यह लाख टके का सवाल है कि भारतीय जनता पार्टी ने महिला आरक्षण और परिसीमन की टाइमलाइन को प्रीपॉन्ड क्यों किया है? एक सवाल यह भी है कि जो दांव 2034 के लोकसभा चुनाव के हिसाब से प्लान किया गया था उसे 2029 में ही इस्तेमाल करने का फैसला क्यों हुआ है? अगर कोई कहता है कि ऐसा कुछ नहीं है या इसमें कुछ ज्यादा देखने की जरुरत नहीं है या सरकार महिलाओं के सशक्तिकरण में देरी नहीं करना चाहती है तो इसका मतलब है कि वह राजनीति नहीं समझता है या वह संबंधित पक्ष यानी हितधारक है। क्योंकि राजनीति में कोई भी काम अनायास नहीं होता है, ऐसा अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने कहा था। उन्होंने कहा था कि अगर कभी लगे कि कोई काम अनायास हो रहा है तो मानना चाहिए कि उसे ऐसे ही प्लान किया गया है। सो, यह काम जो अचानक होता हुआ दिख रहा है वह ऐसे ही प्लान किया गया है। तभी ऊपर जो दो सवाल उठाए गए हैं उनका सीधा और सरल जवाब यह है कि भारतीय जनता पार्टी 2029 के चुनाव को लेकर चिंता में है। उसको लग रहा है कि अगर ऐसे ही हालात रहे तो 2029 का चुनाव हार सकते हैं क्योंकि इस कार्यकाल में ऐसी कई घटनाएं हो रही हैं, जो यूपीए दो के घटनाक्रम की समानता लिए हुए हैं।
यहां एक और बात समझने की है। इस पूरे प्रसंग में ऐसा लग रहा है कि महिला आरक्षण का मुद्दा सबसे प्रमुख है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक लेख गुरुवार, नौ अप्रैल के अखबारों में छपा है, जिसका एक अंग्रेजी अखबार में शीर्षक है, ‘टुगेदर लेट अस एम्पॉवर ऑवर नारी शक्ति’ और हिंदी के एक बड़े अखबार में शीर्षक है, ‘आइए हम मिल कर नारी शक्ति को सशक्त करें’। दोनों अखबारों में शीर्षक लगाने वालों में रचनात्मकता का घोर अभाव दिख रहा है क्योंकि जो खुद शक्ति है उसे क्या सशक्त करना है! इस देश में शक्ति की पूजा होती है सशक्ति की नहीं।
बहरहाल, इस लेख के छपने से एक दिन पहले बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में महिला आरक्षण कानून यानी नारी शक्ति वंदन कानून में संशोधन के लिए तैयार बिल को मंजूरी दी गई है। ऐसा दिखाया जा रहा है जैसे महिलाओं को आरक्षण देने के लिए यह सब किया जा रहा है। लेकिन असल में सिर्फ यही मकसद नहीं है।
महिला आरक्षण के कैमाफ्लॉज या उसके आवरण में परिसीमन के काम को अंजाम दिया जाएगा। ध्यान रहे महिला आरक्षण कानून 2023 में इसलिए पारित किया गया था ताकि 2024 में इसका लाभ मिले। लेकिन वह नहीं हो पाया था। अब पांच राज्यों के चुनाव के बीच इसे संशोधित किया जा रहा है तो उसका मकसद भी चुनावी लाभ लेना है। तभी जिस दिन दो राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में मतदान हो रहा था उस दिन प्रथानमंत्री का लेख छपा और उसी दिन प्रधानमंत्री की एक वीडियो अपील भी जारी हुई। ध्यान रहे महिलाओं का वोट पहले भी दूसरी पार्टियों के मुकाबले भाजपा को थोड़ा ज्यादा मिलता रहा है और महिला आरक्षण जल्दी से जल्दी लागू करने का कानून उस वोट को भाजपा के साथ और एकीकृत करेगा। इसके बावजूद यह समझने की जरुरत है संसद के तीन दिन के सत्र में होने वाली पूरी कवायद महिला आरक्षण से ज्यादा परिसीमन से जुड़ी हुई है। क्योंकि 2024 के चुनाव में आदर्श स्थितियों के बावजूद भाजपा 240 सीट पर रह गई थी। 2029 में ऐसा ही या इससे बुरा न हो जाए इसलिए परिसीमन जरूरी है।
