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भारत पर ‘मुस्लिम नाटो’ का असर

भारत के पास पड़ोस में भूराजनीतिक स्थितियां तेजी से बदल रही हैं। पिछले दो साल में पड़ोस के तीन देशों बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में तख्तापलट हो गया। मालदीव में चुनाव के जरिए भारत समर्थक सरकार बदल गई। पिछले साल पाकिस्तान के खिलाफ हुई भारत की सैन्य कार्रवाई, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ भी एक बड़े भूराजनीतिक बदलाव का कारण बनी। इस ऑपरेशन के बाद पाकिस्तान एक क्षेत्रीय सैन्य ताकत और दक्षिण एशिया में भारत के काउंटरवेट के तौर पर स्थापित हुआ है। उसने सऊदी अरब और तुर्किए के साथ एक नया सामरिक गठजोड़ बनाया है, जिसे ‘मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ एमजेडीए नाम दिया गया है। सात अगस्त को इस समझौते पर दस्तखत हुए। इस संधि के कुछ प्रावधान इतना ज्यादा नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन यानी नाटो से मिल रहे हैं कि इसे आम बोलचाल में ‘मुस्लिम नाटो’ कहा जाने लगा है।

इस बारे में जब भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता से पूछा गया तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि भारत इससे अवगत है और इस पर बारीकी से नजर रखे हुए है। इससे ज्यादा भारत सरकार कुछ भी कह भी नहीं सकती है। यह धर्म के आधार पर आपस में बंधे तीन देशों का एक सामरिक करार है और पहली नजर में ऐसा लग रहा है कि तीनों देशों ने एक दूसरे की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किया है। इसमें कहा गया है कि इनमें से किसी एक देश के ऊपर हमला बाकी दोनों देशों पर भी हमला माना जाएगा। नाटो के चार्टर में अनुच्छेद पांच यही कहता है। बहरहाल, तीन देशों के इस सामरिक करार की बुनियाद पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच पिछले साल हुए एक करार में ही पड़ गई थी। पिछले साल भारत की सैन्य कार्रवाई के बाद पाकिस्तान और सऊदी अरब ने आपस में स्ट्रेटेजिक म्युचुअल डिफेंस एग्रीमेंट, एसएमडीए किया था। उसके बाद अब तुर्किए को साथ लेकर एक नया समझौता किया गया है। पिछले महीने के आखिरी हफ्ते में सऊदी अरब ने समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए 14 देशों के साथ एक अलग करार किया। लेकिन वह भारत के लिहाज से उतना अहम नहीं है।

भारत के लिए पाकिस्तान और सऊदी अरब की सामरिक संधि, एसएमडीए और तीन देशों के साथ हुई संधि एमजेडीए ज्यादा अहम है। इसमें भी दो बातें भारत के लिहाज से ज्यादा महत्व की हैं। पहली बात तो यह है कि यह करार मक्का में हुआ। इसका बड़ा प्रतीकात्मक महत्व है। मुस्लिम भाईचारे और इस्लामिक एकता को प्रतीकित करने के लिए ऐसा किया गया। दूसरी खास बात इसमें तुर्किए का जुड़ना है। गौरतलब है कि पिछले साल ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान तुर्किए ने खुल कर पाकिस्तान की मदद की थी। उसने पाकिस्तान को अनमैन्ड एरियल व्हीकल दिए थे और साथ ही रियल टाइम सामरिक सूचनाएं दी थीं। पाकिस्तान को हालांकि तुर्किए के मुकाबले बहुत ज्यादा मदद चीन से मिली थी। चीन ने उसे ज्यादा हथियार, ड्रोन्स और सेटेलाइट के जरिए भारतीय सशस्त्र बलों की जानकारी मुहैया कराई थी।

