nayaindia Loksabha Election 2024 फुगावों की मादकता से मुक्ति का समय
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फुगावों की मादकता से मुक्ति का समय

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यह सुखद है कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व उत्साहीलालों की टोली की इस बिगुलबाज़ी की पूरी तरह अनदेखी कर रहा है और पूरी संजीदगी से सीट बंटवारे की प्रक्रिया को तजु़र्बेकार लोगों की देखरेख में पूरी करा रहा है। कांग्रेस के भीतर अपनी तिकड़मों की बिसात बिछाते घूमते रहने वाले गिरोह ने यह राग अलापना भी शुरू किया था कि इंडिया-समूह के कुछ राजनीतिक दल ऐन वक़्त पर पलट जाएंगे, इसलिए कांग्रेस को अकेले चुनाव लड़ने की तैयारियां रखनी चाहिए।

सिर्फ़ इच्छाधारी होने भर से अगर इच्छाएं पूरी होने लगतीं तो फिर बात ही क्या थी? फिर इच्छाएं अगर आसमानी हों तो वे यूं ही ज़मीन पर नहीं उतर आती हैं। उन्हें आसमानी परिश्रम के ज़रिए अपनी बाहों में भर कर ज़मीन तक लाना पड़ता है। ला कर ज़मीन में बोना पड़ता है। खाद-पानी देना पड़ता है। उसके बाद फूटने वाले अंकुरों को कीड़े-मकोड़ों से सहेजना पड़ता है। तब जा कर इच्छाओं के पौधे आहिस्ता-आहिस्ता पेड़ बनते हैं। यह काम दो-चार दिनों में नहीं होता है। इसके लिए अनवरत अनथक खटने की दरकार होती है। तब कहीं जा कर किसी की कोई इच्छा थोड़ी-बहुत पूरी होती है।

और, इच्छा अगर सामूहिक हो तो उसे मंज़िल तक पहुंचाने की राह सामूहिकता-भाव रख कर ही शक़्ल लेती है। सामूहिक मेहनत, सामूहिक दरियादिली, सामूहिक समझदारी और सामूहिक अर्थवत्ता के बिना सामूहिक लक्ष्य हासिल करने की एक भी मिसाल इतिहास में नहीं है। इकलखुरेपन से, अपना-तेरी से, अहम्मन्यता से और ‘तू चल, मैं आता हूं’ के कांइयापन से मजमूई मकसद पूरे होने का एक भी उदाहरण अगर दुनिया के किसी पूर्ववृत्तांत में आप ने पढ़ा हो तो बताइए। लक्ष्यों तक पहुंचने की पद्धतियां सभ्यता के आरंभ से तय हैं। वे किसी के बदलने से बदलती नहीं हैं।

2024 की वसंत ऋतु गुजरने के बाद नरेंद्र भाई मोदी का वासंती-काल समाप्त होने की उम्मीद लगाए बैठे सकल-विपक्ष के सामूहिक लक्ष्य को अंजाम तक पहुंचाना कोई ख़ाला जी का खेल नहीं है। अगर इंडिया-समूह का कोई एक राजनीतिक दल या व्यक्ति यह सोच रहा हो कि वह अकेले अपने बूते यह क़रिश्मा कर दिखाएगा तो उसकी सूरमाई के परखच्चे उड़ते हम-आप ग़मगीन हो कर जल्दी ही देखेंगे।

