nayaindia हरियाणा में नौकरियों में आरक्षित सीटों को रद्द किया गया: हाई कोर्ट फैसला
अजीत द्विवेदी

स्थानीय आरक्षण की बहस क्या अब खत्म होगी?

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हरियाणा में स्थानीय लोगों के लिए निजी क्षेत्र की नौकरियों में 75 फीसदी सीटें आरक्षित करने के राज्य सरकार के कानून को पंजाब व हरियाणा हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया है। हाई कोर्ट ने इस ममले में बहुत स्पष्ट और दो टूक फैसला सुनाया है। पहले 2022 में भी अदालत ने इस कानून पर रोक लगा दी थी लेकिन तब मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया था और सर्वोच्च अदालत ने हाई कोर्ट को निर्देश दिया था कि वह विस्तार से सुनवाई करके गुण-दोष के आधार पर इस कानून के बारे में फैसला सुनाए। सो, हाई कोर्ट के दो जजों की बेंच ने विस्तार से यह मामला सुना और 83 पन्नों का फैसला लिखा।

अदालत ने संविधान के कई अनुच्छेदों के हवाले से इस कानून को भेदभाव वाला बताते हुए खारिज कर दिया। बिल्कुल इसी तरह आंध्र प्रदेश सरकार ने भी स्थानीय लोगों के लिए 75 फीसदी आरक्षण का कानून बनाया था। उस पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट की टिप्पणी थी कि यह कानून असंवैधानिक हो सकता है। लेकिन गुण-दोष के आधार पर उसके बारे में अंतिम फैसला नहीं आया है। कई और राज्यों में सरकारें इस तरह के कानून की तैयारी कर रही हैं क्योंकि सत्तारूढ़ दलों ने चुनाव प्रचार के दौरान ऐसा वादा किया हुआ है। तभी पंजाब व हरियाणा हाई कोर्ट के फैसले के बाद यह सवाल उठता है कि क्या अब स्थानीयता के आधार पर निजी क्षेत्र की नौकरियों में आरक्षण देने की बहस स्थायी तौर पर समाप्त हो जाएगी?

असल में हरियाणा की भाजपा सरकार को समर्थन दे रहे उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला की पार्टी ने चुनाव में वादा किया था कि अगर उनकी पार्टी सरकार में आती है तो हरियाणा के स्थानीय युवाओं के लिए निजी क्षेत्र की कंपनियों में आरक्षण का कानून बनाएगी। 2019 के अंत में सरकार बनने के तुरंत बाद उप मुख्यमंत्री ने इस वादे को पूरा करने के लिए कानून बनाने की पहल की और एक साल पूरा होने पर नवंबर 2020 में कानून बना दिया गया। इसमें प्रावधान किया गया कि निजी क्षेत्र में 30 हजार रुपए मासिक वेतन से कम वाली नौकरियों में 75 फीसदी नौकरियां हरियाणा के स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित की जाएंगी। मार्च 2021 में राज्यपाल ने इस बिल को मंजूरी दी और 2022 की जनवरी से यह कानून लागू हो गया।

हरियाणा सरकार के इस कानून के मुताबिक राज्य में काम करने वाली हर तरह की निजी संस्था को इसके दायरे में रखा गया। सिर्फ उद्योग नहीं हर तरह की कंपनियां, संस्थाएं, ट्रस्ट, पार्टनरशिप फर्म, जिनके कर्मचारियों की संख्या 10 या उससे ज्यादा है उनको इसके दायरे में रखा गया। इतना ही नहीं इस कानून की धारा छह में यह प्रावधान किया गया कि कंपनियों के लिए जरूरी होगा कि वे हर तीन महीने पर अपनी रिपोर्ट सरकार को जमा करें, जिसमें बताएं कि कितने स्थानीय लोगों को नौकरी दी गई।

कानून की धारा आठ के तहत संबंधित अधिकारियों को अधिकृत किया गया कि वे कंपनियों से उनके रिकॉर्ड मांग कर चेक कर सकते हैं कि कंपनियां कानून का पालन करके स्थानीय लोगों को नौकरी दे रही हैं या नहीं। कानून की धारा 20 के तहत यह प्रावधान किया गया कि ‘अच्छी मंशा’ से काम कर रहे किसी अधिकारी के खिलाफ इस मामले में कानूनी कार्रवाई नहीं शुरू की जा सकती है।

