nayaindia Lok Sabha election बार-बार गोल पोस्ट बदलना, कश्मीर को भी ले आना!
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बार-बार गोल पोस्ट बदलना, कश्मीर को भी ले आना!

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इसलिए चुनाव के आखिरी दौर में अब कश्मीर को लाना मोदी जी को शायद ही कोई फायदा पहुंचाए। चार दौर के चुनाव में करीब करीब फैसला हो चुका है। औरबाकी के तीन चरण भी उसी तरफ जाते दिख रहे हैं।…भारत की राजनीति में कभी किसी प्रधानमंत्री ने कश्मीर को चुनाव का इश्यूनहीं बनाया है। नरसिंहा राव, वाजपेयी, देवगौड़ा, गुजराल, मनमोहन सिंह इसआतंकवाद के दौर में प्रधानमंत्री रहे। सबने एक ही बात कही कि कश्मीरराष्ट्रीय मुद्दा है। दलगत राजनीति का नहीं। प्रधानमंत्री बनने से पहलेवाजपेयी खूब कश्मीर पर अपनी पार्टी के नजरिए से बोला करते थे। मगर बननेके बाद कभी नहीं।

तेजी के साथ गोल पोस्ट बदल रहे हैं। गोल पोस्ट कब बदले जाते हैं? जब दूसरीटीम का स्ट्राइकर काबू में नहीं आता है और वह हर बार गोल पर चढ़ दौड़ता है। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कश्मीर की बात करने लगे। उस कश्मीर की जहां की तीन में से एक भी सीटपर भाजपा चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं कर सकी। जहां 6 साल से विधान सभा भंग पड़ी हुई है और आखिरी विधानसभा चुनाव हुए दस साल का रिकार्ड समय बीत चुका है।जम्मू कश्मीर में आखिरी विधानसभा चुनाव 2014 में हुए थे। उससे बनी सरकार,जिसमें खुद बीजेपी शामिल थी 2018 में भंग कर दी गई थी। तब से अब तक वहां विधानसभा चुनाव नहीं हुए हैं।

लेकिन मुद्दा बदलने के लिए, गोल पोस्ट बदलने के लिए अब प्रधानमंत्री मोदी खुदश्रीनगर में हुए मतदान की तारीफ करके उसे लोकंतत्र की जीत बता रहे हैं।श्रीनगर लोकसभा सीट के लिए 38 प्रतिशत के करीब इस बार मतदान हुआ है। इसे1996 के लोकसभा के बाद का सबसे बड़ा मतदान बता कर खुद ही अपनी पीठ थपथपा रहे हैं। 1996 लोकसभा में श्रीनगर सीट पर 41 प्रतिशत मतदान हुआ था।

मगर क्यों हुआ था कैसे हुआ था, यह नहीं बता रहे। क्यों नहीं बता रहे?क्योंकि इसकी पृष्ठभूमि विधानसभा चुनाव पर जाती है। और विधानसभा चुनाव वे करवानहीं पा रहे। डिलिमिटेशन करवा लिया। जम्मू में सीटें बढ़वा लीं। सुप्रीमकोर्ट ने कह दिया। मगर जीत की कोई संभवाना नहीं दिख रही। इसलिएराष्ट्रपति शासन से अपनी सरकार चला रहे हैं।

तो रिकार्ड 1996 लोकसभा का बता रहे हैं। 41 प्रतिशत वोटिंग का और उसकेबाद अब 38 प्रतिशत का। तो इससे इनकी सफलता कैसे हो गई? 1996 में तो हालतबहुत खराब थे। पाकिस्तान सीधा आतंकवाद फैला रहा था। मगर केन्द्र मेंकांग्रेस की सरकार पाक प्रायोजित आतंकवाद से लड़ने के साथ राज्य मेंस्थिति के सामान्यीकरण के लिए भी काम कर रही थी। आज तो मोदी सरकार केवलपाकिस्तान, पाकिस्तान रटती है मगर जम्मू कश्मीर में स्थिति सामान्य कैसेहो, लोगों को चुनी हुई सरकार वापस कैसे मिले इस पर तो उसका कोई काम नहींहै। अगर होता तो लोकसभा के साथ विधानसभा का भी चुनाव हो जाता। अभी कईराज्यों का हुआ है। ओड़ीसा, आंध्र प्रदेश। चुनाव आयोग गया भी था जम्मूकश्मीर लोकसभा चुनाव से पहले स्थिति का जायजा लेने। फिर क्या हुआ?

