दुनिया के संभवतः किसी दूसरे देश में नैतिकता की उतनी बात नहीं होती होंगी, जितनी भारत में होती हैं। भारत ने दया, करुणा, सत्य, प्रेम, भाईचारे आदि के जितने प्रतीक गढ़े हैं, दुनिया के किसी और देश में उतने नहीं होंगे। भारत में तो एक सतयुग ही था, जिसमें सत्य हरिश्चंद्र थे। लेकिन यह भी सही है कि सत्य, अहिंसा, प्रेम, भाईचारे, करुणा, दया आदि से जितनी दूरी भारत में है उतनी शायद ही कहीं और होगी। इस पर लंबी बहस हो सकती है। इसलिए उसमें जाने की जरुरत नहीं है। लेकिन दुनिया के जिन देशों में सत्य और नैतिकता आदि का ढोल रोज नहीं बताया जाता है वहां लोग ज्यादा नैतिक होते हैं। वहां लोग नैतिक जिम्मेदारी लेते हैं और अगर कोई अपराध किया है तो उसे भी स्वीकार करके सजा पाते हैं। भारत में कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं लेता है और अपराध करते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया व्यक्ति भी अदालत में खड़े होकर कहता है कि वह बेकसूर है और उसका पूरा परिवार और ज्यादातर मामलों में पूरी जाति उसके बचाव में खड़ी होती है।
भारत की राजनीति में भी नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने का कोई सिद्धांत नहीं रहा है। नैतिक जिम्मेदारी लेकर कुछ मंत्रियों आदि ने जरूर इस्तीफे दिए, जिनकी आज तक चर्चा होती है। लाल बहादुर शास्त्री, माधवराव सिंधिया या नीतीश कुमार का जिक्र किया जाता है। यह संयोग है कि इन तीनों के इस्तीफे ट्रेन दुर्घटना को लेकर हुए थे। इनके रेल मंत्री रहते ट्रेन दुर्घटनाएं हुईं और उसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने इस्तीफा दिया। यह अलग बात है कि रेल मंत्रालय में विफल होने के बाद भी इन सभी लोगों को दूसरे मंत्रालयों में अहम जिम्मेदारी मिली। लाल बहादुर शास्त्री तो बाद में प्रधानमंत्री बने। बहरहाल, भारत में गंभीर से गंभीर विफलता या आर्थिक अपराध में शामिल होने के आरोपों के बाद भी इस्तीफा कराना बड़ा मुश्किल होता है। आर्थिक अपराध के मामलों में तो अब गिरफ्तार होकर जेल जाने के बाद भी नेता इस्तीफा नहीं देते हैं। दिल्ली का मुख्यमंत्री रहते अरविंद केजरीवाल ने कमाल की मिसाल बनाई। वे कई महीने जेल में रहे और उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया। हेमंत सोरेन ने थोड़ी शर्म दिखाई और गिरफ्तारी से चंद मिनट पहले इस्तीफा दे दिया। अगर गिरफ्तारी की बाध्यता नहीं होती तो वे भी इस्तीफा नहीं देते।
सवाल है कि ऐसा क्यों होता है कि भारत में केंद्र या राज्य का मंत्री या मुख्यमंत्री किसी भी विवाद में फंसने या अपनी कैसी भी विफलता के बाद इस्तीफा नहीं देते हैं? इसे दो पहलुओं से देख सकते हैं। एक आपराधिक मामला और दूसरा विफलता व नैतिकता का मामला। जहां तक आपराधिक मामलों में फंसने पर इस्तीफे का सवाल है तो वह इसलिए आसानी से नहीं होता है क्योंकि भारत में पहले से जिनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं ऐसे, सैकड़ों लोग सांसद और विधायक चुने गए हैं। सवाल है जब गंभीर आपराधिक मामले दर्ज होने और उनकी जानकारी सार्वजनिक होने के बावजूद जनता उनको चुन देती है तो चुने जाने के बाद किए गए किसी अपराध के लिए वे क्यों इस्तीफा देंगे? जब जनता ने उनको सांसद चुन दिया है तो वे केंद्र में मंत्री बनने के योग्य हैं और जनता ने विधायक चुना है तो वे राज्य में मंत्री और मुख्यमंत्री बनने के योग्य हैं। ऐसे में उनके और जनता के बीच में नैतिकता की बात कहां से आ गई! उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि जानने के बाद भी अगर जनता ने चुना है तो वे वैसे ही किसी अन्य अपराध के मामले में भी क्यों इस्तीफा देंगे? तभी भारत में ऐसे मामलों में भी जोर जबरदस्ती ही इस्तीफा होता है। गिरफ्तार होने या गिरफ्तारी की नौबत आने या पार्टी व सरकार के प्रमुख की ओर से राजनीतिक नुकसान की आशंका देख कर दबाव डालने के बाद ही इस्तीफा होता है।
