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राहुल गांधी की चार बातें और उनसे जुड़े सवाल

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विवेकहीनता के मौजूदा माहौल के कारण राहुल गांधी की बातें ताजा हवा के एक झोंके की तरह महसूस हुई हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि झोंके को कैसे एक बड़ी आंधी में बदला जाए, जिससे आज की पॉलिटिकल इकॉनमी के ढांचे की जड़ों को हिलाया जा सके। राहुल गांधी ने इस दिशा में किसी सोच का संकेत अभी तक नहीं दिया है। यह तथ्य उनकी एक बड़ी सीमा बना हुआ है।  

राहुल गांधी ने अपनी हाल की यूरोप यात्रा के दौरान ऐसी कम से कम चार ऐसी बातें कहीं, जिन्होंने ध्यान खींचा। इनमें से कुछ बातें राहुल गांधी ने पहले भी कही थीं, लेकिन उनमें जितनी स्पष्टता इस बार नजर आई, वैसा संभवतः पहले नहीं हुआ था। इन बातों में कांग्रेस नेता की समझ की एक विकास यात्रा की झलक मिली। मसलन, पिछले कुछ मौकों पर उन्होंने 1991 से अपनाई गई नव-उदारवादी नीतियों की सीमाओं की चर्चा की थी। लेकिन उसका जो समाधान वे बताते थे, वे नव-उदारवादी दायरे से बाहर नहीं जाते थे। ये नव उदारवाद के साथ “मानवीय चेहरा” जोड़ने से ज्यादा कुछ नहीं होते थे। लेकिन इस बार उनकी बातें इस दायरे से बाहर जाती नजर आईं।

तो आइए, इन चारों बातों पर अलग-अगर गौर करेः

1-    मोदी सरकार की पॉलिटिकल इकॉनमी

पेरिस एक संवाद के दौरान राहुल गांधी ने यह टिप्पणी की कि नरेंद्र मोदी के पीछे एक मजबूत ढांचा (structure) खड़ा है। यह ढांचा ही उनकी ताकत है। इस ढांचे के पीछे दो प्रमुख शक्तियां हैः monopoly कॉरपोरेट घराने और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। नरेंद्र मोदी इस ढांचे का उपकरण (instrument) मात्र हैं। यानी चूंकि वे इन इस ढांचे के पीछे की दोनों प्रमुख ताकतों के स्वार्थों को पूरा करने का कारगर औजार बने हुए हैं, इसलिए यह ढांचा भी उनके पीछे मजबूती से खड़ा है।

इसी सिलसिले में राहुल गांधी ने कहा कि आरएसएस चाहे, तो पांच मिनट में नरेंद्र मोदी को हटा सकता है। उन्होंने यह नहीं कहा, लेकिन उसका निहितार्थ साफ था कि जब तक मोदी एक कारगर औजार बने रहेंगे, उनके पीछे मोनोपॉली पूंजी और हिंदुत्ववादी शक्तियां पूरी ताकत के साथ खड़ी रहेंगी।

राहुल गांधी ने कहा- ‘हमारी लड़ाई इस ढांचे के खिलाफ है।’ उन्होंने यह साफ नहीं किया इस ‘हम’ में वे किसे शामिल मानते हैं, और यह लड़ाई किस तरह लड़ी जाएगी। जो संकेत हैं, उससे नहीं लगता कि उनकी पूरी कांग्रेस पार्टी और जिन दलों के साथ मिलकर इस पार्टी ने INDIA गठबंधन बनाया है, वे इस समझ में राहुल गांधी के साथ हैं। उनमें से एक बड़े हिस्से की जद्दोजहद सिर्फ यह है कि उस ढांचे का एक हिस्सा उन्हें अपना ले, ताकि उनकी भी सत्ता में हिस्सेदारी की गुंजाइश बन सके।

2-    अर्थव्यवस्था में सरकार की भूमिका

बहरहाल, राहुल गांधी यह कहा कि सरकार अपने को अर्थव्यवस्था से पूरी तरह अलग नहीं कर सकती। उसे एक बड़ी भूमिका निभानी होगी। इस वक्तव्य के साथ उन्होंने नव-उदारवाद के मूल-मंत्र से उलटी बात कही। ये मूलमंत्र हैः ‘सरकार किसी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि सरकार ही एक समस्या है’, ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन’, ‘मुक्त बाजार के अलावा कोई और विकल्प नहीं है’, और ‘government has no business to be in business’ (सरकार की अर्थव्यवस्था में कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए)।

