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भारत में हर जांच संदिग्ध क्यों हो जाती है?

Ahmedabad, Jun 12 (ANI): The wing of an Air India plane, B787 Aircraft VT-ANB, while operating flight AI-171 from Ahmedabad to Gatwick, that has crashed immediately after takeoff with 242 passengers onboard, in Ahmedabad on Thursday. (ANI Photo)

यह कमाल है कि भारत में कैसी भी जांच हो वह संदिग्ध हो जाती है। जांच एजेंसी की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल उठने लगते हैं और उसकी जांच रिपोर्ट संदेह के घेरे में आ जाती है। फिर जांच करने वाली एजेंसी चाहे सेबी हो या सीबीआई हो, जेपीसी हो या एएआईबी हो। शायद ही कोई जांच रिपोर्ट आती होगी, जिसकी फाइंडिंग को आंख बंद करके लोग स्वीकार करते होंगे या जिसे चुनौती नही दी जाती होगी। अभी अहमदाबाद विमान हादसे को लेकर एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो यानी एएआईबी की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट आई है। इस जांच रिपोर्ट के सामने आने के बाद ही कई सवाल उठ रहे हैं। पहला सवाल यह है कि क्या सचमुच अमेरिकी कंपनी बोइंग को बचाने की कोशिश हो रही है? दूसरा सवाल यह है कि क्या विमान हादसे की जांच रिपोर्ट का भारत और अमेरिका के बीच होने वाली व्यापार संधि से कोई लेना देना है? और तीसरा सवाल यह है कि जांच की शुरुआत रिपोर्ट जारी होने से पहले कैसे लीक हुई और कैसे अमेरिकी मीडिया ने इसके बारे में छापना शुरू किया? हालांकि यह भी सवाल है कि ये तीनों सवाल जायज हैं या किसी साजिश थ्योरी का हिस्सा हैं, जिसका कोई ठोस आधार नहीं है?

पहला सवाल बोइंग को बचाने का है। ध्यान रहे बोइंग विमान बनाने वाली दुनिया की दो शीर्ष कंपनियों में से एक हैं। दूसरी कंपनी फ्रांस की एयरबस है। अहमदाबाद विमान हादसे के बाद बोइंग के शेयरों में गिरावट आई और उसके विमानों की क्वालिटी को लेकर सवाल उठे। ये सवाल दुनिया भर में उठे। लेकिन भारत में पहले दिन से इसका बचाव शुरू हो गया। तब अचानक बोइंग विमानों की एक के बाद एक उड़ानें रद्द हो रही थीं या रास्ते से वापस लौट रही थीं। सबमें कुछ न कुछ तकनीकी खामी सामने आ रही थी। डीजीसीए की जांच में एक दर्जन से ज्यादा गड़बड़ियां सामने आई थीं। पता नहीं उन गड़बड़ियों को ठीक किया गया या नहीं लेकिन अब शिकायतें एकदम से बंद हो गई हैं और लगभग हर मामले में बोइंग के विमानों को क्लीन चिट दे दी गई है।

पिछले दिनों संसद की स्थायी समिति ने एयर इंडिया, डीजीसीए और अन्य विमानन कंपनियों को बुलाया था, जहां एयर इंडिया ने बोइंग के ड्रीमलाइनर विमानों का बचाव करते हुए कहा कि पूरी दुनिया में इसके 11 सौ विमान उड़ रहे हैं और इसमें कोई कमी नहीं है। सोचें, एयर इंडिया ने कौन सी जांच कराई थी, जो उसने सारी दुनिया की तरफ से बोइंग को क्लीन चिट दे दी? इसके बाद एएआईबी की जांच रिपोर्ट आई तो उसमें भी तकनीकी खामी की बजाय इस बात की ओर इशारा किया गया कि मानवीय भूल हो सकती है। दोनों फ्यूल स्विच ऑफ होने को हादसे की वजह बताया गया है।

लेकिन कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर में स्विच बंद किए जाने की आवाज नहीं आई है। दूसरे ये स्विच नॉब या लीवर की तरह होते हैं, जिन्हें खींच कर घुमाना होता है। तीसरे, अगर स्विच बंद थे तो पायलट्स के सामने पैनल में इसका अलर्ट क्यों नहीं आया? ध्यान रहे यह बहुत बेसिक फीचर है। सामान्य गाड़ियों तक में अगर गेट खुला रह जाए, सीट बेल्ट नहीं लगाई जाए या हैंडब्रेक लगा हुआ तो सामने पैनल में उसका अलर्ट आ जाता है। लेकिन विमान का फ्यूल स्विच ऑफ था और पैनल पर कोई अलर्ट नहीं आया तो फिर यह मानवीय भूल कैसे है? इससे तो तकनीकी खामी साफ जाहिर होती है। लेकिन ठीकरा पायलट्स पर फोड़ने की तैयारी है और जब विशेषज्ञों व पायलट्स एसोसिएशन की ओर से इसका विरोध हुआ तो कहा जा रहा है कि अंतिम रिपोर्ट का इंतजार करें। क्या अंतिम रिपोर्ट बदल जाएगी?

