nayaindia भाजपा-संघ नेतृत्व: व्यक्तिगत शत्रुता और नीतिगत विचारशून्यता
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भाजपा में पाकिस्तानी मानसिकता?

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भाजपा-संघ

आज देश में परस्पर जैसी शत्रुता दिख रही है, वह पाकिस्तान में होता रहा है (और कम्युनिस्ट देशों में)। कोई पिछले नेता को बदनाम करे, जेल दे, या मरवा डाले। …हिन्दू समाज दोहरी मार झेलता, ऊपर से मूर्ख बनाया जा रहा है। यानी ट्रिपल व्हैमी का शिकार! भाजपा के विरोधी इस दल को ‘हिन्दू सांप्रदायिक’ कहते हैं। फलत: दुनिया भर में मुख्य निशाना हिन्दू समाज बनता है। जबकि संघ-भाजपा नेतृत्व मुस्लिम-तृप्तिकरण में लगा रहता है। सो, हिन्दू समाज के शत्रु निर्विरोध बढ़ रहे। जबकि हिन्दू बौद्धिक इन सब पर पर्दा डालने में लगा दिए गये हैं।

आज भाजपा नेतृत्व विपक्षियों के साथ जो व्यवहार कर रहा है, वह स्वतंत्र भारत में पहले नहीं देखा गया। जिन नीतियों पर कोई नेता खुद जम कर चल रहे हों, उन्हीं के लिए पिछले नेताओं या दलों की निन्दा नहीं करते थे। जैसे, तुष्टिकरण/’तृप्तिकरण’, सच्चर कमेटी, अरब देशों का मुँह जोहना, चीन पर गोल-मोल रहना, गाँधी-पूजा, पार्टी-फंड बहाने बेहिसाब वसूली, परिवारवाद, योग्यता किनारे कर वफादारों को बड़े पद देना, राजकीय संसाधन से पार्टी प्रचार, आदि।

फिर, दिवंगत नेताओं पर प्रहार नहीं होता था। हालिया वर्षों में भाजपा ने नेहरू, इंदिरा, राजीव, पर जैसे हमले किये – वह अनावश्यक, अशोभनीय, और कायरतापूर्ण हैं। क्योंकि उन के जीवित रहते संघ-भाजपा नेता उन के प्रति प्रेमिल दिखे थे।

पहले परस्पर सदभावना थी। एक दूसरे के दल और‌ विचारों की आलोचना करते हुए भी सम्मान था। कभी अटल बिहारी वाजपेई नियमित कम्युनिस्ट पार्टी ऑफिस जाकर कम्युनिस्ट सांसदों से गप्पें लड़ाते थे। नरसिंह राव ने वाजपेई की पुस्तक का, तो आगे वाजपेई ने नरसिंह राव की पुस्तक का  लोकार्पण किया था।

इंदिरा गाँधी भी विपक्षी नेताओं से मिलने जाती थीं। नीतियाँ चाहे अपनी बनाएं, पर सर्वदलीय बैठक का चलन था। वैसा वैचारिक आदान-प्रदान भाजपा में दल के अंदर भी शायद ही बचा है।

यदि इमरजेंसी में विपक्षी जेल में डाले गये, तो वह नीतिगत हुआ। चुन-चुनकर किन्हीं को बंद, किसी को छोड़ा नहीं गया था।

अतः आज यहाँ जैसी शत्रुता दिख रही है, यह पाकिस्तान में होता रहा है (और कम्युनिस्ट देशों में)। कोई पिछले नेता को बदनाम करे, जेल दे, या मरवा डाले। जबकि नीतियाँ समान रहें! ऐसी वैयक्तिक शत्रुता से भारतीय नेता अब तक बचे हुए थे। क्या वह आज बदल गया है?

पिछले चुनाव में भी ‘माँ-बेटा को जेल दरवाजे तक ले आने’ का दावा किया गया था। यद्यपि इस बार भाजपा नेता बताना भूल गये कि माँ-बेटा अभी तक जेल दरवाजे से कहाँ तक पहुँचाए गये हैं?

