ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजराइल जंग की न सिर्फ समयावधि लंबी होती जा रही है, बल्कि युद्ध का दायरा भी फैलता जा रहा है और साथ साथ इससे पैदा होने वाली मुश्किलें भी बढ़ती जा रही हैं। हर दिन एक नया संकट सामने आ रहा है और उससे निपटने के तात्कालिक उपाय नहीं दिख रहे हैं। यह भी ध्यान रखने की बात है कि इस बार के युद्ध में कुछ ऐसा हो रहा है, जो पहले कभी नहीं हुआ। अमेरिका और इजराइल दोनों सैन्य ठिकानों के साथ साथ नागरिकों की बुनियादी जरुरतों से जुड़े ठिकानों पर यानी सिविल इन्फ्रास्ट्रक्चर पर भी हमला कर रहे हैं।
जवाब में ईरान भी इजराइल के साथ साथ खाड़ी के दूसरे देशों के सिविल इन्फ्रास्ट्रक्चर को निशाना बना रहा है। इससे पूरे क्षेत्र में मानवीय संकट पैदा हो रहा है।
हैरानी की बात है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के पावर प्लांट्स को नष्ट कर देने की धमकी दे रहे हैं और कोई उनसे सवाल नहीं पूछ रहा है कि आप ऐसा कैसे कर सकते हैं? क्या किसी सभ्य समाज में इस तरह की धमकियों या हमलों की इजाजत दी जा सकती है? मिसाइलों और ड्रोन के हमलों में लोगों ने इस पर कम ध्यान दिया कि अमेरिका और इजराइल ने तेहरान की साइंस एंड टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी को नष्ट कर दिया। सोचें, ईरान पूरी इस्लामिक दुनिया में विज्ञान व तकनीक के मामले में सबसे आगे है। अमेरिका और इजराइल उसकी इस क्षमता को भी खत्म करना चाहते हैं। असल में वैश्विक समाज ने और संस्थानों ने अपनी नैतिक ताकत खो दी है, जिसके परिणाम ऐसी घटनाओं में दिख रहे हैं। रू
स लगातार यूक्रेन के ऊर्जा संयंत्रों पर हमला कर रहा है और यूक्रेन के लाखों नागरिकों के जीवन को संकट में डाल रहा है। अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति को अगवा करने और अपनी कठपुतली बैठाने के बाद क्यूबा की उर्जा नाकाबंदी कर रखी है, जिससे वहां के लाखों नागरिकों का जीवन प्रभावित हो रहा है। अब ट्रंप ईरान को धमका रहे हैं कि उसके ऊर्जा संयंत्र नष्ट कर देंगे और डिसेलिनेशन प्लांट्स को नष्ट कर देंगे। ध्यान रहे पश्चिम एशिया के ज्यादातर देशों में समुद्र का खारा पानी डिसेलिनेशन प्लांटस के जरिए पीने योग्य बनाया जाता है। अगर ऊर्जा संयंत्रों नष्ट होते हैं और वाटर प्लांट्स क्षतिग्रस्त होते हैं तो जिस स्तर का मानवीय संकट खड़ा होगा उसकी कल्पना नहीं की जा सकती है।
यह मानवीय संकट एक बड़े पलायन को जन्म देगा। रूस और यूक्रेन की जंग में दुनिया ने देखा है कि 50 लाख से ज्यादा लोगों ने पलायन किया है। अगर अमेरिका, इजराइल और ईरान की जंग जारी रहती है और इन देशों के साथ साथ खाड़ी देशों का बुनियादी ढांचा नष्ट होता है तो जिस पैमाने पर पलायन शुरू होगा उसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। अमेरिका को इसकी चिंता नहीं है लेकिन समूचा यूरोप इससे परेशान होगा। खाड़ी के पहले के युद्धों में पलायन का सबसे बड़ा असर यूरोप के देशों पर हुआ था। इस बार भी होगा। हालांकि अब यूरोप के देशों ने अपनी सीमाएं बंद की हैं और शरणार्थियों के मामले में नीतियां सख्त की हैं। अगर उन्होंने अपने यहां शरणार्थियों को जगह नहीं दी तो मानवीय संकट का दायरा और बढ़ जाएगा।
