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राष्ट्रवादी आंदोलन और बौद्धिक पतन

नीरद बाबू की आत्मकथा के दोनों भाग समकालीन भारत का वास्तविक इतिहास समझने के लिए एक अनिवार्य स्त्रोत-ग्रंथ हैं। उन के प्रकाशन के सात और चार दशक बाद भी उन में कोई बुनियादी भूल कठिनाई से मिलती है। उसे इतिहास, राजनीति, एवं साहित्य शिक्षण की एक महत्वपूर्ण पाठ्य सामग्री बनाना चाहिए।

नीरद चौधरी की विहंगम दृष्टि – 2

राष्ट्रीय सुरक्षा, विशेषतः आंतरिक सुरक्षा में स्वतंत्र भारत की भारी दुर्गति हुई है! जहाँ अंग्रेजों ने भारत में सदियों से चल रही अराजकता, हिंसा, लूट, उत्पीड़न, आदि नियंत्रित कर अंदर-बाहर सुरक्षित किया। वहीं भारतीय शासकों ने सत्ता लेते-लेते ही अपने हाथों देश के टुकड़े कर करोड़ों भारतीयों को देशबाहर, लाखों को लावारिस, शरणार्थी बनाकर अपमान का शिकार होने के हाल में पटक दिया। वह भी, बिना नोटिस दिए!

भारत विभाजन को एक इतिहासकार ने ‘मानवता के इतिहास में सब से बड़ा विश्वासघात’ कहा है। जो राष्ट्रवादी नेताओं ने अपनी जनता के साथ किया। फिर बचे भारत में भी कश्मीर, बंगाल, केरल, गुजरात, बिहार, आदि अनेक प्रांतों के असंख्य जिलों में हिन्दू नागरिकों का जीवन और मान अरक्षित होता गया। उस के समाचारों पर भी स्वैच्छिक व दबावी पाबंदी, तथा लफ्फाजी से सब कुछ छिपाकर काम चलाया जाता है। नतीजन उत्पीड़कों का हौसला बढ़ता रहा है। यह सब ‘सेक्यूलरिज्म’ के नाम पर, जो ब्रिटिश राज में हरगिज न था।

इस प्रकार, मध्यकालीन मुस्लिम शासनों के बाद हिन्दुओं की तुलनात्मक दुर्दशा पुनः स्वतंत्र भारत में ही आरंभ हुई – और बढ़ती गई। यह ब्रिटिश राज में नहीं था। तब हिन्दू मुसलमान दोनों ब्रिटिश राज की समान प्रजा थे। किसी को विशेषाधिकार या विशेषवंचना न थी। यह स्वतंत्र भारत में हुआ कि मूढ़ नेताओं द्वारा अल्पसंख्यकवाद की झोंक में हिन्दू लोग तीसरे दर्जे के नागरिक बना डाले गये। राष्ट्रवादी नेताओं द्वारा ही जिन में सभी सत्ताधारी दल रहे हैं।

चर्च-मिशनरी भी ब्रिटिश राज में कठोरता से नियंत्रित थे, जिन्हें स्वतंत्र भारत के शासकों ने बेलगाम छूट दी। बाकायदा संविधान में अधिकार देकर, जो उन्हें ब्रिटिश राज में बिल्कुल न था! परिणाम आँकड़ों से देखें। भारत में क्रिश्चियन आबादी ब्रिटिश राज के दो सौ साल में लगभग कुछ न बढ़ी। जबकि स्वतंत्र भारत में प्रदेश के प्रदेश चर्च-मिशनों के हाथ आ गये।

देश की बाह्य सुरक्षा भी अंग्रेजों के जाते ही जाती रही। नौसिखिए और बड़बोले भारतीय नेताओं ने अपने हाथों से पंजाब-बंगाल, कश्मीर और तिब्बत की ऐसी-तैसी कर पश्चिमी, पूर्वी, और उत्तरी सीमाओं को असुरक्षित कर लिया। फिर, शान्ति अहिंसा की अपनी ही लफ्फाजी पर इतराते कबूतर उड़ाते रहे। परिणाम?

ब्रिटिश राज में भारत पर कभी कोई बाहरी हमला न हुआ; जबकि स्वतंत्र भारत में पाँच बाहरी हमले हो चुके, देश की भूमि छिनी, और विविध अंदरुनी आक्रमण भी होते रहे हैं। इन सब का उपाय करने के बदले नेताओं ने सचाई छिपाने और झूठी हाँक कर लज्जा बचाने के फेर में आक्रामकों का शिकार बनते रहने की व्यवस्था-सी कर दी है। कश्मीर, केरल, बंगाल, बिहार के सीमावर्ती क्षेत्रों, आदि में और क्या होता रहा है?

लेकिन उक्त बातों पर कोई खुली चर्चा संसद या मीडिया में नहीं होती। राष्ट्रीय प्रभुओं की प्रतिष्ठा बचाने को समाज-हित के मर्मभूत मुद्दों पर भी चुप्पी बरतने, बनाव-छिपाव, और पर्दा डालने का चलन स्वतंत्र भारत में आरंभ से बना। ऊपर से, उन्हीं नेताप्रभुओं को महान बताने की फिक्र में उन की पूजा-प्रोपेगंडा एक नई राज-रस्म बनी।

यह भी ब्रिटिश शासकों में न था। वे अपने किसी वायसराय या प्रधानमंत्री की भी महानता बताने में एक भी रूपया या सेकेंड खर्च नहीं करते थे। जिस जगह दशकों तक 13  अंग्रेज वायसराय आए और रहे, उस भव्य ‘वायसरीगल लॉज’ में भी किसी वायसराय का नाम तक अंकित नहीं मिलता। उन की मूर्ति या विरुदावली खुदवाना तो‌ दूर रहा! अर्थात, वे काम के प्रति समर्पित, सुसंस्कृत और चरित्रवान थे। अपना ही ढोल पीटना उन्हें असभ्यता लगती थी।