अब रही जिम्मेदारी के निर्वहन में विफलता की बात तो उसमें भी आजादी के बाद से ही यह परंपरा चलती आ रही है कि इस्तीफा जोर जबरदस्ती ही होगा। ध्यान रहे भारत में पहला हाई प्रोफाइल इस्तीफा वीके कृष्ण मेनन का हुआ था। चीन के साथ युद्ध में भारत की हार के बाद तत्कालीन रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन पर दबाव था कि वे इस्तीफा दें। लेकिन वे इस्तीफा देने को तैयार नहीं थे। जब जन दबाव बहुत बढ़ा तो अंत में उन्होंने इस्तीफा दिया। हालांकि जयराम रमेश ने उनके जीवन पर एक किताब लिखी है, ‘अ चेकर्ड ब्रिलियंसः द मेनी लाइव्स ऑफ वीके कृष्ण मेनन’, जिसमें उन्होंने दावा किया है कि कृष्ण मेनन तो बहुत पहले इस्तीफा देने को तैयार थे लेकिन उन्हें रोका गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू मानते थे कि चीन के साथ युद्ध में पराजय का मेनन से कोई संबंध नहीं है। फिर वे क्यों इस्तीफा देंगे।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर चल रही बातें सुन कर क्या कृष्ण मेनन के इस्तीफे की कहानी से समानता नहीं दिखती है? ध्यान रहे पिछले कई दिनों से कहा जा रहा है कि धर्मेंद्र प्रधान तो बहुत पहले इस्तीफा देना चाहते थे। लेकिन प्रधानमंत्री को लगता था कि पेपर लीक होने से उनका कोई लेना देना नहीं है, बल्कि उन्होंने तो पेपर लीक होने के तुरंत बाद सक्रियता दिखाई। सारे आरोपी पकड़े गए और रिकॉर्ड समय में दोबारा परीक्षा करा ली गई ताकि छात्रों का एक साल बरबाद न हो। इसके बाद भी उनका इस्तीफा हुआ तो उसका कारण यही है कि जन दबाव बहुत बढ़ गया यानी जोर जबरदस्ती से ही उनका इस्तीफा हुआ।
सोचें, पेपर लीक कितनी बड़ी विफलता है! एक मंत्री के कार्यकाल में दो बार नीट यूजी जैसी विशाल अखिल भारतीय परीक्षा के पेपर लीक हो जाएं तो उससे बड़ी विफलता क्या हो सकती है? आश्चर्य यह है कि 2024 के शुरू में बजट सत्र में पेपर लीक का कठोर कानून बना था और मई में पेपर लीक हो गया, उसके बाद भी जून में जब नई सरकार बनी तो फिर धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री बना दिया गया! फिर 2026 के मई में नीट यूजी की परीक्षा का पेपर लीक हो गया और धर्मेंद्र प्रधान कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं थे।
यह सिर्फ धर्मेंद्र प्रधान का मामला नहीं है। यह भारत की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था का मामला है, जहां हर व्यक्ति चाहता है कि जवाबदेही और नैतिकता का तकाजा दूसरे पर लागू हो। अपनी जवाबदेही और नैतिकता का ध्यान किसी को नहीं रहता है। जोर जबरदस्ती न हो तो न वीके कृष्ण मेनन का इस्तीफा होता और न धर्मेंद्र प्रधान का। याद करें कैसे कारगिल युद्ध के समय ताबूत घोटाला खुला था और तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज ने कितनी मुश्किल से इस्तीफा दिया था। ऐसे ही दबाव नहीं होता और पार्टियों को चुनावी नुकसान का भय नहीं होता तो न ए राजा इस्तीफा देते और न अशोक चव्हाण की विदाई होती। महिलाओं का दबाव नहीं होता तो एमजे अकबर का भी इस्तीफा नहीं होता। सोचें, इंगलैंड में क्रिस्टीन किलर कांड में एक मंत्री लॉर्ड प्रोफ्यूमो का नाम आया था तो प्रधानमंत्री हेराल्ड मैकमिलन की पूरी सरकार को इस्तीफा देना पड़ा था। भारत में मी टू के उतने बड़े मुद्दे में एमजे अकबर फंसे तो उनका भी इस्तीफा मुश्किल से हुआ और दुनिया के सबसे बड़े सेक्स अपराधी एपस्टीन के साथ संबंधों का खुलासा होने के बाद भी हरदीप पुरी का इस्तीफा नहीं हुआ।
