यह सवाल हो सकता है कि महाराष्ट्र की नगरपालिकाओं के चुनाव में ऐसा क्या है, जिसका राष्ट्रीय राजनीति के नजरिए से विश्लेषण होना चाहिए? आखिर पिछले दिनों पंजाब में स्थानीय निकाय चुनाव हुए तो सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी ने क्लीन स्वीप किया तो तेलंगाना में भी स्थानीय निकाय चुनाव में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी ने सफलता का परचम लहराया है। हाल के दिनों में केरल एकमात्र अपवाद है, जहां स्थानीय निकाय चुनाव में सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट बुरी तरह से हारा और कांग्रेस ने बड़ी जीत दर्ज की।
हालांकि उसके भी कारण स्पष्ट हैं। एलडीएफ की 10 साल की सत्ता के खिलाफ नाराजगी लोकसभा चुनाव में भी प्रकट हुई और स्थानीय निकाय चुनाव में भी प्रकट हुई। इस अपवाद के बावजूद यह एक सामान्य निष्कर्ष है कि स्थानीय निकाय चुनावों में वही जीतता है, जिसकी राज्य में सरकार होती है। शायद ही कभी इसका अपवाद होता है।
इस निष्कर्ष या स्थापित राजनीतिक सिद्धांत के आधार पर देखें तो महाराष्ट्र की नगरपालिकाओं के चुनाव में कुछ भी नया नहीं है। ध्यान रहे इससे पहले आखिरी बार 2017 में महाराष्ट्र में नगर निकायों के चुनाव हुए थे और तब भी मोटे तौर पर नतीजे ऐसे ही आए थे। इसके बावजूद इस बार के चुनावों का कुछ खास संदेश है और उनका विश्लेषण होना चाहिए। इससे पहले मुंबई नगरपालिका यानी बीएमसी और अन्य शहरी निकायों के चुनाव जैसी सामान्य परिस्थितियों में होते थे इस बार वैसा नहीं था। पिछले चुनाव के बाद करीब नौ साल में महाराष्ट्र की राजनीति बहुत बदल गई है।
बीएमसी पर करीब पांच दशक तक कंट्रोल रखने वाला ठाकरे परिवार कमजोर हुआ है। शिव सेना का दो हिस्सों में विभाजन हो गया है। महाराष्ट्र की समकालीन राजनीति के सबसे बड़े नेता शरद पवार की बनाई पार्टी एनसीपी दो हिस्सों में बंट गई है। उनके भतीजे अजित पवार असली एनसीपी के मालिक हैं। इस बार का चुनाव दोनों बड़ी प्रादेशिक पार्टियों के विभाजन के बाद का पहला चुनाव था और भारतीय जनता पार्टी के महाराष्ट्र की राजनीति की केंद्रीय ताकत बनने के बाद का भी पहला चुनाव था।
इस चुनाव की एक खास बात यह भी थी कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व यानी नरेंद्र मोदी और अमित शाह की छाया से मुक्त होकर पहली बार स्वतंत्र रूप से अपने नेतृत्व के दम पर चुनाव लड़े। याद करें कैसे हैदराबाद नगर निगम के चुनाव में प्रचार करने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह गए थे। इस बार मोदी, शाह और योगी या भाजपा का राष्ट्रीय स्तर का कोई भी नेता प्रचार के लिए नहीं गया। अकेले देवेंद्र फड़नवीस ने पूरे राज्य में प्रचार किया। वे मुंबई, ठाणे, पुणे की गलियों में घूमे। जहां गाड़ी पहुंचने का साधन नहीं था वहां वे मोटरसाइकिल से गए। सो, इस बार के चुनाव की कामयाबी ‘देवा भाऊ’ के रूप में देवेंद्र फड़नवीस की जगह को और मजबूत करने वाला था। विधानसभा चुनाव की जीत के बाद उनको साबित करना था कि वे महाराष्ट्र की राजनीति के चाणक्य और चंद्रगुप्त दोनों हैं। उन्होंने यह साबित किया और निश्चित रूप से इसका असर आने वाले समय में भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ेगा।
पिछले दो साल में शरद पवार और उद्धव ठाकरे के लिए चुनावी मुकाबला एक-एक की बराबरी पर छूटा था। 2024 के मई में लोकसभा चुनाव में भाजपा विरोधी महाविकास अघाड़ी ने शानदार प्रदर्शन किया था। राज्य की 48 में से 31 सीटों पर अघाड़ी की जीत हुई थी। कांग्रेस ने 13 सीटें जीतीं तो उद्धव ठाकरे की शिव सेना ने नौ और शरद पवार की एनसीपी ने आठ सीटें जीतीं। भाजपा और उसकी दोनों सहयोगी पार्टियां 17 सीटों पर सिमट गईं, जबकि चुनाव से पहले उनके पास 44 सीटें थीं। उन्होंने 27 सीट गंवाई। लेकिन उसी साल हुए विधानसभा चुनाव में महाविकास अघाड़ी साफ हो गया और भाजपा के नेतृत्व वाली महायुति ने 288 में से 230 सीटें जीत लीं। अकेले भाजपा को 132 सीटें मिलीं।
एकनाथ शिंदे की पार्टी ने 51 और अजित पवार की पार्टी ने 47 सीटें जीतीं। पूरा महाविकास अघाड़ी 46 सीटों पर सिमट गया। सो, एक-एक की बराबरी के बाद नगरपालिका का चुनाव निर्णायक था। इसमें महायुति ने विधानसभा चुनाव से बेहतर प्रदर्शन किया। 29 में से 25 महानगरपालिकाओं में महायुति के मेयर बनेंगे। इससे पहले ग्रामीण निकायों के चुनाव में भी महायुति ने बहुत बड़ी जीत हासिल की थी।
