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नब्ज पर हाथ

विपक्ष क्यों नाकाम हो रहा है

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आमिर खान की बेहद चर्चित फिल्म ‘दंगल’ में एक दृश्य है, जब महावीर फोगाट अपनी बेटियों को पुरुष पहलवानों से लड़वाने ले जाते हैं तो कुश्ती का आयोजक इसके लिए मना कर देता है। लेकिन फिर उसको उसका दोस्त समझाता है कि उसे फुलटॉस बॉल पर छक्का मारने का मौका मिल रहा है वह उसे ऐसे ही जाने दे रहा है। दोस्त के समझाने पर आयोजक मान जाता है फिर लड़कियां लड़कों से कुश्ती लड़ती हैं, जिसे देखने के लिए भारी भीड़ जुटती है और इस तरह मजमा जम जाता है।

यह कहानी बताने का मकसद यह है कि लोकसभा चुनाव से पहले विपक्ष को एक के बाद एक फुलटॉस गेंद मिल रही है लेकिन विपक्ष एक भी गेंद पर छक्का नहीं मार पा रहा है। सारी फुलटॉस गेंदें बेकार जा रही हैं। भारत के निकट अतीत में शायद ही कोई लोकसभा चुनाव ऐसा गुजरा होगा, जिसमें चुनाव से पहले एक के बाद एक इतने मौके विपक्षी पार्टियों को मिले हों। लेकिन दुर्भाग्य से विपक्ष एक भी मौके का इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है। क्या विपक्षी पार्टियां इस उम्मीद में हैं कि अपने आप लोगों को सारी जानकारी मिल रही है और लोग अंदर अंदर मन बना रहे हैं?

सोचें, लोकसभा चुनाव से ठीक पहले चुनावी बॉन्ड का मामला सामने आया। ईमानदार राजनीति का दावा करने वाली भाजपा और केंद्र सरकार की एक बड़ी महत्वाकांक्षी योजना पर से परदा हट गया। ऐसा नहीं है कि किसी मीडिया समूह ने इसका खुलासा किया या किसी व्हिसलब्लोअर ने कोई पेपर लीक किया हो। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से सरकारी दस्तावेज सामने आए हैं, जिनसे पता चला है कि चुनावी बॉन्ड में कई स्तर पर भ्रष्टाचार हुआ है।

भारतीय स्टेट बैंक के दस्तावेजों से पता चला है कि 60 से ज्यादा कंपनियां ऐसी हैं, जो चुनावी बॉन्ड का कानून लागू होने के बाद बनी और ढाई सौ करोड़ रुपए का चंदा दिया। एक 466 करोड़ रुपए के ऐसे चंदे के बारे में बताया जा रहा है, जिसके बारे में स्टेट बैंक को पता ही नहीं है कि ये बॉन्ड किसने खरीदे। कई कंपनियां ऐसी हैं, जिनका टर्नओवर पांच करोड़ से कम है, लेकिन उन्होंने इससे 50-50 गुना ज्यादा चंदा दिया। एक कंपनी तो ऐसी है जिसका शुद्ध लाभ 1.82 करोड़ रुपए का है और उसने इससे सौ गुना ज्यादा यानी 182 करोड़ का चुनावी बॉन्ड खरीदा। अनेक ऐसी कंपनियां हैं, जिनके ऊपर केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई हुई और उन्होंने बॉन्ड खरीदा।

यह सही है कि ऐसी कंपनियों ने विपक्ष को भी चंदा दिया है। लेकिन सवाल विपक्ष का नहीं है। सवाल उस सरकार का है, जिसने बिल्कुल ऊपर से राजनीति की सफाई का संकल्प जाहिर किया है। तभी सवाल है कि जिस सरकार का भ्रष्टाचार मिटाने का दावा है उस सरकार की नाक के नीचे कैसे चुनावी बॉन्ड का खेल हुआ? कैसे चुनावी बॉन्ड में काले धन का इस्तेमाल होने की खबरें आ रही हैं?

सरकार यह कह कर नहीं बच सकती है कि सभी पार्टियों को चंदा मिला है। यह व्यवस्था का, कानून का, राजनीतिक शुचिता का मामला है। फर्जी कंपनियों और काले धन से खरीदे गए बॉन्ड से चंदा लेकर भाजपा इस आधार पर अपना बचाव नहीं कर सकती है कि कांग्रेस को भी चंदा मिला है। कांग्रेस को तो भाजपा और प्रधानमंत्री ने भ्रष्ट बता ही रखा है लेकिन अब तो एकाध पार्टियों को छोड़ कर भाजपा सहित लगभग सभी पार्टियों के उसी हमाम में शामिल होने के सबूत मिले हैं!

