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उच्च सदन का यह उद्देश्य तो नहीं था

New Delhi, Jul 31 (ANI): Presiding officer Dilip Saikia conducts the proceedings of the Lok Sabha during the Monsoon Session of Parliament, in New Delhi on Friday. (Sansad TV/ANI Video Grab)

भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश की आठ राज्यसभा सीटों के लिए सोमवार, पांच अक्टूबर को जब उम्मीदवारों के नाम का ऐलान किया तो चौतरफा इस बात की चर्चा थी कि इससे कैसे भाजपा ने चुनाव का सामाजिक समीकरण साधा है। हर जगह प्रमुखता से यह बताया गया कि इन आठ में तीन पिछड़ी जाति के हैं, दो दलित समुदाय के हैं, दो ब्राह्मण हैं और एक ठाकुर समाज के हैं।

उच्च सदन में जाने के लिए इसके अलावा उनकी क्या योग्यता है यह बताने की जरुरत किसी ने नहीं समझी। ध्यान रहे संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत उच्च सदन यानी राज्यसभा का गठन किया गया है, जिसमें कम से कम एक योग्यता ऐसी रखी गई है, जो लोकसभा सदस्य बनने की जरूरी योग्यता से अलग है। वह भिन्नता उम्र की है। अनुच्छेद 80 में तय किया गया है कि कम से कम 30 साल की उम्र का व्यक्ति राज्यसभा जाएगा। लोकसभा की सदस्यता के लिए उम्र सीमा 25 साल की रखी गई है।

उच्च सदन के लिए उम्र सीमा पांच साल ज्यादा रखने का उद्देश्य बहुत स्पष्ट है। संविधान बनाने वाले चाहते थे कि राज्यसभा में जाने वाले सदस्य अपेक्षाकृत ज्यादा परिपक्व हों। उम्र की परिपक्वता प्रतीकात्मक है। बुनियादी रूप से यह सोचा गया था कि ज्यादा बेहतर अनुभव और योग्यता वाले लोग उच्च सदन में जाएं। अघोषित रूप से यह भी माना गया कि ऐसे नेता, जो लोकसभा का चुनाव नहीं जीत सकते हैं या लोकसभा का चुनाव हार गए हैं लेकिन संसद में उनकी उपस्थिति अनिवार्य है, उनको राज्यसभा के रास्ते संसद में भेजा जाए। अब तक ऐसी परंपरा भी रही है।

ध्यान रहे संविधान के अनुच्छेद 80 में ही 12 सदस्यों के मनोनयन की भी व्यवस्था है। सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति ऐसे 12 लोगों को मनोनीत करते हैं, जिनका साहित्य, कला, संस्कृति, समाजसेवा आदि में विशिष्ट योगदान हो। बाकी सदस्यों के लिए ऐसी योग्यता व अर्हता तय नहीं की गई है लेकिन आमतौर पर यही माना जाता है कि चुनाव के जरिए आने वाले अन्य सदस्य भी दूसरे नेताओं के मुकाबले कुछ विशिष्ट योग्यता रखते होंगे।

इस अघोषित नियम के कई गौरवशाली उदाहरण मिल जाएंगे। मिसाल के तौर पर डॉक्टर भीमराव अंबेडकर 1952 में लोकसभा का पहला चुनाव हार गए थे। वे उस समय की बॉम्बे नॉर्थ सीट से चुनाव लड़े थे लेकिन जीत नहीं सके थे। उसी साल अप्रैल में उनको बॉम्बे प्रेसिडेंसी से राज्यसभा में भेजा गया था। इंदिरा गांधी पहली बार राज्यसभा के रास्ते सांसद बनी थीं। जब नरसिंह राव को लगा कि अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए डॉक्टर मनमोहन सिंह की आवश्यकता है तो पहले उनको मंत्री बनाया गया और फिर राज्यसभा के रास्ते संसद में लाया गया। स्वंय नरेंद्र मोदी जब पहली बार प्रधानमंत्री बने तो अरुण जेटली लोकसभा का चुनाव हार गए थे लेकिन मोदी ने उनको राज्यसभा भेजा और वित्त व रक्षा मंत्री बनाया। अब भी शीर्ष पांच मंत्रालयों में से दो में राज्यसभा सांसदों को मंत्री बनाया गया है। विदेश मंत्री एस जयशंकर और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण दोनों राज्यसभा सांसद हैं।

