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डफर संस्कृति का गौरव!

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अपने प्रायोजित प्रशंसकों द्वारा बॉन्ड कहे जाने वाले एक साहब ने एक विदेशी तथासाम्राज्यवादी मतवाद को ‘भारतीय संस्कृति का गौरव’ बताया है। यदि हमारे प्रायोजित बॉन्ड महोदय इस मतवाद को सचमुच जानते, तो इसे भारतीय संस्कृति का गौरव कहकर अपने देशवासियों को अपमानित नहीं करते। …उन्होंने उस मतवाद का शायद ही कभी अध्ययन किया है। क्योंकि उसे जानने वाला कोई गैर-अनुयायी सिहरे बिना नहीं रह सकता। सदियों से विश्व के बड़े विद्वान – डेविड ह्यूम, तॉकेविल, शॉपेनहावर, गिब्बन, मार्क ट्वेन, बर्नार्ड शॉ, स्वामी दयानन्द, विवेकानन्द,  श्री अरविन्द, कविगुरू टैगोर,  डॉ. अम्बेदकर, आदि – उसे पढ़-जान कर खारिज करते रहे हैं।

अपने नियोजित प्रशंसकों द्वारा बॉन्ड कहे जाने वाले साहब ने एक विदेशी, साम्राज्यवादी मतवाद को ‘भारतीय संस्कृति का गौरव’ बताया है। हालाँकि असली बॉन्ड किसी फिल्म में संस्कृति पर व्याख्यान देते नहीं मिलता। पर यहाँ महात्माई किस्म के राजनीतिकों ने आत्म-प्रशंसा और बड़बोलेपन की बीमारी फैलाई है, जो उन के मुसाहिबों को भी लग जाती है। कहा भी है, संगत से गुन होत है…

उस विजातीय मतवाद को भारतीय संस्कृति का गौरव बताना भी वैसा ही छुतहा गुन है। देश में एक पूरा संप्रदाय है जिन के नेता हर विदेशी, आक्रामक मतवाद और उस के प्रेरणा-पुरुषों को हिन्दू अवतारों के समान बताकर खुद कुप्पा होते हैं! मानो उन आक्रामक मतवादों के अनुयायी ऐसी उदारता से प्रभावित हो मित्र बन जाएंगे। चाहे बुद्धि ऐसी कि दशकों से ऐसा करते हुए इन नेताओं ने कभी परखा नहीं कि उन्हें वे आक्रामक मतवादी वस्तुतः क्या मानते भी हैं?

बहरहाल, प्रायोजित बॉन्ड ने उस हानिकारक विदेशी मतवाद को ‘भारतीय गौरव’ बताकर बुद्धिहीनता ही दर्शाई। उन्होंने उस मतवाद का शायद ही कभी अध्ययन किया है। क्योंकि उसे जानने वाला कोई गैर-अनुयायी सिहरे बिना नहीं रह सकता। सदियों से विश्व के बड़े विद्वान – डेविड ह्यूम, तॉकेविल, शॉपेनहावर, गिब्बन, मार्क ट्वेन, बर्नार्ड शॉ, स्वामी दयानन्द, विवेकानन्द,  श्री अरविन्द, कविगुरू टैगोर,  डॉ. अम्बेदकर, आदि – उसे पढ़-जान कर खारिज करते रहे हैं। कारण यही कि उस में अपने मत से बाहर के लोगों के प्रति घृणा और हिंसा के आवाहन बारं-बार दुहराए गए हैं। उस मतवाद के प्रणेता ने अपनी किताब को खुद ही ‘मेरी चेतावनी’ और ‘धमकी’ कहा है।

हजार साल से भी पहले वह मतवाद भारत में हमलावर के रूप में आया, और तब से उस का पूरा रिकॉर्ड केवल विध्वंस, अत्याचार, बलात्कार, भारतीय धर्म और ज्ञान केंद्रों का विनाश, लोगों को जबरन अपने मतवाद में लाना, घृणित भोजन के लिए विवश करना, लोगों को गुलाम बनाकर बाहर अपने मतवादी देशों के बाजारों में नियमित बेचना, आदि रहा है। यह सारी बातें उन मतवादियों ने अपनी गौरव गाथाओं के रूप में खुद लिख रखा है। उसी को वे आज भी पढ़ते, रटते, गर्वित होते दुहराते हैं। कथनी करनी दोनों में। क्योंकि वही उन का मतवाद है।

