nayaindia लोकसभा चुनाव: राजनीतिक गठबंधन की महत्वपूर्ण बातें
अजीत द्विवेदी

सबको चाहिए एक अदद गठबंधन

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लोकसभा चुनाव

अगले लोकसभा चुनाव के लिए सभी पार्टियों को किसी न किसी तरह के गठबंधन की जरुरत है। चाहे वह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा हो या देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस हो, चाहे वह सबसे नई बनी आम आदमी पार्टी हो या सुदूर दक्षिण की कोई छोटी पार्टी सबको गठबंधन करना है क्योंकि उसके बगैर किसी की कोई हैसियत नहीं बचेगी। असल में अगला चुनाव पूरी तरह से आमने-सामने का चुनाव होगा, जिसमें एक तरफ भाजपा होगी और दूसरी तरफ कांग्रेस।

यह राजनीतिक लड़ाई के साथ विचारधारा की भी लड़ाई होगी, जिस पर राहुल गांधी लगातार जोर देते रहे हैं। इसलिए हर पार्टी को अपना पक्ष चुनना है। पक्ष चुनने का यह काम विचारधारा के आधार होगा और साथ ही राजनीतिक लाभ-हानि के आधार पर भी होगा। के चंद्रशेखर राव की भारत राष्ट्र समिति और जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस अपवाद की तरह हैं, लेकिन उनको भी चुनाव आते आते गठबंधन नहीं तो परदे के पीछे से सीटों की एडजस्टमेंट करनी होगी। ममता बनर्जी भी गठबंधन या परोक्ष रुप से सीट एडजस्टमेंट के विकल्प के बीच झूल रही हैं।

विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ की दो पार्टियों की कहानी सबसे दिलचस्प है। कांग्रेस नहीं चाहती थी कि आम आदमी पार्टी से तालमेल हो और दूसरी ओर समाजवादी पार्टी नहीं चाहती थी कि कांग्रेस के साथ गठबंधन हो। लेकिन आप को लेकर कांग्रेस ने अपनी सोच बदली है तो कांग्रेस के बारे में समाजवादी पार्टी की धारणा बदली है। इसका नतीजा है कि ये तीनों पार्टियां सीट बंटवारे पर बात कर रही हैं और जल्दी ही इनके बीच सीट शेयरिंग का फॉर्मूला बन जाएगा।

असल में कांग्रेस का विकल्प बनने की राजनीति कर रही आम आदमी पार्टी को समझ में आ रहा है कि अगर इस बार भी लोकसभा चुनाव में उसका प्रदर्शन नहीं सुधरा तो उसके विकास की संभावना समाप्त नहीं होगी तो कमजोर जरूर हो जाएगी। गौरतलब है कि पार्टी के गठन के बाद आप ने 2014 और 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ा था। 2014 में उसे चार और 2019 में सिर्फ एक सीट मिली थी। लगातार तीसरे चुनाव में अगर इसी तरह का प्रदर्शन रहा तो अरविंद केजरीवाल की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा पर ब्रेक लग जाएगा। साथ ही दिल्ली और पंजाब से बाहर नए राज्यों में पैर फैलाने की संभावना भी खत्म हो जाएगी।

दूसरी ओर कांग्रेस को अंदाजा है कि आम आदमी पार्टी के साथ जाने से उसको दीर्घावधि में नुकसान हो सकता है। फिर भी वह तालमेल इसलिए कर रही है क्योंकि उसको पता है कि अरविंद केजरीवाल जीतें भले नहीं लेकिन कुछ राज्यों में कांग्रेस को भी नहीं जीतने देंगे। अगर दोनों अलग अलग लड़े तो दिल्ली और पंजाब की सभी 20 सीटें गंवा सकते हैं। ध्यान रहे पिछली बार पंजाब में आम आदमी पार्टी को साढ़े सात फीसदी के करीब वोट आया था लेकिन उस समय वह राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी थी।

अभी पंजाब में 92 विधायकों के साथ उसकी सरकार है। इसलिए निश्चित रूप से उसका वोट बढ़ेगा और उसका बड़ा नुकसान कांग्रेस को होगा। पिछली बार आठ सीट जीतने वाली कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाएगी। जैसे दिल्ली में दो बार से हो रहा है। पिछली बार दिल्ली में कांग्रेस को 22 फीसदी और आम आदमी पार्टी को 18 फीसदी वोट आया था। इस बार भी ऐसी ही स्थिति रही तो दोनों में से किसी को एक भी सीट नहीं मिलेगी। गोवा और गुजरात में भी आम आदमी पार्टी ऐसी स्थिति पैदा कर सकती है और हरियाणा में भी केजरीवाल कांग्रेस को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए इन पांच राज्यों में दोनों पार्टियां तालमेल करेंगी।