राहुल गांधी ने कहा कि शिक्षा और स्वास्थ्य दो ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें भले निजी क्षेत्र भी मौजूद रहे, लेकिन सरकार को उनमें प्रमुख भूमिका लेनी होगी। अगर सरकार ऐसा नहीं करती है, तो गरीब और आम जन इन दोनों अनिवार्य सेवाओं से वंचित हो जाते हैं। निजी क्षेत्र के जरिए इन सेवाओं को प्राप्त करना उनके वश में नहीं रहता।

इसके साथ ही राहुल गांधी ने कहा कि खास रणनीतिक क्षेत्रों में सार्वजनिक क्षेत्र की प्रमुख भूमिका बनी रहनी चाहिए। अपनी इस टिप्पणी के साथ उन्होंने सार्वजनिक संपत्तियों के अंधाधुंध निजीकरण का विरोध किया। यह भी नव-उदारवादी सोच के विपरीत बात है, क्योंकि नव-उदारवाद के साथ   निजीकरण, उदारीकरण (liberalization), और पूंजी के भूमंडलीकरण की नीतियां अनिवार्य रूप से जुड़ी हुई रही हैं। यह प्रश्न सामने नहीं आया, लेकिन इस पर राहुल गांधी के जवाब का इंतजार रहेगा कि क्या अंधाधुंध उदारीकरण और भूमंडलीकरण की नीतियों को बिना बदले निजीकरण को रोकना संभव है?

दरअसल, उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या नियोजित अर्थव्यवस्था (PLANNED ECONOMY) के विचार को बिना अपनाए और बिना इसकी वापसी का रोडमैप बनाए, क्या उदारीकरण की किसी नीति को पलटना या उस पर ब्रेक लगाना मुमकिन होगा?

3-    चीन की सफलता का राज़

हालांकि इस सवाल को विदेश या सामरिक नीति पर सोच के संदर्भ में पूछा जाता है, लेकिन इसका संबंध बेशक आर्थिक नीति से भी है। राहुल गांधी ने इसका जवाब चूंकि इस संदर्भ को ध्यान में रखते हुए दिया, इसलिए उनकी इस बात ने खास ध्यान खींचा। उनसे सवाल चीन की चुनौती का मुकाबला करने के बारे में पूछा गया था। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि हम चाहें या ना चाहें, हमें यह स्वीकार करना पड़ेगा कि चीन ने दुनिया के सामने एक नजरिया रखा है। यह नजरिया बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का है। यह निर्माण का नजरिया है।

राहुल गांधी ने कहा कि चीन इस नजरिए पर इसलिए अमल कर पाया है, क्योंकि उसके पास उत्पादक अर्थव्यवस्था है। मैनुफैक्चरिंग (कारखाना क्षेत्र) के अपने विशाल ढांचे के बूते वह इतने बड़े पैमाने पर सामग्रियों का उत्पादन कर पाता है और इससे जुड़ी टेक्नोलॉजी विकसित कर पाया है, जिससे वह दूसरे देशों में जाकर भी निर्माण कर पा रहा है।

इसके साथ ही गांधी ने कहाः चीन ने जो सफलता पाई है, वह उसने coercive  (जोर-जबरदस्ती के) माहौल में किया है। उसने अपने लोगों को राजनीतिक स्वतंत्रता से वंचित रखा है, लेकिन साथ ही उन्हें आर्थिक समृद्धि दी है। कांग्रेस नेता ने कहाः अब “जिन देशों में राजनीतिक स्वतंत्रता है”, उनके सामने चुनौती यह है कि वे खुलेपन के इस माहौल को कायम रखते हुए कैसे वे अपने यहां उत्पादक अर्थव्यवस्था बनाएं। जाहिर है, राहुल गांधी की नजर में उत्पादन हर समाज की सर्वोपरि आवश्यकता है।

राजनीतिक स्वतंत्रता एक मनोगत पहलू है। इसलिए इस बारे में राहुल गांधी की जो समझ है, उस पर कई प्रश्न खड़े किए जा सकते हैं। लेकिन जहां तक उत्पादक अर्थव्यवस्था की जो जरूरत वे महसूस कर रहे हैं, उससे असहमत होने की गुंजाइश नहीं है। यह दीगर बात है कि उत्पादक अर्थव्यवस्था का अर्थ किस रूप में समझा जाता है और इसे कैसे निर्मित किया जा सकता है, इस बारे में उनसे बहस की गुंजाइश बची हुई है।

4-    देश के मौजूदा माहौल को अगली सरकार कैसे बदलेगी?