इसी तरह से दूसरा मुद्दा विपक्ष के नेताओं की गिरफ्तारी का है। एक के बाद एक विपक्षी नेता गिरफ्तार हो रहे हैं या विपक्षी पार्टियों के ऊपर केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई हो रही है। सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस के खाते फ्रीज कर दिए गए हैं। बरसों से लंबित आयकर बकाए की वसूली के लिए ऐसा समय चुना गया, जब लोकसभा चुनाव की घोषणा होने वाली थी। चुनाव की घोषणा से ठीक पहले उसके खाते सीज कर दिए गए और करोड़ों रुपए आयकर बकाए और जुर्माने के तौर पर खाते से निकाल लिए गए।

चुनाव की घोषणा से पहले झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को गिरफ्तार किया गया और चुनाव की घोषणा के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को गिरफ्तार कर लिया गया। अलग अलग राज्यों में चुनौती देने वाले नेताओं को या तो किसी न किसी तरीके से अपने साथ मिला लिया गया या उनको तोड़ कर, गिरफ्तार करके कमजोर करने का प्रयास किया गया। महाराष्ट्र में शिव सेना और एनसीपी दोनों को तोड़ दिया गया और उसके बाद भी जब लगा कि इतने से काम नहीं चलेगा तो बची खुची शिव सेना और एनसीपी के नेताओं के खिलाफ केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई तेज कर दी गई। मायावती जैसी नेता पता नहीं किस परोक्ष दबाव में बिल्कुल निष्क्रिय होकर बैठी हैं।

तभी सवाल है कि चुनावी बॉन्ड का मामला सामने आने  और चुनाव से पहले विपक्ष को दबाने, कुचलने की निरंतर घटनाओं के बावजूद विपक्ष इसे मुद्दा क्यों नहीं बना पा रहा है? क्यों विपक्षी पार्टियां ऐसे ज्वलंत मुद्दों पर देश की जनता को जाग्रत नहीं कर पा रही हैं? क्या देश के लोग बहुत गहरी नींद सो चुके हैं या विपक्ष के प्रतिरोध में दम नहीं है कि वह जनता तक पहुंचे और उसे जगा सके? अगर राजनीतिक प्रतिरोध की बात करें तो अतीत में विपक्ष कभी इतना कमजोर नहीं रहा है कि वह सड़क पर उतर कर आंदोलन नहीं कर सके।

कांग्रेस के संपूर्ण प्रभुत्व के दौर में भी विपक्षी पार्टियां सड़कों पर उतरती थीं। उन्हें भले चुनावी सफलता नहीं मिल पाती थी लेकिन वे जनता को जागरूक करती थीं। उन्हें उनके हितों के बारे में समझाती थीं। इमरजेंसी के बाद भी विपक्ष लोगों को यह समझाने में कामयाब रहा था कि इंदिरा गांधी के तानाशाही वाले रवैए से देश का लोकतंत्र खतरे में है। लेकिन अब विपक्ष ऐसा कुछ नहीं कर पा रहा है। यह भी लग रहा है कि सोशल मीडिया ने भी विपक्ष को पंगु बना दिया है। वह सारी लड़ाई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लड़ रही है। विपक्षी पार्टियों के नेता सोशल मीडिया में लंबे लंबे पोस्ट लिख रहे हैं और सरकार की पोल खोल रहे हैं।

इसके अलावा कुछ सोशल मीडिया इंफ्लुएन्सर क्रांतिकारी वीडियो बना रहे हैं या सोशल मीडिया में लेख लिख रहे हैं। विपक्ष मान रहा है कि इसी के जरिए उसकी लड़ाई हो रही है। यह कैसा दुर्भाग्य है कि अपनी लड़ाई खुद लड़ने की बजाय विपक्षी नेता सोशल मीडिया के इंफ्लुएन्सर्स के वीडियो साझा कर रहे हैं! ऐसा लग रहा है कि सड़क पर उतर कर लड़ने की उसमें हिम्मत नहीं बची है या इस चुनाव में वह लड़ना ही नहीं चाहती है।

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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