समाजवादी पार्टी इस बार कांग्रेस से दूरी बनाए हुए थी और उसको लग रहा था कि जिस तरह 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने गठबंधन करके 125 सीटें जीत ली थी उसी तरह लोकसभा में जीत जाएगी। लेकिन हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में भाजपा की बड़ी जीत के बाद सपा को अहसास हुआ है कि अकेले भाजपा को हराना मुश्किल होगा। दूसरी ओर कांग्रेस को भले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ढाई फीसदी वोट आया था लेकिन लोकसभा में उसका वोट प्रतिशत बढ़ सकता है क्योंकि राष्ट्रीय चुनाव में सेकुलर मतदाताओं की पहली पसंद कांग्रेस होती है।

तभी सपा ने जिद छोड़ी है तालमेल की बात हो रही है। कांग्रेस की जो पुरानी सहयोगी पार्टियां हैं, जैसे राजद, जेएमएम, एनसीपी, डीएमके आदि उनके साथ तालमेल में कोई समस्या नहीं आएगी। नई सहयोगियों में शिव सेना उद्धव ठाकरे गुट को तालमेल की जरुरत का अहसास है इसलिए वह कांग्रेस से गठबंधन की बात कर रही है। इन सभी पार्टियों का गठबंधन होने में कोई दिक्कत नहीं आएगी क्योंकि सबको गठबंधन की जरुरत है।

यही स्थिति दूसरी ओर भी है। भाजपा ने कर्नाटक में पिछली बार 28 में से 25 सीटें जीती थी लेकिन पिछले साल मई में विधानसभा चुनाव हारने के बाद पार्टी ने तत्काल अपनी रणनीति बदली और एचडी देवगौड़ा की जेडीएस के साथ तालमेल कर लिया। परिवारवाद और भ्रष्टाचार के अपने ही उठाए मुद्दों को ताले में बंद करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देवगौड़ा की पार्टी से तालमेल किया और उनके परिवार के साथ फोटो खिंचवा कर कर्नाटक की राजनीति में बड़ा मैसेज दिया। पंजाब में भाजपा कई दशकों से लोकसभा चुनाव अकेले नहीं लड़ी है। पिछली बार भी वह अकाली दल के साथ लड़ी थी और दो सीटों पर जीत मिली थी।

इन दो सीटों को बचाने के लिए भाजपा को अकाली दल की जरुरत महसूस हो रही है। तभी दोनों पार्टियों के बीत तालमेल की बात चल रही है। उधर महाराष्ट्र में भाजपा ने शिव सेना को तोड़ कर एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री जरूर बना दिया लेकिन उसको पता है कि सिर्फ शिंदे से काम नहीं चलेगा इसलिए उसने शरद पवार की पार्टी एनसीपी भी तोड़ी और अजित पवार को उप मुख्यमंत्री बनाया। वहां भी परिवारवाद और भ्रष्टाचार के मुद्दे को भाजपा ने ताले में बंद कर दिया।

भाजपा बिहार में लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास, राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी, राष्ट्रीय लोक जनता दल और हिंदुस्तान अवाम मोर्चा से तालमेल किए हुए है फिर भी भरोसे में नहीं है और चाहती है कि किसी तरह से नीतीश कुमार एनडीए में वापस लौटें। वह नीतीश के अलावा विकासशील इंसान पार्टी के संपर्क में भी है। यानी कांग्रेस के छह पार्टियों वाले गठबंधन के मुकाबले पांच-छह पार्टियों का गठबंधन बनाना है। उत्तर प्रदेश में जहां अयोध्या में राममंदिर का उद्घाटन होना है वहां भी भाजपा अपना दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और निषाद पार्टी से तालमेल किए हुए है लेकिन रालोद के साथ तालमेल की संभावना देखी जा रही है।

आंध्र प्रदेश में वह टीडीपी और जन सेना पार्टी के साथ तालमेल की बात कर रही है तो तमिलनाडु में डीएमके व अन्ना डीएमके से बची पार्टियों के संपर्क में है। एक तरफ विपक्ष का 26 पार्टियों का गठबंधन बना तो भाजपा ने 38 पार्टियों की बैठक बुला कर दिखाया कि उसके पास भी गठबंधन सहयोगियों की कमी नहीं है। इससे भी जाहिर होता है कि सबको एक गठबंधन की जरुरत है। इससे यह भी साफ हो रहा है कि अगले चुनाव में निर्णायक रूप से आमने सामने का मुकाबला होगा और वह देश की दिशा बदलने वाला होगा।

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By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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