ऐसी अनगिनत मिसालें हैं कि विशिष्ट योग्यता रखने वाले नेता या विशेषज्ञ को राज्यसभा के रास्ते संसद में लाया जाता है और वे अपनी विशिष्ट योग्यता से विधायी कामकाज या कार्यकारी भूमिका में सकारात्मक योगदान करते हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से ऐसा देखने को मिल रहा है कि भारतीय जनता पार्टी ने राज्यसभा को भी यह संदेश देने का मंच बना दिया है कि वह किसी को भी उच्च सदन का सदस्य बना देती है। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के मास्टरस्ट्रोक की तरह पेश किया जाता है। हो सकता है कि भाजपा को इसका कुछ राजनीतिक लाभ मिलता हो लेकिन इससे राज्यसभा के स्वरूप, संसदीय कामकाज और विधायी कार्यों में उच्च सदन की भूमिका नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है।

संसदीय बहसों की गुणवत्ता का मूल्यांकन करके इसकी पुष्टि की जा सकती है। राज्यसभा में भी ज्यादातर सदस्य ऐसे आते हैं, जिनका विधायी कामकाज में कोई सार्थक योगदान नहीं होता है। वे सिर्फ सदन के माननीय सदस्य होते हैं। अगर कभी बोलना पड़ा तो बहुत जेनेरिक बातों का भाषण देते हैं। उसमें कोई गुणवत्ता नहीं होती है। विषय के मामले में विद्वता की झलक नहीं दिखती है। उनका काम भी हाथ उठा कर सरकार के प्रस्तावों का समर्थन करना और मेज थपथपा कर प्रधानमंत्री का स्वागत करना या उनके नाम के नारे लगाना रह गया है।

प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने पद्म पुरस्कारों जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मानों का लोकतंत्रीकरण किया था। वह एक अच्छी पहल थी। ऐसे लोग जो अपने क्षेत्र में बहुत अच्छा काम कर रहे थे लेकिन मीडिया और महानगरों की लाइमलाइट से दूर थे और इस वजह से उनके काम की पहचान और पूछ नहीं हो रही थी, उनको पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया जाने लगा। पहले संपर्कों और मीडिया में चर्चा के आधार पर ऐसे पुरस्कार दिए जाते थे। तब भी अच्छे और योग्य लोगों को पुरस्कार मिलता था। लेकिन दूरदराज के लोग छूट जाते थे। हालांकि इसका यह अर्थ कतई नहीं होता है कि मीडिया की चर्चा में रहे अच्छे लोगों को पुरस्कारों से दूर कर दिया जाए।

बहरहाल, वह एक अच्छी पहल थी। लेकिन उसी तरह की पहल राज्यसभा को उसके मूल उद्देश्यों से दूर ले जा रही है। राज्यसभा को राज्यों के हितों की बात करने के साथ साथ लोकसभा की मनमानियों पर चेक एंड बैलेंस की भूमिका भी निभानी होती है। इसके अलावा देश और दुनिया के ज्वलंत मुद्दों पर सार्थक चर्चा, जीवंत संवाद और विधायी कामकाज में गुणवत्तापूर्ण हस्तक्षेप सुनिश्चित करना भी राज्यसभा का काम था। दुर्भाग्य से उसकी यह भूमिका कम होती जा रही है। मनोनयन के जरिए भी ऐसे लोग उच्च सदन में लाए जा रहे हैं, जो सत्तारूढ़ दल की राजनीतिक आवश्यकता को पूरा करते हैं।

चुनाव के जरिए तो जो लोग उच्च सदन पहुंच रहे हैं वे या तो अकूत संपत्ति वाले होते हैं या संबंधित पार्टी के लिए सामाजिक व राजनीतिक महत्व वाले होते हैं। भाजपा ने अगर अपने आठ उम्मीदवारों के जरिए सामाजिक समीकरण साधा है तो सपा ने अपने उम्मीदवारों के जरिए परिवार और धन को महत्व दिया है। कह सकते हैं कि हर दोवार्षिक चुनाव के बाद राज्यसभा की गुणवत्ता में थोड़ी और कमी हो जा रही है।

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