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यह युवाओं में भरा हुआ गुस्सा है!

जंतर मंतर पर सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल और कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन एक सामान्य सी मांग को लेकर शुरू हुआ था। छह जून को अमेरिका से लौटे अभिजीत दीपके ने जंतर मंतर पर प्रदर्शन का आयोजन किया और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की। उन्होंने अमेरिका में रहते हुए एक सोशल मीडिया हैंडल बनाया था, जिसका नाम रखा था ‘कॉकरोच जनता पार्टी’। बाद में इसके एक्स हैंडल को सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया तो ‘कॉकरोच इज बैक’ नाम से दूसरा हैंडल बनाया गया। सो, कुल मिला कर यह एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बना हैंडल है, जिसने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को मुद्दा बनाया था। 28 जून को वापस जंतर मंतर पर प्रदर्शन शुरू करने से पहले दीपके ने महाराष्ट्र के अपने गांव से कई संदेश दिए और जयपुर व नागपुर में भी प्रदर्शन किया। हर जगह उन्होंने एक ही मुद्दा उठाया कि धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें।

यह विशुद्ध रूप से एक एक लोक लुभावन राजनीतिक नारा था और तभी इसे जमीनी स्तर पर बहुत समर्थन नहीं मिला। जिस तेजी से सोशल मीडिया हैंडल पर इसके फॉलोवर बढ़े थे वह तेजी दो दिन के बाद ही थम गई। छह जून के प्रदर्शन को सीमित सफलता मिली। दीपके तीन घंटे के प्रदर्शन के बाद बेहोश हो गए और एसी गाड़ी में बैठने चले गए। तब ऐसा कतई नहीं लगा था कि यह आंदोलन इतना बड़ा होगा और इससे देश भर के छात्र, युवा और उनके अभिभावक जुड़ जाएंगे।

इसका श्रेय जाता है सोनम वांगचुक को। उन्होंने इस आंदोलन को एक व्यापक स्वरूप दिया। वे शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं और उनकी अपनी एक नैतिक ताकत है। जैसे अन्ना हजारे की पहचान भ्रष्टाचार विरोधी समाजसेवी की थी वैसे ही सोनम वांगचुक की छवि एजुकेटर और इनोवेटर की है। इसलिए जब वे आंदोलन से जुड़े और उन्होंने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के साथ साथ शिक्षा व परीक्षा की ग़डबड़ियों को मुख्य मुद्दा बनाया तब इस आंदोलन का दायरा बढ़ गया।

सरकार इस बात को समझने में नाकाम रही कि यह आंदोलन बहुत बड़ा हो गया है। वह इसकी तीव्रता और व्यापकता को जंतर मंतर पर जुड़ी भीड़ से माप रही थी। जबकि यह जंतर मंतर से ही नहीं, बल्कि सोनम वांगचुक और कॉकरोच जनता पार्टी की सीमाओं से भी व्यापक हो गया है। जो लोग भी इसका आकलन जंतर मंतर की भीड़ से करेंगे वे धोखा खाएंगे। इस आंदोलन का दायरा पूरे देश में फैल गया है। देश के अलग अलग हिस्सों में जितने लोग इस आंदोलन का समर्थन करने निकल रहे हैं उसके कई गुना ज्यादा लोग डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इसका समर्थन कर रहे हैं और उससे भी कई गुना ज्यादा लोगों के दिलों में इस आंदोलन को लेकर समर्थन का भाव पैदा हुआ है। ऐसा इसलिए है क्योंकि देश का हर परिवार इससे अपने को जुड़ा हुआ पा रहा है।

असल में हर राज्य में और हर तरह की परीक्षा में गड़बड़ी हो रही है। यह गड़बड़ी कई किस्म की है। कहीं समय से परीक्षा नहीं हो रही है, परीक्षा हो रही है तो पेपर लीक हो जा रहा है, नतीजों में देरी हो रही है, नतीजों जारी हो रहे हैं तो उनमें गड़बड़ी हो जा रही है, नतीजे आने के बाद भी नियुक्ति नहीं हो रही है और इस पूरी प्रक्रिया में हर साल लाखों बच्चों की उम्र सीमा निकल जा रही है। उसको भले यह नहीं लग रहा हो कि इस आंदोलन से उसकी समस्याओं का पूरा समाधान हो जाएगा फिर भी वह इसलिए इससे जुड़ रहा है क्योंकि उसे यह आंदोलन अपने संचित आक्रोश की अभिव्यक्ति प्रतीत हो रहा है।