सो, अब महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी यानी भाजपा विरोधी पार्टियों के गठबंधन को अपने भविष्य को लेकर नए सिरे से विचार करने की जरुरत है। यह इसलिए जरूरी है क्योंकि एक एक करके ऐसे राज्यों में भाजपा अपना वर्चस्व स्थापित कर रही है, जो पारंपरिक रूप से उसके मजबूत आधार वाले राज्य नहीं रहे हैं। महाराष्ट्र ऐसे ही राज्यों में से है। वहां 2014 तक लगातार 15 साल कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार थी और हारने के बाद भी कांग्रेस 30 फीसदी वोट कमांड करती थी। बहुत समय नहीं बीता, जब भाजपा वहां शिव सेना के सहारे राजनीति करती थी।
शिव सेना बड़े भाई की भूमिका में होती थी। लेकिन वहां भाजपा ने शिव सेना को तोड़ा और फिर शरद पवार की एनसीपी को तोड़ा और अब अकेले दम पर बाकी सभी पार्टियों की कुल जमा हैसियत के बराबर पहुंच गई है। महाराष्ट्र उसके लिए गुजरात, मध्य प्रदेश जैसा राज्य बन रहा है। बिहार भी ऐसा ही राज्य है और ओडिशा भी। भाजपा पांचवें और छठे दशक वाली कांग्रेस की तरह पूरे देश की सबसे बड़ी पार्टी बनती जा रही है और उसे रोकना कांग्रेस या प्रादेशिक क्षत्रपों के वश की बात नहीं रह गई दिखती है।
जैसे जैसे यह धारणा बन रही है कि कांग्रेस या दूसरी प्रादेशिक पार्टियां भाजपा को नहीं रोक पा रही हैं और इस असफलता से घबरा से कांग्रेस के नेता भाजपा में जा रहे हैं या प्रादेशिक पार्टियां सीधे भाजपा से हाथ मिला ले रही हैं वैसे वैसे देश के मुस्लिम मतदाता नए विकल्प की तलाश तेज करते जा रहे हैं। महाराष्ट्र की नगरपालिकाओं के चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया एमआईएम को मिली कामयाबी इसका संकेत है। छत्रपति संभाजीनगर में वह दूसरे नंबर की पार्टी बनी है तो मालेगांव में पहले नंबर की पार्टी बनी है। नांदेड़ और मुंबई में भी उसने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया। मुस्लिम बहुल इलाकों में बिना किसी हिचक के मुस्लिम मतदाताओं ने ओवैसी की पार्टी का समर्थन किया। यह परिघटना बिहार विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिली थी। यह वैचारिक स्तर पर भी कांग्रेस और दूसरी भाजपा विरोधी पार्टियों की विफलता को रेखांकित करता है। इसका बहुत बड़ा असर आने वाले दिनों में देश की राजनीति पर पड़ेगा।
महाराष्ट्र की नगरपालिकाओं के चुनाव नतीजों का बहुत साफ संदेश ठाकरे परिवार के लिए है तो पवार परिवार के लिए भी है। दोनों तेजी से अपनी प्रासंगिकता गंवा रहे हैं। मुंबई छोड़ कर बाकी उन सभी हिस्सों से उद्धव ठाकरे की पार्टी साफ हो गई, जहां पारंपरिक रूप से शिव सेना का असर था। ठाणे और कल्याण डोंबिवली का इलाका एकनाथ शिंदे ले गए तो कोंकण का इलाका नारायण राणे के साथ चला गया। पवार परिवार ने तो पश्चिमी महाराष्ट्र और मराठावाड़ा दोनों इलाकों में अपना आधार गंवा दिया। पुणे, पिंपरी चिंचवाड़ और परभणी में शरद और अजित पवार की पार्टी मिल कर लड़े थे फिर भी कोई असर नहीं हुआ। उनकी पार्टी बुरी तरह से हारी।
उद्धव ठाकरे के लिए संतोष की बात है कि मुंबई में मेयर पद भले नहीं मिला लेकिन आगे की राजनीति करने के लिए मराठा वोटों का आधार बच गया। लेकिन इससे उप राष्ट्रीयता की राजनीति की सीमाएं भी जाहिर हुई हैं। उनको भी अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना होगा। उनके दादा प्रबोधंकर ठाकरे ने बहुजन आधारित मराठी अस्मिता का वैचारिक आधार बनाया था, जिसे बाल ठाकरे ने लोकप्रिय नारों से आगे बढ़ाया। शिव सेना को भाजपा ब्रांड हिंदुत्व के समानांतर अपने हिंदुत्व की राजनीति बचानी है तो मराठी अस्मिता के साथ जातीय व सामाजिक समीकरण पर भी ध्यान देना होगा।
पवार परिवार एकजुट होने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। ऐसा करके वे मराठा राजनीति में अपनी प्रासंगिकता कितनी बनाए रख पाते हैं यह देखने वाली बात होगी।
महाराष्ट्र चुनाव का एक संदेश भाजपा की अपनी सहयोगी पार्टियों के लिए भी है। भाजपा ने दिखा दिया है कि महाराष्ट्र में कामयाबी उसके साथ रह कर ही मिलेगी। जहां भी भाजपा के सहयोगी शिव सेना और एनसीपी उससे अलग लड़े वहां या तो भाजपा ने उनको हराया या कड़ी टक्कर दी। उद्धव ठाकरे की पार्टी की विफलता भी भाजपा की सहयोगी पार्टियों के लिए एक संदेश है।
