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आजादी के तराने पर भी राजनीति

यह भारतीय जनता पार्टी की विशेषता है कि वह राजनीतिक फायदे के लिए किसी भी किसी पवित्र प्रतीक को विवाद और टकराव के अस्त्र में बदल सकती है। उसने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम को धार्मिक व राजनीतिक टकराव का प्रतीक बना कर इस्तेमाल किया तो अब आजादी के आंदोलन के सबसे पवित्र तराने को भी विवाद का विषय बना दिया है। अब राष्ट्रगीत वंदे मातरम राष्ट्रवाद का प्रतीक होने के साथ साथ सरकार के राजनीतिक विरोधियों को सजा देने का उपक्रम भी बन गया है।

सरकार ने एक ऐसा कानून बनाया है, जिसके जरिए वंदे मातरम के अपमान को संज्ञेय अपराध बना दिया गया है। इसके लिए सरकार ने 1971 के धार्मिक प्रतीकों वाले कानून को संशोधित किया। इस संशोधन के बाद कहा गया है कि राष्ट्रगान यानी जन गण मन की तरह राष्ट्र गीत यानी वंदे मातरम को भी सम्मान देना होगा अन्य़था कानूनी कार्रवाई होगी।

यह एक ऐसा कानून है, जो अपराध की तलाश में बनाया गया है। अब तक अपराध रोकने के लिए कानून बनते थे। लेकिन यह कानून अपराध तलाशने के लिए बनाया गया है। अगस्त 2026 में यह कानून अस्तित्व में आने से पहले जो काम अपराध नहीं था उसे इस कानून के जरिए अपराध बना दिया गया है और उसमें कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है। इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी। भाजपा की सरकार ने अपने को दूसरी पार्टियों खास कर कांग्रेस से ज्यादा राष्ट्रवादी दिखाने के लिए वंदे मातरम का सम्मान बढ़ाने का कानून बनाया है।

असल में भाजपा पर लगातार इस बात के आरोप लगते रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने कभी आजादी की लड़ाई में हिस्सा नहीं लिया। इतना ही नहीं आजादी के बाद कई दशक तक आरएसएस मुख्यालय पर तिरंगा नहीं फहराया गया। ऐसा लगता है कि उसकी भरपाई करने के मकसद से यह कानून लाया गया है। एक मकसद यह भी हो सकता है कि इस समय सरकार पेपर लीक से लेकर राम मंदिर में चढ़ावा चोरी जैसे कई विवादों में घिरी है तो उससे लोगों का ध्यान भटकेगा। लेकिन समस्या यह है कि इसी तरह अपराध की तलाश में सरकारें कानून बनाने लगें तो वह कहां जाकर रुकेगा, कोई नहीं बता सकता है।

बहरहाल, अपराध की तलाश में बनाए गए इस कानून का पहला शिकार कांग्रेस पार्टी बनी है। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर कांग्रेस मुख्यालय, इंदिरा भवन में वंदे मातरम के गायन के दौरान एक विवाद हुआ। पहले दो अंतरे तक सब कुछ ठीक रहा लेकिन जैसे ही तीसरा अंतरा शुरू हुआ वैसे ही हलचल मच गई। राहुल गांधी की भौवें तनीं तो सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी वंदे मातरम गाना छोड़ कर सेवा दल के किसी व्यक्ति को बुला लिया।

आरोप है कि उन्होंने वंदे मातरम रुकवाने का प्रयास किया। हालांकि बाद में जयराम रमेश ने सफाई दी कि सोनिया गांधी ने खड़गे के लिए कुर्सी मंगाने को कहा था क्योंकि वे काफी देर से खड़े थे। हालांकि यह सफाई सिर्फ कानूनी पचड़े से बचने का रास्ता भर है। ध्यान रहे यह कोई राजकीय समारोह नहीं था इसलिए सिर्फ दो ही अंतरे बजते तो कोई अपराध नहीं होता। लेकिन अगर तीसरा अंतरा बजने लगा और उसे बीच में रोकने या बाधा डालने का प्रयास साबित हो जाए तो कानूनी कार्रवाई हो सकती है। इसलिए कुर्सी मंगाने वाली बात कही गई है।