बहरहाल, तुर्किए और सऊदी अरब का यह गठबंधन कई कारणों से भारत की चिंता बढ़ाने वाला है। यह तो तय है कि पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आएगा, वह सीमा पार से छद्म युद्ध छेड़े रहेगा और आतंकवादी हमले कराने की कोशिश करेगा। ऐसे में अगर भारत फिर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसी कोई कार्रवाई करता है तो क्या सऊदी अरब और तुर्किए उसका साथ देंगे और भारत के खिलाफ लड़ने आएंगे? यह काल्पनिक सवाल है लेकिन भारत को इस सवाल का जवाब जल्दी से जल्दी तलाशना होगा। क्योंकि यह सिर्फ युद्ध का मामला नहीं है। सऊदी अरब के साथ भारत का बड़ा व्यापारिक संबंध है। भारत सऊदी अरब से तेल खरीदने वाला दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है और भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है। वह पाकिस्तान की मदद में उसकी ओर से युद्ध लड़ने भले नहीं आए लेकिन अगर उसके साथ व्यापारिक संबंध बाधित होते हैं या तेल की आपूर्ति रूकती है तो वह भी भारत के लिए बड़ी चिंता की बात होगी।

अभी ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमले के बाद ईरान ने जिस तरह से होर्मुज की खाड़ी को बंधक बनाया और उससे भारत के सामने जो समस्या आई उसे देखते हुए कह सकते हैं कि यह नया सामरिक गठजोड़ भविष्य में कभी भी समुद्री रास्ते से होने वाली भारत की ईंधन आपूर्ति को बाधित कर सकता है और भारत की ऊर्जा सुरक्षा को खतरे में डाल सकता है। इन तीनों देशों का अरब सागर से लेकर मेडिटेरेनियन सागर तक बहुत अहम चोक प्वाइंट्स पर नियंत्रण है। पाकिस्तान इसे लीवरेज के तौर पर इस्तेमाल करने की कोशिश करेगा।

असल में पाकिस्तान को पता है कि वह भारत की सामरिक व आर्थिक ताकत का मुकाबला नहीं कर सकता है। इसलिए वह भारत को घेरने या परेशान करने की बहुआयामी रणनीति पर काम करता है। एक तरफ वह दक्षिण एशिया में चीन के प्रॉक्सी के तौर पर काम कर रहा है तो दूसरी ओर पश्चिम एशिया में मुस्लिम भाईचारे के नाम पर अपनी पैठ बना रहा है। इसका लाभ उसको यह होगा कि वह खाड़ी के अमीर देशों के पैसे की मदद से अपनी सैन्य ताकत बढ़ाएगा। उसे तुर्किए से आधुनिक हथियार और अन्य उपकरण मिल सकते हैं तो सऊदी अरब से भी सैन्य क्षमता बढ़ाने के लिए आर्थिक मदद मिल सकती है। सबको पता है कि पाकिस्तान अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाएगा तो उसका इस्तेमाल कहां करेगा। तभी भारत को इसे लेकर सावधान रहना होगा। अगर सऊदी अरब के नजरिए से देखें तो पाकिस्तान के साथ इस गठजोड़ में शामिल होने के उसके अपने कारण है। हाल के दिनों में यमन को लेकर संयुक्त अरब अमीरात के साथ सऊदी अरब का टकराव बढ़ा है तो ईरान के हमले ने भी उसे परेशान किया है। इसलिए उसको पाकिस्तान की सैन्य ताकत की जरुरत है। इसी चिंता में उसने अमेरिका के साथ परमाणु संधि की पहल भी की है। भले उसकी पहल परमाणु ऊर्जा के लिए हो लेकिन माना जा रहा है कि उसका अंत नतीजा परमाणु प्रसार हो सकता है।

भारत उम्मीद कर सकता है कि सऊदी अरब के साथ उसके जैसे व्यापारिक और ऐतिहासिक संबंध हैं उसे देखते हुए वह भारत के खिलाफ पाकिस्तान के किसी दुस्साहस में शामिल नहीं होगा। फिर भी यह भारत के लिए चेतावनी की घंटी है। इसे देखते हुए भारत को तत्काल अपनी नौसेना की क्षमता बढ़ाने का काम तेज कर देना चाहिए। ध्यान रहे पारंपरिक युद्ध में एक बार फिर नौसेना सबसे महत्वपूर्ण होती जा रही है। भारत को इस पर ध्यान देना होगा और अपनी सामरिक स्वायत्तता को मजबूत करने पर काम करना होगा।

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