दूसरा सवाल यह है कि क्या भारत और अमेरिका बीच चल रही व्यापार संधि की वार्ता से यह मामला जुड़ रहा है? क्या भारत सरकार विमान हादसे को मोलभाव के लिए इस्तेमाल कर रही है? ध्यान रहे चीन ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ अटैक को ठंडा करने के लिए रेयर अर्थ मैटेरियल्स के साथ साथ बोइंग का ही इस्तेमाल किया था। उसने बोइंग विमानों की डिलीवरी रोक दी थी। बाद में आनन फानन में अमेरिका ने चीन से व्यापार संधि कर ली तो चीन ने बोइंग की डिलीवरी पर से रोक हटा ली। भारत में भी एयर इंडिया ने दो साल पहले 2023 में एयरबस और बोइंग से करीब पांच सौ विमान खरीदने का सौदा किया था और इसके अलावा दो सौ अतिरिक्त विमानों की खरीद की बात चल रही है। अगर सौदा रद्द होता है तो उसका फायदा एयरबस को होगा। इसके साथ ही बोइंग की साख दुनिया भर के बाजार में खराब होगी। तभी ऐसा लग रहा है कि भारत इसका इस्तेमाल मोलभाव के लिए कर रहा है। अन्यथा कोई कारण नहीं है कि भारत के साथ व्यापार संधि की शर्तों पर बात नहीं बनने के बावजूद राष्ट्रपति ट्रंप भारत के ऊपर कोई टैरिफ नहीं लगा रहे हैं। वे 20 से ज्यादा देशों पर 30 से लेकर 50 फीसदी तक टैरिफ लगा चुके हैं। इसमें दक्षिण कोरिया और जापान जैसे अमेरिका के सहयोगी हैं तो यूरोपीय संघ जैसा साझीदार भी है। लेकिन भारत को बार बार मोहलत दी जा रही है और भारत भी कृषि व डेयरी उत्पादों को छूट देने या उन पर टैरिफ कम करने को तैयार नहीं है। तभी यह सवाल उठ रहा है कि क्या प्रांरभिक रिपोर्ट में विमान कंपनी को बचाने और फिर अंतिम रिपोर्ट का इंतजार करने की बात करके दवाब बनाया जा रहा है?

तीसरा सवाल यह है कि एएआईबी की जांच रिपोर्ट लीक कैसे हुई? एएआईबी की प्रारंभिक जांच की रिपोर्ट सामने आने से पहले ही इसके अंश अमेरिकी मीडिया में छपने लगे थे। ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ ने सबसे पहले सूत्रों के हवाले से इसके बारे में खबर दी और साफ साफ शब्दों में बोइंग कंपनी को क्लीन चिट देते हुए कहा कि विमान के इंजन, डिजाइन या उसके फंक्शन में कोई कमी नहीं थी। उसने पायलट्स को दोषी ठहराया। फिर ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ ने भी इस बारे में खबर छापी और पायलट्स पर दोष डाला। फिर रिपोर्ट आई तो उसमें भी मानवीय भूल की ओर इशारा किया गया। ध्यान रहे पहले खबर आई थी कि भारत सरकार ब्लैक बॉक्स का डाटा एनालाइज करने के लिए उसे अमेरिका भेजेगी। बाद में इसका खंडन कर दिया गया और कहा गया कि डाटा भारत में ही एनालाइज होगा। लेकिन फ्लाइट डाटा रिकॉर्डर में दो पायलटों की बीच की कौन सी बात रिकॉर्ड हुई है इसकी जानकारी पहले अमेरिकी मीडिया को मिल गई! दोनों के बीच फ्यूल स्विच ऑफ होने की बात सुनाई देती है। इस आधार पर अमेरिकी मीडिया ने कंपनी को क्लीन चिट दे दी। यह भी कम हैरानी की बात नहीं है कि सरकारी जांच की रिपोर्ट शुक्रवार, 11 जुलाई की रात ढाई बजे जारी हुई। रात के ढाई बजे कौन सी सरकारी रिपोर्ट जारी होती है?  क्या अमेरिकी मीडिया में खबरें आ जाने के बाद आनन फानन में इसे रात के ढाई बजे जारी करने का फैसला किया गया?

इन सवालों के जवाब सरकार को देना चाहिए। लेकिन अगर सरकार जवाब नहीं देती है तब भी बहुत जल्दी सारी चीजें सामने आ जाएंगी। जैसे व्यापार संधि कैसी होती है इससे कुछ पता चल जाएगा। बोइंग के साथ विमान खरीद का सौदा जारी रहता है तो उससे भी कुछ संकेत मिलेगा और एएआईबी की अंतिम जांच रिपोर्ट में से तो सब कुछ साफ ही हो जाएगा। लेकिन यह दुर्भाग्य है कि भारत में चाहे किसी भी एजेंसी की जांच हो उसकी रिपोर्ट असंदिग्ध नहीं रह पाती है। वह सौ फीसदी सही हो और सहज भाव से स्वीकार्य हो जाए, ऐसा कभी नहीं होता है, चाहे रिपोर्ट 260 बेकसूर लोगों की मौत से जुड़ी हुई ही क्यों न हो!

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