पर अनेक विपक्षी वैसे आरोपों में जेल पहुँच गये हैं जैसे आरोप अनेक भाजपाइयों पर भी हैं। कुछ तो मजे से चुनाव लड़ रहे हैं, जिन पर धोखाधड़ी के आरोप साबित हो चुके। फिर जो नेता जेल पहुँचने ही वाले हों, यदि वे भाजपाई बन जाएं तो उन के हाथ हथकड़ी के बदले गले में फूल-माला पड़ने लगती हैं। सो चुनिंदा नेताओं की धड़पकड़ भ्रष्टाचार से लड़ाई है, यह भाजपा समर्थक के गले उतरना भी कठिन है।

सो, इस में कोई आइडियोलॉजी भी नहीं है। अपने एकछत्र दबदबे में उन्होंने सहधर्मी शिवसेना को तहस-नहस किया। अरुण शौरी जैसे अनूठे आइडियोलॉग को कूड़े में फेंका, जबकि हर तरह के पापियों को गले लगाया। अतः तमाम कारनामों में किसी वैचारिकी का अभाव स्पष्ट है।

यह उस संघ-परिवार के दौर-दौरे में, जिस के पिछले नेताओं ने ‘चाल, चरित्र’ का दंभ भर कर लोगों को लुभाया था। क्या वही पहला धोखा था? या उस का चालू नेतृत्व विगत निष्ठाओं को घूरे पर डाल रहा है?

ऐसे प्रश्नों पर संघ-भाजपाई या तो मौन, या तू-तड़ाक पर उतर आते हैं। यानी निरुत्तर। जबकि उन का नेतृत्व कर्कश, विषैली लफ्फाजी से विपक्ष पर कीचड़ उछालने के सिवा शायद ही कभी कुछ ठोस कहता है। साथ ही, डींग हाँकने में सराबोर जिस में झूठ का भी भरपूर प्रयोग होता है। अधिकांश बयानबाजी का आदि-अंत बस परनिन्दा और आत्मप्रशंसा। यही उन का असली चाल-चरित्र है।

ऐसी नीतिगत एवं चारित्रिक बदहाली के साथ विपक्ष के प्रति वैयक्तिक दुर्भाव का खुला प्रदर्शन चिंताजनक स्थिति है। यह हिन्दू  शिक्षा से दूर, और इस्लामी/कम्युनिस्ट प्रवृत्तियों से मिलती-जुलती है। प्रतिद्वंद्वी को हटाने, और अपनी गलतियाँ छिपाने में वैयक्तिक शत्रुता के तरीके अपनाना।

इस में एक गहरा भय भी है। यदि प्रतिद्वंद्वी – जो स्वदलीय भी हो सकता है – आ गया, तो ‘मेरा क्या होगा’! बल्कि एक ओर वैयक्तिक शत्रुता, दंभी आत्मप्रशंसा, तथा दूसरी ओर मन में गहरा भय – एक दूसरे की पूरक बन जाती है। एक प्रवृत्ति दूसरे को, और दूसरी पहले को बल-बढ़ावा देती है।

तो क्या संघ-भाजपा नेतृत्व अपने ही दुष्चक्र में उलझ गया है? चाल और चरित्र का दंभ भरते रहने के बाद कुचाल में पड़कर उसे अब येन-केन सत्ता में रहने के सिवा कोई उपाय नहीं दिखता?

ऐसा स्वतंत्र भारत में किसी अन्य दल के साथ नहीं हुआ था। वे आगे सत्ताच्युत होकर भी राजनीति में रहने के लिए प्रस्तुत रहते थे। इसी का सहज अंग था विपक्षी नेताओं के प्रति सहानुभूति रखना। ताकि कल जब आसन बदले तो वही भाव मिले।

अतः आज भाजपा नेतृत्व द्वारा वैयक्तिक दुर्भाव का नियमित प्रदर्शन संकेत है कि वे सत्ता छोड़ने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं। ‘हिमालय चले जाएंगे’ पर विपक्ष में नहीं बैठेंगे। सो, हर हथकंडा आजमा रहे हैं। ऊपर से बली, जबकि भीतर से नर्वस व भयभीत मानसिकता दुनिया भर में मुहम्मदवादी और स्तालिनवादी नेताओं की रही है। अब तक यह स्वतंत्र भारत में नहीं दिखी थी।

वह पहली बार भाजपा-संघ नेतृत्व में झलक रही है। क्या यह उन की सदाबहार मतिशून्यता, जिसे एक इतिहासकार ने ‘डफर'(duffer)ता कहा था, की अभिव्यक्ति है? अथवा सोची-समझी नीति? चीन की तरह एकदलीय – और दल में भी एकगुटीय, एकव्यक्तीय – सत्ता बनाने का मंसूबा?