सुरक्षा बलों की कमी का बहाना बनाकर विधानसभा चुनाव नहीं करवाए।

7 चरणों में चुनाव हो रहे हैं। 75 दिन के करीब समय लग रहा है। एक जगह सेदूसरी जगह सुरक्षा बल पहुंचाए जा रहे हैं। सारी व्यवस्थाएं हैं। फिरजम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव करवाए जाने में क्या प्राब्लम थी?सुरक्षा बल की तो बिल्कुल नहीं। वहां पहले ही काफी तादाद में हैं। और भीकभी भी पहुंचाए जा सकते थे। समस्या वहां जीत नहीं सकने के विश्वास केकारण थी। इतनी ज्यादा कि हर बार लोकसभा में कश्मीर की तीन सीटों पर भाजपाचुनाव लड़ती थी। मगर इस बार हिम्मत ही नहीं पड़ी। इसीलिए सोमवार से जब सेश्रीनगर में मतदान हुआ वहां का 38 प्रतिशत आंकड़ा अपने फेवर में दिखानेकी कोशिश कर रही है। खुद प्रधानमंत्री तक बोल रहे हैं।

वहां मतदान प्रधानमंत्री की वजह से नहीं हुआ। इस गुस्से में हुआ है किविधानसभा में हमें अपना प्रतिनिधि चुनने का मौका क्यों नहीं दे रहे?  शेषभारत में युवा वोटर, पहली बार को वोटर बोलते रहते हैं। मगर वहां दस सालपहले आखिरी विधानसभा चुनाव हुआ था। उस समय जो कुछ महीनों से वोट डालने सेरह गया था। वह बिना विधानसभा में वोट डाले 28 साल का हो गया है। अपनेराज्य की सरकार चुने बिना। उसे मौका क्यों नहीं दे रहे, अपनी राज्य सरकारचुनने का। यह नाराजगी है कश्मीर में।

आज तो प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं कश्मीर में स्थिति अच्छी है। सबसामान्य है। मगर विधानसभा नहीं है। हर बात के लिए वे कांग्रेस को कोसतेहैं। यहां तक कि वह भैंस भी छीन लेगी जैसे दावे करते हैं। छीनने को

कांग्रेस को पास भैंस ही बची है! अरे उसने तो पाकिस्तान से बांग्लादेशछीनकर उसे एक अलग मुल्क बना दिया था। वह अगर छीनती है तो ऐसी बड़ी चीज औरदूसरों से। अपनों से नहीं।

अपनों के लिए तो उसने बातें नहीं की। काम किया। जिस कश्मीर में स्थितिसामान्य का दावा भी करते हैं और चुनाव भी नहीं करा पाते वहां जिस लोकसभाके आंकड़े की मिसाल दे रहे हैं वहां वह लोकसभा का आंकड़ा विधानसभा चुनावसे ही बना था। जी हां, 1996 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की केन्द्र सरकार ने वहांपाकिस्तान के भारी विरोध और आतंकवादी कार्रवाइयों के बीच विधानसभा चुनावकरवा दिए थे। ऐतिहासिक चुनाव। पहले वह रिकार्ड था। 9 साल बाद विधानसभाचुनाव होने का। लेकिन वह आतंकवाद का सबसे भयावह समय था। जिन्हें याद न हो

उन्हें बता देते हैं कि 24 घंटे का कर्फ्यू लगता था।

भक्त लोग और गोदी मीडिया के भी नए पत्रकार एंकर इतना पढ़कर भड़भड़ानेलगते हैं। तो उन्हें बता दें कि उस समय हम वहीं थे। 1990 से लेकर 2000 तकपूरा आतंकवाद वहीं रहकर कवर किया है। लाखों शब्द लिखे होंगे। और जिस समयवहां कोई टीवी पर जाता नहीं था आतंकवादियों ने धमकी दे रखी थी। और धमकी