ममता बनर्जी को अगर लग रहा है कि चूंकि उन्हें लोकसभा के पिछले चुनाव में पश्चिम बंगाल के मतदाताओं ने 43.7 प्रतिशत वोट के साथ 22 सीटें दे दी थीं और कांग्रेस महज़ दो सीटें ही जीती थी, इसलिए सीट-बंटवारे में वे कांग्रेस को लड़ने के लिए दो ही सीटें देंगी तो जितनी जल्दी वे इस विपरीत-बुद्धि से बाहर आ जाएं, उनके लिए ही बेहतर होगा। ममता को यह नहीं भूलना चाहिए कि बंगाल के पिछले विधानसभा चुनाव में अगर कांग्रेस ने अपना मूक-विलय उनकी तृणमूल के साथ न कर दिया होता तो वे 294 में से 222 सीटें नहीं जीत जातीं। उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि लोकसभा के पिछले चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने 40.6 प्रतिशत वोट के साथ 18 सीटें जीती थीं। तृणमूल और भाजपा के बीच तीन प्रतिशत वोट और चार लोकसभा सीटों का यह फ़र्क़ कोई बहुत लंबा-चौड़ा नहीं है।

अरविंद केजरीवाल को भी इस ख़ामख़्याली से बाहर आने की ज़रूरत है कि पंजाब विधानसभा चुनाव में उन्हें मिली तुक्का-विजय से आम आदमी पार्टी सचमुच का राश्ट्रीय राजनीतिक दल बन गया है। आखि़र 2019 के लोकसभा चुनाव में पंजाब से उन्हें साढ़े सात प्रतिशत वोट के साथ सिर्फ़ एक ही सीट तो मिली थी। पिछले साल के विधानसभा चुनाव में भी पंजाब में कांग्रेस ने 23.1 प्रतिशत वोट और 18 सीटें हासिल की हैं। दिल्ली में भी कांग्रेस की उपस्थिति इतनी गई-बीती नहीं है कि केजरीवाल उसे खारिज कर दें। सो, अगर वे गरिमामयी तालमेल के रास्ते पर आगे बढ़ेंगे तो उनकी निजी भावी सियासत ठोस बनेगी। नहीं तो वे इंडिया-समूह के साथ ख़ुद की नींव को भी पोला बनाएंगे।

ममता के बारे में तो मैं पूरी तरह आश्वस्त हूं कि बावजूद अपनी थोड़ी विचलन भरी पृष्ठभूमि के वे मोशा-भाजपा से गुपचुप गलबहियां इसलिए कर ही नहीं सकती हैं कि वे जानती हैं कि ज़रा-सी गफ़लत उन्हें कहां पहुंचा देगी। जांच एजेंसियों के डर की वज़ह से केजरीवाल की नीयत पर शक़ करने वालों से भी मैं सहमत नहीं हूं। वे भी अब अच्छी तरह समझ गए हैं कि कांग्रेस-मुक्त भारत की स्थापना के भाजपाई षडयंत्र का मोहरा बन कर वे अपने दीर्घकालीन राजनीतिक भविष्य से अंततः हाथ धो बैठेंगे। वे अब सकल-विपक्ष के साए तले ही महफ़ूज़ रह सकते हैं। इंडिया-समूह को भी यह समझ लेना चाहिए कि यह समय अपने सहयोगियों के किए-अनकिए में मीनमेख निकालने का नहीं, मजबूती से उनके साथ खड़े रहने का है।

लालू प्रसाद, नीतीश कुमार और शरद पवार की विस्तारवादी ख़्वाहिशों को सीट बंटवारे की राह का रोड़ा बता कर ज़ोरशोर से प्रचारित करने वाले मीडिया-घुड़सवार आपको एकाध हफ़्ते बाद हताशा में डूबे नज़र आएंगे। सत्तासीन डोरियों से संचालित नचनिया-मंडली के इन जमूरों को ऐसे-ऐसे ठुमके लगाते देख अब पूरा मुल्क़ आजिज़ आ गया है। वे मौजूदा सत्ता-व्यवस्था से इतनी निर्लज्जता से एकाकार हो चुके हैं कि नरेंद्र भाई की विदाई का भय उनकी रक्त शिराओं में भाजपा के बदन से भी दस गुना ज़्यादा रफ़्तार से खदबदा रहा है। सत्ताच्युत होने पर भी भाजपा का उतना बुरा हाल नहीं होने वाला है, जितना चाय से भी ज़्यादा गर्म केतलियों का हो जाएगा। दस बरस के अपने घनघोर अनैतिक कर्मों का डर अब बहुत-से मीडिया-प्रेतों को बेतरह सता रहा है। सो, आने वाले चार-पांच महीने उनके नाच की नंगई तो और भी बढ़ने ही वाली है।