राहुल गांधी से पूछा गया कि अगर 2024 के आम चुनाव में INDIA गठबंधन जीत गया, तो अगली सरकार आज देश में मौजूद हिंसा और नफरत के माहौल को कैसे बदलेगी? राहुल गांधी इसके दो जवाब दिएः

      उनके मुताबिक चूंकि आज हिंसा और नफरत फैलाने का काम सरकार के संरक्षण में हो रहा है, इसलिए यह संरक्षण हटते ही आज के माहौल पर एक ब्रेक या लगाम स्वतः लग जाएगा।

      लेकिन अधिक गंभीर प्रश्न यह है कि तमाम तरह की संस्थाओं को पटरी से उतारते हुए जिस तरह उनकी संवैधानिक भावना के विपरीत भूमिका बना दी गई है, उसे कैसे ठीक किया जाएगा। राहुल गांधी ने कहा कि ऐसा करना एक कठिन चुनौती है। इसलिए कुछ उदाहरण कायम करने होंगे, ताकि यह साफ संदेश जाए कि जिन लोगों ने संवैधानिक व्यवस्था या भावनाओं से खिलवाड़ किया है, उन्हें उसके परिणाम भुगतने होंगे।

मगर इसमें जो बात छूट गई, वो यह है कि अगर यह सारा काम एक उपकरण ने एक ढांचे के मकसदों को पूरा करने के लिए किया है, तो आखिर उस ढांचे की जवाबदेही तय करने का क्या उपाय है? इस सिलसिले में राहुल गांधी ने यह कहा कि जब अर्थव्यवस्था में सरकार अपनी भूमिका बनाएगी, तो अभी बन गए असंतुलन को दूर करने का रास्ता निकलने लगेगा। लेकिन फिलहाल यही कहा जा सकता है कि राहुल गांधी जो कहा, वह अभी तक sketchy है- यानी उसमें अभी विवरण का अभाव है।

हालांकि कांग्रेस पार्टी का पूरा विमर्श अर्थव्यवस्था और विदेश नीति संबंधी बुनियादी और गंभीर से प्रश्नों दूरी बनाए हुए है, इसके बावजूद राहुल गांधी और पार्टी के डेटा एनालिसिस डिपार्टमेंट के अध्यक्ष प्रवीण चक्रवर्ती की बातों में पुनर्विचार और आज के सवालों से उलझने के प्रयास नजर आते हैं। चक्रवर्ती ने गुजरे महीनों में अपने लेखों और संवाद में कुछ महत्त्वपूर्ण बातें कही हैं। उन्होंने कहा हैः

  • आर्थिक विकास की जीडीपी केंद्रित समझ पर पुनर्विचार की जरूरत है। एक लेख में उन्होंने कहा कि मुद्दा जीडीपी नहीं, बल्कि जेडीपी (जॉब्स डेटा प्रोडक्ट) है। जाहिर है, उन्होंने सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर संबंधित ऐसी समझ पर सवाल खड़ा किया, जिससे रोजगार के अवसर पैदा ना हो रहे हों।
  • एक संवाद में चक्रवर्ती ने यह स्वीकार किया कि प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (Direct Benefit Transfer) की योजनाएं रोग का इलाज नहीं, बल्कि महज दर्द निवारक दवा हैं। उन्होंने कहा – ‘(ऐसे) चुनावी वादे दर्दनिवारक दवा हैं, लेकिन इनकी तब तक जरूरत रहेगी, जब तक हम मर्ज का ढांचागत इलाज नहीं हासिल कर लेते।’
  • इसके पहले एक अन्य लेख में चक्रवर्ती ने कहा था कि चीन के आर्थिक मॉडल की सफलता ने पश्चिम के विकसित देशों को अपने आर्थिक मॉडल पर पुनर्विचार करने को मजबूर कर दिया है। जाहिर है, चीन के जिस आर्थिक मॉडल का जिक्र उन्होंने किया, वह सरकार नियोजित- सार्वजनिक क्षेत्र केंद्रित अर्थव्यवस्था है। जबकि जिन देशों को पुनर्विचार के लिए मजबूर होना पड़ा है, उन्होंने नव-उदारवादी- वित्तीय पूंजीवाद का मॉडल अपना रखा है।