अतः, ठोस पैमानों पर तुलना करके ही नीरद बाबू के अवलोकन का मर्म समझ सकते हैं। उन की आत्मकथा बीसवीं सदी के भारत का चित्रलिखित-सा इतिहास है। उसे पढ़ कर यह साफ देख सकते हैं। पर कठिनाई यह है कि यहाँ ‘राष्ट्रवादी’ और ‘प्रगतिशील’ बौद्धिकता में जड़ता व तोते जैसी रटी-रटाई का चलन बना है। बातों विचारों की परख नहीं होती।

फलत: कई क्षेत्रों में समाज का पतन हो रहा है। जिस की चर्चा भी लुप्त है। सांसद भी पार्टी के बंदी-तोते बना डाले गये हैं। सर्वोच्च ‘जन-प्रतिनिधि’ भी चुप रहते हैं। तब औरों का क्या! सो, बौद्धिक-सांस्कृतिक पतन अनवरत जारी है। उस पर परदा डालने को नाटक, प्रवंचना और प्रोपेगंडा भी अहर्निश चल रहा है।

अतः नीरद चौधरी की आशंका सदैव स्मरणीय, और एक चुनौती भी है। उन्होंने पाया था कि सदियों से अराजकता व हिंसा में डूबे, बिखरे, विच्छिन्न भारत को अंग्रेजों ने ही स्थिर और एक किया। हमें समानता, स्वतंत्रता के मानवीय मूल्यों तथा आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से जोड़ा। अनेक बुराइयों, अंधविश्वासों से मुक्त किया।

पूरी शैक्षिक, कानूनी, प्रशासकीय, सैनिक, आदि व्यवस्थाएं बना कर दी। पर उन के बाद भारतीय नेता उसे जैसे-तैसे, तोड़ते-बिगाड़ते चला रहे हैं। इन में कोई चरित्र, दृष्टि और दृढ़ता नहीं, यह नीरद बाबू ने 1917  ई. से ही लगातार देखा जब राष्ट्रवादी आंदोलन उग्र होता बढ़ रहा था। तब से ही भारत का बौद्धिक-सांस्कृतिक क्षरण हो रहा है। आर्थिक व्यापारिक विकास इस की भरपाई नहीं है।

नीरद बाबू की आशंका भयावह है। किन्तु इसे गलत साबित करने के लिए हमारे अकादमिक जगत और मीडिया में भी तैश, पार्टी-बाजी तथा छद्म सेंसरशिप के सिवा कुछ खास नहीं है। अत: प्रशासन, सुरक्षा, शिक्षा, संस्कृति, धर्म, और समाज में असंख्य तथ्यों, घटनाओं, आँकड़ों, स्थितियों से नीरद बाबू का अवलोकन सही होता लगता है। उन स्थितियों पर चुप्पी भी उस अवलोकन की पुष्टि ही है। कई तरह के आंतरिक शत्रुओं, अयोग्य लोगों, लबारियों का जोर बढ़ता लगंगफ रहा है। साधारण योग्य युवा भी अवसर मिलते ही विदेश प्रस्थान कर रहे हैं। किसी सार्वजनिक संस्थान, विभाग, या अधिकारी का सही मूल्यांकन करने की कभी बात नहीं होती, जबकि संस्थानों, विभागों, उप-विभागों की संख्या निरंतर बढ़ रही है।

किसी स्तर‌ पर समाज-हित की दृष्टि से सच्चे विमर्श की चिन्ता नहीं दिखती। सब कुछ दलगत, नेतागत आधार पर तू-तू मैं-मैं में डूब जाता है। किसी आलोचना का शोध करने के बदले आलोचक को निशाना बनाया जाता है। नेताओं की अयोग्यता, स्वार्थपरता, और गलतियाँ छिपाने के लिए आम लोगों को ही दोष दिया जाता है। यह विचित्रता भी गाँधीजी का नेतृत्व उभरने के साथ आरंभ हुई। जब ‘खलीफत जिहाद’ और भड़काने की भयंकर भूल करने के बाद लोगों को दोष देकर लीपापोती हुई थी।

आज भी वही प्रवृत्ति है। हमारे नेता और दल चौतरफा सामाजिक तहस-नहस करते हैं। फिर गाँधीजी की तरह हाथ उठाकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि ‘समाज ही दोषी है’। आज सोशल मीडिया में हर बात पर आम हिन्दुओं को ललकारने, फटकारने या बुरा-भला कहने वाले संघ-भाजपा समर्थक निरे भोले या धूर्त हैं। वे अपने हजारों विधायकों, सैकड़ों सांसदों-मंत्रियों, तथा उन से भी ऊपर के प्रभुओं, दल-संगठन महानुभावों, आदि को सदा मुक्त रखते हैं! वे कुछ करें, अकर्मण्य रहें, या खलीफत-समर्थन जैसे ही उलटे-सुलटे काम करते रहें – पर दोष आम हिन्दू जनता का! अथवा, किन्हीं अनाम विदेशियों या मृत कांग्रेसियों, आदि का।

वस्तुत: नीरद बाबू की आत्मकथा के दोनों भाग समकालीन भारत का वास्तविक इतिहास समझने के लिए एक अनिवार्य स्त्रोत-ग्रंथ हैं। उन के प्रकाशन के सात और चार दशक बाद भी उन में कोई बुनियादी भूल कठिनाई से मिलती है। उसे इतिहास, राजनीति, एवं साहित्य शिक्षण की एक महत्वपूर्ण पाठ्य सामग्री बनाना चाहिए।

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