कॉकरोच जनता पार्टी भले मई में बनी या सोनम वांगचुक भले शिक्षा का मुद्दा लेकर 28 जून को भूख हड़ताल पर बैठे परंतु छात्रों का मुद्दा मई या जून का नहीं है। पिछले कई बरसों से छात्र और युवा इन समस्याओं से जूझ रहे हैं। उनके अंदर बरसों से जो गुस्सा इकट्ठा हो रहा था वह इस आंदोलन में अभिव्यक्त हो रहा है।

केंद्र सरकार इस आंदोलन को लेकर एक के बाद एक गलतियां करती जा रही है। सोनम वांगचुक के आंदोलन की अनदेखी करना एक गलती थी तो दूसरी गलती पुलिस भेज कर उनको जंतर मंतर से उठवा लेने की थी। तीसरी गलती यह थी कि सरकार ने कोई बैक चैनल वार्ता नहीं की। सीधे जेपी नड्डा से ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के प्रतिनिधियों की मुलाकात कराई गई। यह मुलाकात भी ऐसे समय में हुई, जब हजारों की संख्या में छात्र और युवा सड़क पर थे। उनके ऊपर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नेताओं का कोई नियंत्रण नहीं था। इसलिए बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला।

चौथी गलती यह है कि सरकार छात्रों और युवाओं के आंदोलन को आपराधिक कृत्य बताने का नैरेटिव पुश कर रही है। पुलिस मुकदमे दर्ज कर रही है। सीसीटीवी देख कर आंदोलनकारियों की पहचान की जा रही है। मीडिया में फुटेज लीक करके यह नैरेटिव बनाया जा रहा है कि छात्रों ने पुलिस पर पत्थर फेंके या हमला किया। हो सकता है कि बाद में वार्ता में इसका मोलभाव के तौर पर इस्तेमाल किया जाए। लेकिन यह तय मानें कि छिटपुट घटनाओं को आधार बना कर युवाओं के स्वंयस्फूर्त आंदोलन की साख बिगाड़ने की कोशिश से सरकार की छवि सकारात्मक नहीं बनेगी। उलटे युवाओं में सरकार और भाजपा को लेकर नाराजगी और बढ़ेगी।

ध्यान रहे इससे पहले हर आंदोलन में कुछ न कुछ हिंसा, तोड़फोड़ और आपराधिक कृत्य हुए। जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति के दौरान बडौदा डायनामाइट कांड हुआ था। इस सिलसिले में जॉर्ज फर्नांडीज गिरफ्तार हुए थे। आरोप लगे थे कि उन्होंने रेल के पुल और पटरियां उड़ाने के लिए डायनामाइट की तस्करी की थी। लेकिन क्या इस आपराधिक आरोप के आधार पर जेपी के आंदोलन को परिभाषित किया जाएगा? अगर सरकार यह सोच रही है कि प्रदर्शनकारियों पर मुकदमे दर्ज करके या उनको साजिश का हिस्सा बता कर या उनको हिंसक व मोदी विरोधी बता कर इस आंदोलन की साख बिगाड़ देगी या इससे मोदी समर्थक भी प्रदर्शनकारियों के बारे में ऐसा ही सोचना लगेंगे तो यह बड़ी गलतफहमी है।

बच्चे मोदी समर्थकों के घरों में भी हैं और परीक्षा की गड़बड़ियों का असर उनके ऊपर भी समान रूप से हुआ है। इसलिए प्रदर्शन को क्रिमिनलाइज करने की कोशिश बैकफायर कर जाएगी। सरकार समस्या की व्यापकता को समझे, प्रदर्शनकारियों के आक्रोश का सम्मान करे और संवेदनशील तरीके से इसे सुलझाने का प्रयास करे। यह अपने-पराए या समर्थक-विरोधी का मामला नहीं है। यह देश के छात्रों व युवाओं का मामला है। अगर इस मामले में सरकार की संवेदनशीलता नहीं दिखती है तो एक पूरी पीढ़ी के मन में उसे लेकर स्थायी नकारात्मकता का भाव बैठेगा।

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