इस बात को समझने के लिए महाभारत के एक प्रसंग का जिक्र किया जा सकता है। जब घटोत्कच युद्ध में उतरता है और पूरी कौरव सेना को तहत नहस कर रहा होता है तब दुर्योधन अपने मित्र कर्ण से ब्रह्मास्त्र चलाने को कहता है। कर्ण ने अपना कवच कुंडल गंवा कर ब्रह्मास्त्र हासिल किया था, जिसे वह एक ही बार चला सकता था। उसने इसे अर्जुन के लिए रखा हुआ था। जब कर्ण उसका इस्तेमाल करने से हिचकता है तो दुर्योधन कहता है कि आज के युद्ध में घटोत्कच से बचेंगे तभी तो अर्जुन से लड़ने लायक रहेंगे। इस तर्क के बाद कर्ण घटोत्कच पर ब्रह्मास्त्र इस्तेमाल करता है। वही स्थिति अभी दिख रही है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को पता है कि 2029 में सर्वाइव करेंगे तभी 2034 में भी संभावना रहेगी। इसलिए 2034 के लिए तैयार किया गया ब्रह्मास्त्र 2029 के चुनाव में इस्तेमाल किया जाएगा। अगर इसका ठीक तरीके से इस्तेमाल हो गया तो कांग्रेस और अन्य भाजपा विरोधी पार्टियों के लिए आगे के चुनाव नामुमकिन की हद तक मुश्किल हो जाएंगे।
ऐसा कैसे होगा, इसे असम के प्रयोग से समझा जा सकता है या कुछ हद तक जम्मू कश्मीर से भी समझा जा सकता है। जम्मू कश्मीर में परिसीमन के बाद विधानसभा चुनाव हुआ। परिसीमन में जम्मू कश्मीर में सीटों की संख्या 83 से बढ़ कर 90 हो गई। ध्यान रहे पहले 87 सीटें जम्मू कश्मीर में थीं, लेकिन लद्दाख अलग होने के बाद 83 सीटें बचीं। परिसीमन के बाद उसमें सात सीटें बढ़ गईं। इनमें से छह सीटें जम्मू क्षेत्र में बढ़ीं और एक सीट कश्मीर घाटी में बढ़ीं। नई बनी छह सीटों में से 2025 के चुनाव में पांच पर भाजपा जीती और एक सीट निर्दलीय के खाते में गई। भाजपा ने 2014 में 25 सीटें हासिल की थीं, जो इस बार बढ़ कर 29 हो गईं। परिसीमन के बाद राज्य में पहली बार नौ सीटें एसटी समुदाय के लिए आरक्षित की गईं। लोकसभा चुनाव में भी परिसीमन के दौरान राजौरी अनंतनाग सीट में जम्मू क्षेत्र का कुछ इलाका जोड़ा गया, जिससे वहां जनसंख्या संरचना बदली। हालांकि तब भी वह सीट भाजपा नहीं जीत पाई, यह अलग मामला है।
इसी तरह असम में पहले माना जाता था कि मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या लगभग 39 है। यानी 39 सीटें ऐसी थीं, जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक थे। लेकिन 2023 में परिसीमन के बाद ऐसी सीटों की संख्या घट कर 20 से 22 रह गई है। इस तरह लगभग 105 सीटें ऐसी हो गईं, जहां चुनावी जीत हार में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका निर्णायक नहीं रह गई। असम में पहले से मुस्लिम आबादी की सघनता कम क्षेत्रों में थी लेकिन अब उसे चुनिंदा क्षेत्रों में और ज्यादा सघन बना दिया गया है। यह काम पश्चिम बंगाल में नहीं हो सका है इसलिए वहां 27 फीसदी मुस्लिम आबादी करीब सवा सौ सीटों पर निर्णायक हो जाती है। अगर वहां परिसीमन होता है तो उसके बाद शायद यह स्थिति नहीं रह पाए। सरकार का कहना है कि परिसीमन का काम जनसंख्या और भौगोलिक संरचना को ध्यान में रख कर किया जाता है लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि जिन दो राज्यों में परिसीमन हुआ है वहां हुए बदलाव का एडवांटेज भाजपा को मिलने की संभावना ज्यादा है।
दो राज्यों के अनुभवों के आधार पर यह सोच सकते हैं कि पूरे देश में लोकसभा और विधानसभा सीटों का परिसीमन होता है तो किस तरह से जमीन पर हालात बदल सकते हैं। ध्यान रहे सरकार ने जिस विधेयक को मंजूरी दी है उसमें लोकसभा सीटों की संख्या 50 फीसदी बढ़ाने का प्रस्ताव है। यानी लोकसभा सदस्यों की संख्या 816 हो जाएगी, जिसमें से एक तिहाई यानी 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी। इस एक दांव के कई फायदे हैं। पहला तो महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण लागू होगा, जिससे महिला मतदाताओं में भाजपा व प्रधानमंत्री मोदी के प्रति और सद्भाव बनेगा। दूसरा, उत्तर भारत में यानी हिंदी पट्टी के राज्यों में जहां सीटें बढ़ेंगी, उन राज्यों को राजनीतिक हैसियत बढ़ने का अहसास होगा, जिसका लाभ भाजपा ले सकती है। उत्तर व दक्षिण के विभाजन को लेकर विवाद हुआ तो भाजपा को और लाभ होगा। और तीसरा सबसे बड़ा लाभ यह है कि परिसीमन होगा तो असम व जम्मू कश्मीर जैसे प्रयोग हो सकते हैं, जिसका चुनावी लाभ भाजपा को मिल सकता है।