को क्रियान्वित करते हुए श्रीनगर दूरदर्शन के डायरेक्टर लसा कौल की हत्याकर दी थी। उस समय हम वहां दूरदर्शन पर अपना चेहरा दिखाते हुए आतंकवादविरोधी प्रोग्राम करते थे। और यहां से तब प्राइवेट टीवी चैनल शुरू होनेलगे थे। कुछ लोग आते थे हमारे पास। उनमें आज भक्त पत्रकार एंकर बन गए लोगभी शामिल थे। उन्हें भी लोगों से मिलवाते थे। और कहने पर खुद भी कैमरे परबोलते थे।

लिख इसलिए रहे है कि पतन इतना ज्यादा कर दिया कि बिना जाने कुछ भी कहनेलगते हैं। कश्मीर पर पढ़ेंगे तो और ज्यादा ट्रोल करेंगे। तो उन्हें यह भीबता दें कि हम कैसी पत्रकारिता उस समय भी करते थे कि श्रीनगर के हाईसिक्योरटी जोन एमएलए होस्टल में घुसकर आतंकवादियों ने हमारे कमरे का तालातोड़ दिया था। बहुत खबर बनी थी यह। बाकी सामान तो ठीक है। क्या होगा! मगरकिताबें उठा कर ले गए थे। किताबें सबको परेशान करती हैं।

खैर तो वह 1996 का विधानसभा चुनाव कश्मीर में टर्निंग पाइंट बना था। उसकेबाद वहां आतंकवादी गतिविधियां कम होना शुरू हुई थीं। और अन्तरराष्ट्रीयस्तर पर पाकिस्तान का प्रोपोगंडा कमजोर होना शुरू हुआ था।

चुनी हुई सरकार का विकल्प राष्ट्रपति शासन नहीं हो सकता। अब 4 जून कोनतीजे आने पर ही फैसला होगा कि वहां कौन विधानसभा चुनाव करवाता है और वहकब होंगे।

भारत की राजनीति में कभी किसी प्रधानमंत्री ने कश्मीर को चुनाव का इश्यूनहीं बनाया है। नरसिंहा राव, वाजपेयी, देवगौड़ा, गुजराल, मनमोहन सिंह इसआतंकवाद के दौर में प्रधानमंत्री रहे। सबने एक ही बात कही कि कश्मीरराष्ट्रीय मुद्दा है। दलगत राजनीति का नहीं। प्रधानमंत्री बनने से पहलेवाजपेयी खूब कश्मीर पर अपनी पार्टी के नजरिए से बोला करते थे। मगर बननेके बाद कभी नहीं।

अब देश में भाजपा का कोई मुद्दा नहीं चल पा रहा। प्रधानमंत्री रोज नयाइश्यू बनाने की कोशिश कर रहे हैं। मगर जनता बेरोजगारी के अलावा किसी औरमुद्दे पर बात नहीं कर रही है। प्रधानमंत्री उसी से जनता का ध्यान हटानेके लिए भावनात्मक इशु लाने की कोशिश कर रहे हैं।

श्रीनगर की वोटिंग को अपनी सफलता बता रहे हैं। वहां तो जैसा दूसरे

प्रधानमंत्रियों की तरह वाजपेयी ने भी कहा था कश्मीर के लोगों ने आतंकवादके खिलाफ लड़ाई लड़ी। सामान्य स्थिति की बहाली की। लोकतंत्र को वापस लाए।जैसा मुफ्ती मोहम्मद सईद कहते थे बंदूक पर संदूक की जीत हासिल की। संदूक माने मतपेटी।

इसलिए चुनाव के आखिरी दौर में अब कश्मीर को लाना मोदी जी को शायद ही कोईफायदा पहुंचाए। चार दौर के चुनाव में करीब करीब फैसला हो चुका है। औरबाकी के तीन चरण भी उसी तरफ जाते दिख रहे हैं।

By शकील अख़्तर

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स के पूर्व राजनीतिक संपादक और ब्यूरो चीफ। कोई 45 वर्षों का पत्रकारिता अनुभव। सन् 1990 से 2000 के कश्मीर के मुश्किल भरे दस वर्षों में कश्मीर के रहते हुए घाटी को कवर किया।

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