लेकिन कानूनी मामले से ज्यादा यह राजनीतिक मामला है कांग्रेस ने बुधवार, 19 अगस्त को अपनी कार्य समिति की बैठक में स्पष्ट कर दिया कि वह वंदे मातरम के दो ही अंतरे गाएगी। वैसे भी निजी समारोह में सभी छह अंतरे गाने की अनिवार्यता नहीं है। हां, कांग्रेस अगर राजकीय समारोहों में भी दो ही अंतरे गाने पर अड़ेगी तो विवाद बढ़ेगा। फिलहाल भाजपा का विरोध और कांग्रेस का दो अंतरे पर अड़ना एक राजनीतिक लाइन है। दोनों अपनी अपनी कांस्टीट्यूएंसी को ध्यान में रख कर अपना स्टैंड ले रहे हैं। हालांकि अगर भाजपा सोच रही है कि इससे वह कांग्रेस को देश विरोधी या हिंदू विरोधी साबित कर देगी या आजादी की लड़ाई में उसकी भूमिका को मिटा देगी तो वैसा नहीं होने वाला है और अगर कांग्रेस समझती है कि इससे उसे ज्यादा सेकुलर माना जाएगा और मुस्लिम उसके साथ ज्यादा मजबूती से जुड़ेंगे तो वह भी गलतफहमी में है। वोट का फैसला ऐसे नैरेटिव से आमतौर पर नहीं होता है।

बहरहाल, कांग्रेस ने अपने स्टैंड को जस्टिफाई करने के लिए यह कहना शुरू किया है कि जो वंदे मातरम महात्मा गांधी ने गाया वही कांग्रेस गाएगी। असल में 1937 के कांग्रेस अधिवेशन में तय हुआ था कि वंदे मातरम के दो अंतरे गाए जाएंगे क्योंकि बाकी चार अंतरों में हिंदू देवी, देवताओं और धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल किया गया है। यह फैसला करने के लिए चार लोगों की एक कमेटी बनी थी, जिससे जवाहरलाल नेहरू, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, आचार्य नरेंद्र देव और मौलाना आजाद जैसे लोग थे।

इस कमेटी ने गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर से सलाह ली और उसके बाद तय किया कि दो अंतरे ही गाए जाएंगे। उस समय आजादी की लड़ाई में हिंदू और मुस्लिम एकता बनाए रखने के लिए यह फैसला हुआ। यह भी ध्यान रखने की बात है कि यह कमेटी महात्मा गांधी की सलाह पर बनाई गई थी। यानी उस समय कांग्रेस के सारे बड़े नेताओं ने मिल कर यह फैसला किया है। गांधी, टैगोर, नेताजी सबकी भूमिका इसमें थी।

आजादी के बाद जब भारत गणतंत्र बना तो राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने वंदे मातरम को राष्ट्रगीत के रूप में मान्यता दी और कहा कि पहले दो अंतरे गाए जाएंगे। उसके बाद से राजकीय समारोहों में सिर्फ पहले दो अंतरे ही गाए जाने की परंपरा रही। यह गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित राष्ट्रगान के मामले जैसा ही है। राष्ट्रगान में भी छह अंतरे हैं लेकिन पहले दो ही अंतरे गाए जाते हैं। इसे सहज रूप से स्वीकार किया गया है। केंद्र की सत्ता में आने के 12 साल के बाद अचानक सरकार को ख्याल आया कि वंदे मातरम का सम्मान बढ़ाने के लिए सभी छह अंतरे को अनिवार्य किया जाए। इसके लिए कानून बना दिया गया। तभी यह तय मानें कि इस फैसले का वंदे मातरम का सम्मान बढ़ाने से कोई लेना देना नहीं है।

वंदे मातरम सिर्फ दो शब्द भी कहें तो वही अर्थ प्रतीकित होता है, जो पूरे गाने से होता है। महात्मा गांधी के पौत्र रामचंद्र गांधी ने एक बार कहा भी था कि वंदे मातरम दो शब्द ही काव्य का प्रतीक हैं, जैसे सत्यमेव जयते है। राष्ट्रीय आंदोलन में दो शब्द वंदे मातरम ही नारा बने थे। 1905 में बंग विभाजन के बाद से ही इस नारे का इस्तेमाल आजादी की लड़ाई में होता रहा। आजादी के बाद भी इस नारे का सम्मान के साथ इस्तेमाल होता रहा। अब इसका सम्मान बढ़ाने के नाम पर कानून बनाने का इसके सिवा कोई औचित्य नजर नहीं आता कि इसे एक राजनीतिक हथियार बनाना है। इसमें एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण मुसलमान इसका विरोध करते हैं। नया कानून सरकारी सहायता प्राप्त मदरसों में भी इसे गाना अनिवार्य करता है। ऐसे में टकराव का एक नया मोर्चा खुल रहा है। इसके असर पर नजर रखने की जरुरत होगी।

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