उपरोक्त तमाम बातों के बीच अगर हम कड़ी जोड़ना चाहें, तो उसकी गुंजाइश मौजूद है। राहूल गांधी और प्रवीण चक्रवर्ती ने जो कहा है, वह असल में 1991 में देश के लिए अपनाई गई आर्थिक दिशा की उपयोगिता पर पुनर्विचार है। गौरतलब है कि ऐसे सवालों और सोच की झलक आज हर उस देश में देखने को मिल रही है, जिन्होंने End of History के उद्घोष के दौर में मुक्त बाजार की अर्थव्यवस्था का अंधानुकरण किया।

अगर गंभीरता से सोचा जाए, तो जिस मोनोपॉली कॉरपोरेट ताकत को आज राहुल गांधी समस्या बता रहे हैं, असल में उसके उदय के पीछे भी मुक्त बाजार की वही नीतियां रही हैं। उन नीतियों ने वह ढांचा तैयार किया है, जिसने नरेंद्र मोदी जैसे demagogue (जनोत्तेजक) नेताओं की तलाश लगभग हर कथित लोकतांत्रिक देश में की है, जो निर्बाध रूप से उनके हितों को साध सकें। राहुल गांधी की यह समझ सटीक है कि आज असली लड़ाई उसी ढांचे से है।

लेकिन सवाल यही है कि यह लड़ाई कौन लड़ेगा और कैसे लड़ी जाएगी? कांग्रेस सहित तमाम संसदीय विपक्ष का अधिकांश हिस्सा ना तो इस चुनौती की समझ रखता है, और ना ही उसमें ऐसे कठिन संघर्ष का माद्दा है। दरअसल, उन दलों के नेतृत्व का वर्ग चरित्र ऐसी उम्मीद भी बंधने नहीं देता कि वे नेता या दल धीरे-धीरे आज की असल चुनौती को समझने और उसके मुताबिक रणनीति अपनाने की तरफ बढ़ेंगे।

बहरहाल, राहुल गांधी की बातों का महत्त्व यह है कि उन्होंने इन गंभीर प्रश्नों पर चर्चा और बहस का मौका दिया है। वरना, भारत के मेनस्ट्रीम राजनीतिक विमर्श में आज ऐसे मुद्दों पर सोच-विचार की जगह ही नहीं नजर आती है। नरेंद्र मोदी के नाम पर पक्ष और विपक्ष का ध्रुवीकरण इतना सघन है कि इस व्यक्ति केंद्रित चर्चा से आगे की बातें ओझल बनी रहती हैं- उन लोगों की दृष्टि भी उस ढांचे तक नहीं जाती, जिनका चर्चा को मोदी समर्थन बनाम मोदी विरोध तक में सीमित रखने में कोई स्वार्थ नहीं है। विवेकहीनता के इस माहौल के कारण राहुल गांधी की बातें ताजा हवा के एक झोंके की तरह महसूस हुई हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि झोंके को कैसे एक बड़ी आंधी में बदला जाए, जिससे आज की पॉलिटिकल इकॉनमी के ढांचे की जड़ों को हिलाया जा सके। राहुल गांधी ने इस दिशा में किसी सोच का संकेत अभी तक नहीं दिया है। यह तथ्य उनकी एक बड़ी सीमा बना हुआ है।

By सत्येन्द्र रंजन

वरिष्ठ पत्रकार। जनसत्ता में संपादकीय जिम्मेवारी सहित टीवी चैनल आदि का कोई साढ़े तीन दशक का अनुभव। विभिन्न विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता के शिक्षण और नया इंडिया में नियमित लेखन।

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