संघ-परिवार का इतिहास देखते हुए पहली बात अधिक सही लगती है। कि यह सब विचारशून्यता-सह-दंभ की परिणति है। उल्टा-सीधा जो खुद सूझे, करते जाना। जानकारों या अपनी भी दलीय समिति से सलाह न करना। फिर हर उटपटाँग पर नये उटपटाँग से पर्दा डालना। विरोधी, मतभेदी को लोभी या बाहरी एजेंट बताना। समर्थकों को नित नयी तरकीब से बरगलाते जोड़े रखना। किसी तरह आज का दिन और कार्यकाल निकालना, फिर कल की कल देखी जाएगी की आस रखना।

पिछले पच्चीस-तीस बरस के उन के कथनों, क्रियाकलापों, कल्पनाओं, और नतीजों का क्रम संघ-भाजपा नेतृत्व में विचारशीलता का अभाव ही इंगित करता है। वे नीति-निर्णय और बयानबाजी में नित्य पकाने-खाने के आदी हैं। जिस में बीते दिन की अपनी बात और काम का, आज की बात और काम से सामंजस्य की चिन्ता नहीं रहती। इस में जब ‘सदा बढ़ते जाने’ का घमंड जुड़ जाए, तब चतुराई और डफरता का भेद मिट जाता है।

अतः उन के नेतृत्व में पाकिस्तानी मानसिकता की झलक दरअसल संघ मानसिकता है: आत्मकेंद्रित विश्व। दूसरे, चाहे वह व्यक्ति हो या समाज, तथ्य या स्थिति, देश या विदेश, को जानने की जरूरत ही नहीं! जो है, बस संघ है। संघ जान लिया तो सब जान लिया। जो संघ में नहीं, वह चीज या मनुष्य निरर्थक। इस मानसिकता में ही उन में तानाशाही और घमंड रहा है। देश के लिए अन्य देशवासियों, दलों के साथ मिल कर कुछ सोचना और करना उन के शब्दकोष से बाहर है।

अतएव, संघ-प्रशिक्षण की मानसिकता ही विपक्ष के प्रति शत्रुता का रूप ले रही है। वही तार्किक रूप से अपने दल में भी निज गुट, और अंततः ‘मैं’ के सिवा सब को किनारे और‌ लांछित करने में झलकती है।

ऐसे तौर-तरीके उसी मतिशून्यता की देन हैं जिस के लिए संघ प्रसिद्ध है। यह संघ के किंचित-विचारशील भी प्रकारांतर मानते रहे हैं (जिस कारण नेतृत्व के लिए अनुपयुक्त भी समझे जाते हैं)।

इस बीच, हिन्दू समाज दोहरी मार झेलता, ऊपर से मूर्ख बनाया जा रहा है। यानी ट्रिपल व्हैमी का शिकार! भाजपा के विरोधी इस दल को ‘हिन्दू सांप्रदायिक’ कहते हैं। फलत: दुनिया भर में मुख्य निशाना हिन्दू समाज बनता है। जबकि संघ-भाजपा नेतृत्व मुस्लिम-तृप्तिकरण में लगा रहता है। सो, हिन्दू समाज के शत्रु निर्विरोध बढ़ रहे। जबकि हिन्दू बौद्धिक इन सब पर पर्दा डालने में लगा दिए गये हैं। दलबंदी में फँस कर वे मोटी बात भूल जाते हैं कि शिव सेना, कांग्रेस, आरजेडी, आदि भी हिन्दू पार्टियाँ हैं जिन्हें ही खत्म करने में संघ-भाजपा का सारा कौशल लगता रहा है। ऐसी हालत में, आगे क्या होगा यह अल्लाह जानता है!

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By शंकर शरण

हिन्दी लेखक और स्तंभकार। राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। कई पुस्तकें प्रकाशित, जिन में कुछ महत्वपूर्ण हैं: 'भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहासलेखन', 'गाँधी अहिंसा और राजनीति', 'इस्लाम और कम्युनिज्म: तीन चेतावनियाँ', और 'संघ परिवार की राजनीति: एक हिन्दू आलोचना'।

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