहीं चल सकता है क्योंकि वहां कोई सशस्त्र विद्रोह नहीं चल रहा है और कोई हथियारबंद गिरोह सरकार के खिलाफ नहीं लड़ रहा है। आम लोग जरूर लड़ते हैं लेकिन वह उनके मानवाधिकारों की लड़ाई होती है। अमेरिका ने जिस तरह से हमला करके वहां के सर्वोच्च धर्मगुरू अयातुल्ला खामेनेई को मारा है उसके बाद राष्ट्रवाद की भावना मजबूत हुई है। ऐसे मौकों पर आमतौर पर ऐसा होता है। तभी जनता का लोकप्रिय समर्थन मिलने की संभावना भी कम हो जाती है।

सो, यह लाख टके का सवाल है कि सत्ता में बदलाव कैसे होगा? यह भी सवाल है कि अगर सत्ता नहीं बदलती है तो अमेरिका क्या मुंह लेकर युद्ध से निकलेगा? ध्यान रहे बाहर से किए जाने वाले सत्ता परिवर्तन के नतीजे दुनिया ने देखे हैं। हर बार ऐसे प्रयोग विफल रहे हैं और जहां भी ऐसा किया गया है वहां हिंसा और अस्थिरता बढ़ी है। तभी यह आशंका है कि अमेरिका पश्चिम एशिया में एक और इराक बना कर वहां से निकल जाएगा। दूसरी ओर पूरा ईरान अलग अलग समूहों के सशस्त्र संघर्ष का क्षेत्र बन कर रह जाएगा।

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