कानून के प्रावधानों को देख कर पहली नजर में पता चल जाता है कि राजनीतिक या चुनावी वादा पूरा करने के लिए एक ऐसा कानून बनाया गया है, जिसे संविधान के दायरे में लागू करना मुश्किल होगा। पहली नजर में यह कानून संविधान के कई प्रावधानों के विरूद्ध दिखाई देता है। यह अवसर की समानता के सिद्धांत का उल्लंघन करता है। नागरिकों के समानता के सिद्धांत के खिलाफ दिखता है। भारत का संविधान देश के नागरिकों को देश के किसी भी हिस्से में जाकर नौकरी करने या रोजगार करने का अधिकार देता है। नागरिकों से यह अधिकार नहीं छीना जा सकता है। यह निजी उद्यमियों के अपने कारोबार के लिए योग्य लोगों को नियुक्त करने के अवसर को कम करता है।

इसी आधार पर हरियाणा सरकार के इस कानून को अदालत को चुनौती दी गई थी। फरीदाबाद इंडस्ट्रीज एसोसिएशन और राज्य के अन्य उद्योग समूहों ने इस कानून को चुनौती दी। कानून के विरोध में याचिका देने वालों का कहना था कि यह कानून कर्मचारियों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। उन्होंने यह दलील भी दी थी कि निजी सेक्टर की नौकरियां पूरी तरह से योग्यता, कौशल और काम को समझने की क्षमता के आधार पर दी जाती हैं। उसमें धरती पुत्र के नाम पर आरक्षण करने से कंपनियों या उद्योगों का काम प्रभावित होगा।

उद्योग समूहों का यह भी कहना था कि निजी सेक्टर में क्षेत्र के आधार पर आरक्षण देना संविधान की संघीय भावना के विपरीत होगा। दूसरी ओर राज्य सरकार का कहना था कि संविधान में ही इस बात का प्रावधान है कि अगर सरकार को लगता है कि कोई खास समूह पिछड़ा है और नौकरियों में उसका पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है तो नौकरियों में समानता के सिद्धांत के बावजूद वह आरक्षण की व्यवस्था कर सकती है।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने कानून के कई प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि यह कानून इंस्पेक्टर राज की बहाली का रास्ता बनाता है। अदालत ने यह भी कहा कि इस कानून के जरिए राज्य सरकार निजी सेक्टर की कंपनियों में नियुक्ति पर अपना संपूर्ण नियंत्रण चाहती है। इस आधार पर अदालत ने इस कानून को रद्द कर दिया। हालांकि यह मामला यही पर समाप्त नहीं होगा। राज्य सरकार इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी।

लेकिन हकीकत यह है कि हरियाणा सरकार की चुनौती मेरिट पर नहीं होगी, बल्कि अपना चेहरा बचाने के लिए होगी। चूंकि सत्तारूढ़ गठबंधन के एक दल ने मतदाताओं से वादा किया था कि वह उनके लिए तीन-चौथाई नौकरियां आरक्षित कराएगा इसलिए उसकी मजबूरी है कि वह सर्वोच्च अदालत तक यह मामला ले जाए ताकि लोगों के बीच यह संदेश जाएगा कि पार्टी ने वादा किया था तो उसे पूरा करने का प्रयास भी किया। हालांकि वादा करने वाली पार्टी को भी पता है कि उसका वादा तर्कसंगत नहीं है। संविधान के अनुकूल नहीं है और न प्रतिस्पर्धा के मौजूदा दौर में निजी उद्यमों के लिए अच्छा है।

यह समझने की जरूरत है कि कंपनियां या उद्योग समूह राजनीतिक दलों के वादे पूरे करने का माध्यम नहीं बन सकती हैं। उनको अगर प्रतिस्पर्धा में टिके रहना है तो योग्य, कुशल व सस्ता मजदूर या पेशेवर चाहिए। यह सिर्फ हरियाणा का मामला नहीं है। किसी भी राज्य में कंपनियों या उद्योग समूहों को अगर देश के पिछड़े राज्यों, जैसे बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, झारखंड, राजस्थान, उत्तर प्रदेश आदि से सस्ते और कुशल मजदूर मिल रहे हैं तो वह क्यों आरक्षण की नीति के तहत स्थानीय युवाओं को नियुक्ति करेंगे?

तीन चौथाई स्थानीय युवकों को नियुक्त करने का एक नुकसान यह भी है कि वहां वे संगठित होकर प्रबंधन के ऊपर दबाव बना सकते हैं, जिससे कंपनियों के लिए स्वतंत्र फैसला करना मुश्किल हो जाएगा। मजबूरी में अकुशल लोगों को भी बनाए रखना होगा। तभी आंध्र प्रदेश से लेकर हरियाणा तक निजी सेक्टर में स्थानीय लोगों के लिए आरक्षण के कानून का विरोध हुआ है।

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By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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