अब आइए कांग्रेस पर। मुझे लगता है कि कांग्रेस यह अच्छी तरह समझ गई है कि यह वक़्त दोबारा नहीं आने वाला है। इसलिए वह इंडिया-समूह के अंतिम मकसद की कामयाबी के लिए असंदिग्ध दधीचि मुद्रा में है। मगर एक धड़ा है, जो इस फुगावे की मादकता में मशगूल डोल रहा है कि कांग्रेस ही इंडिया-समूह का सबसे बड़ा राजनीतिक दल है; कि कांग्रेस ही इस चुनाव के बाद भी इंडिया-समूह के सबसे बड़े राजनीतिक दल के तौर पर उभर कर सामने आएगी; कि कांग्रेस का इतिहास 138 साल पुराना है; कि कांग्रेस को पिछले लोकसभा चुनाव में 12 करोड़ मतदाताओं ने समर्थन दिया था; कि राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ ने सकल-विपक्ष को प्राणवान बनाया है; कि राहुल की ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ जब मणिपुर से मुंबई पहुंच जाएगी तो सकल-विपक्ष के गालों का रंग और भी सुखऱ् गुलाबी हो जाएगा; वग़ैरह, वग़ैरह।

ये तमाम तर्क सही हैं, मगर वे मौजूं नहीं हैं। यह सुखद है कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व उत्साहीलालों की टोली की इस बिगुलबाज़ी की पूरी तरह अनदेखी कर रहा है और पूरी संजीदगी से सीट बंटवारे की प्रक्रिया को तजु़र्बेकार लोगों की देखरेख में पूरी करा रहा है। कांग्रेस के भीतर अपनी तिकड़मों की बिसात बिछाते घूमते रहने वाले गिरोह ने यह राग अलापना भी शुरू किया था कि इंडिया-समूह के कुछ राजनीतिक दल ऐन वक़्त पर पलट जाएंगे, इसलिए कांग्रेस को अकेले चुनाव लड़ने की तैयारियां रखनी चाहिए। अच्छा हुआ कि शीर्ष सूत्रधारों ने इसे सार्वजनीन विमर्श का मसला बनने से पहले ही दफ़न कर दिया। वरना पारस्परिक विश्वास की कमी का यह आभास भर ही इंडिया-समूह को जन-मन से विदा कर देता।

अगर, जैसी कि अब आम धारणा बनती जा रही है कि, इवीएम का चरित्र संदिग्ध है और उसकी अग्निपरीक्षा लेने का समय आ गया है, तब तो सकल-विपक्ष के पास इसके अलावा कोई विकल्प ही नहीं है कि वह, चुनाव का नहीं, मगर मतदान की इस प्रणाली का संपूर्ण बहिष्कार कर दे। लेकिन अगर इवीएम के पेट में दाढ़ी न भी हो तो नरेंद्र भाई के सियासी बहेलिएपन से टक्कर लेना आसान है क्या? सो, इंडिया-समूह में सब एक-दूसरे का हाथ नहीं थामे रखेंगे तो देश उन्हें जनतंत्र का गद्दार करार देगा।

By पंकज शर्मा

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स में संवाददाता, विशेष संवाददाता का सन् 1980 से 2006 का लंबा अनुभव। पांच वर्ष सीबीएफसी-सदस्य। प्रिंट और ब्रॉडकास्ट में विविध अनुभव और फिलहाल संपादक, न्यूज व्यूज इंडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता। नया इंडिया के नियमित लेखक।

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