भारत के लगभग एक करोड़ लोग खाड़ी देशों में रहते हैं। अकेले सऊदी अरब में 35 लाख भारतीय रहते हैं। संयुक्त अरब अमीरात में भी 25 लाख के करीब लोग रहते हैं और कुवैत में 10 लाख लोग हैं। इन तीन देशों में 70 लाख के करीब लोग हैं। ईरान के हमले से ये देश सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। अमेरिका और इजराइल के हमले के जवाब में ईरान खाड़ी देशों के अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बना रहा है। सैन्य ठिकानों और एय़र डिफेंस सिस्टम पर हमले के बाद अब लड़ाई ऊर्जा और पानी के संयंत्रों तक पहुंच गई है। ऐसे में खाड़ी के देशों के लाखों लोग प्रभावित होंगे और भारतीय नागरिकों का पलायन तेज होगा। यह एक बड़ा मानवीय संकट है और साथ साथ भारत के लिए नई चुनौती पैदा कर रहा है।
पांच लाख से ज्यादा भारतीय नागरिक खाड़ी देशों से लौट चुके हैं। लेकिन अब भी ज्यादातर लोग वहां इस उम्मीद में रूके हैं कि जंग थम जाएगी और सब कुछ ठीक हो जाएगा। अब बिजली और पानी के प्लांट्स पर हमले से लोगों की उम्मीदें टूट रही हैं और मुश्किलें बढ़ रही हैं। इसलिए उनकी वापसी तेज हो सकती है। सऊदी अरब और यूएई में जो विकास हुआ है और दुनिया भर के लोग वहां रहने पहुंचे हैं वह अमेरिका की ओर से दी गई सुरक्षा गारंटी की वजह से है। अब वह सुरक्षा गारंटी समाप्त हो रही है। इन दोनों देशों में आर्थिक गतिविधियां भी प्रभावित हो रही हैं। इस वजह से वहां भी रोजगार की समस्या खड़ी होगी। इस वजह से भी अगर बड़ी संख्या में भारतीय वापस लौटते हैं तो खाड़ी के देशों से आने वाला रेमिटेंस भी कम होगा।
इस हकीकत से सब वाकिफ हैं कि ईरान किसी हाल में होरमुज की खाड़ी खोलने के लए राजी नहीं होगा। राष्ट्रपति ट्रंप की कोई धमकी काम नहीं आ रही है। होरमुज की खाड़ी पर जिस तरह की रणनीतिक बढ़त ईरान को हासिल है उसे देखते हुए यह नामुमकिन लग रहा है कि उसके साथ युद्ध विराम की संधि के बगैर यह खाड़ी खुलेगा और सुरक्षित आवाजाही बहाल होगी। उलटे ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर हमले तेज हुए या जमीनी सेना उतार कर होरमुज की खाड़ी को खुलवाने का प्रयास हुआ तो लाल सागर में बाब अल मंदेब खाड़ी को भी बाधित किया जाएगा। यह काम हूती की मदद से किया जाएगा।
होरमुज की खाड़ी नहीं खुलने का सबसे बड़ा नुकसान भारत को हो रहा है। भारत में तेल और गैस दोनों की आपूर्ति प्रभावित हो रही है। दुनिया के दूसरे देश भी प्रभावित हैं। दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देशों ने अपने यहां कई चीजों में कटौती शुरू कर दी है। दुनिया के प्रभावित होने का नतीजा यह है कि आर्थिक गतिविधियां धीमी हो रही हैं। एक खबर है कि बांग्लादेश में कपड़े का तैयार स्टॉक पड़ा रह गया है। दुनिया के ऑर्डर रूक गए हैं और तैयार कपड़े डिलीवर नहीं हो पा रहे हैं। ऐसा कई औऱ उत्पादों के साथ हो रहा है।
तेल, गैस और उर्वरक इन तीनों की आपूर्ति प्रभावित होने से ऊर्जा का संकट है और साथ साथ खाद्यान्न संकट के बादल भी मंडरा रहे हैं। खबर है कि ऑस्ट्रेलिया में इस साल किसान गेहूं की बुवाई कम कर रहे हैं क्योंकि खाद का संकट है। भारत में खरीफ की फसल खाद की कमी से प्रभावित हो सकती है। अगर हर जगह इस तरह की स्थिति बनती है तो पूरी दुनिया के सामने खाद्यान्न का संकट खड़ा हो सकता है। भारत में 50 हजार से ज्यादा औद्योगिक इकाइयों के प्रभावित होने की खबर है और एक रिपोर्ट के मुताबिक 20 हजार से ज्यादा इकाइयां बंद हो गई हैं। इसकी वजह से शहरों से पलायन शुरू हो गया है। एक तरफ रोजगार का संकट है तो दूसरी ओर गैस की अनुपलब्धता और महंगाई है। तभी अगर जंग थोड़े दिन और जारी रहती है तो भारत सहित पूरी दुनिया में संकट गहराएगा।