अपने सिद्धांत, व्यवहार, इतिहास, एवं भविष्यत योजना, हर दृष्टि से वह मतवाद दूसरों के लिए डरावना और घृणित है। उस की मूल किताब की दो-तिहाई सामग्री अपने मत से बाहर वालों के प्रति अपमान और क्रूरता से भरी है। उस में ठोक-ठोक कर कहा गया है कि वह मतवाद नहीं अपनाने वाला स्वतः दोषी है। फलतः अपमानित होने और मारे जाने लायक है। अपने मतवाद से बाहर के लोगों को उस में ‘दुश्मन’, ‘जानवर’, ‘अंधे’, ‘बहरे’, ‘गूँगे’, ‘गंदे’, ‘बंदर’, ‘सुअर’ आदि कहा गया है। इस प्रकार, वह मतवाद भारत के सभी मूल धर्मों, विचारों, समाजों को खात्मे के लायक मानता है। अपने प्रायोजित बॉन्ड इसी मतवाद को भारतीय संस्कृति का गौरव बता कर फूल रहे हैं!

उस मतवाद में ऐसी बातें कोई अपवाद नहीं। उस में अपने मतवाद से इतर लोगों, प्रतीकों, मूल्यों, आदि के लिए एक भी अच्छी बात खोजना असंभव है। उस की मूल किताब साफ कहती है कि वह मतवाद न मानने वालों से घृणा की जा सकती; उन का गला काटा जा सकता; मार डाला जा सकता; उन्हें धोखा दिया जा सकता; आतंकित; अपमानित किया जा सकता है। बल्कि उन से दोस्ती रखने वाला अपना मतवादी भी दंडनीय है, आदि। यही सब बातें वह मतवाद अपने अनुयायियों को सारी दुनिया में पढ़ाता-सिखाता है।

वह दूसरे सभी विचारों, संस्कृतियों के देवी-देवताओं, अवतारों, ज्ञान-परंपराओं, ज्ञानियों को झूठा कहता है। उस की मूल किताब के अनुसार, केवल उस की पूज्य हस्ती सच है, और “दूसरे पुकारे जाने वाले देवी-देवता झूठ हैं।” इसी तरह अपने अनुयायियों को प्रेरित करते वह दूसरों के विरुद्ध दुराव, घृणा, हिंसा, और उन पर कब्जे की सीख देता है। यही उस का सदियों का वास्तविक व्यवहार भी रहा है। अतः वह हर तरह से एक साम्राज्यवादी, हानिकारक मतवाद ही है। उस के अनुयायी जिन-जिन देशों में बहुत कम हैं, वहाँ अपेक्षाकृत शान्ति से रहते हैं। किन्तु संख्या बढ़ते ही हर देश में शिकायत, दावे, दंगे, शुरू हो जाते हैं। यह पूरी दुनिया का अनुभव है।

क्या ऐसी मानसिकता और पंरपरा को भारत में ‘गौरव’ माना गया है? ऐसे मतवाद की झूठी चापलूसी करके प्रायोजित बॉन्ड महोदय उस की उग्रता को शह दे रहे हैं। जिस से बॉन्ड महोदय की संततियाँ भी कल साँसत में पड़ सकती हैं।

उस मतवाद की मूल किताबें स्पष्ट दिखाती हैं कि दूसरों का खात्मा ही उस का केंद्रीय लक्ष्य है। इस के लिए उस के पास एक विशेष अवधारणा, उस के व्यवहार की संहिता, और उदाहरण-शास्त्र भी है। कब, कैसे, क्या-क्या करना है ताकि दूसरों का खात्मा किया जा सके। उस की मूल किताब में एक चौथाई सामग्री इसी अवधारणा पर है। जिस का अर्थ, उस के अपने शब्दों में दूसरों को ‘मारना और मरना’, slay and be slain, ही है। उस अवधारणा का कोई अन्य अर्थ उस किताब में नहीं मिलता। उन के उदाहरण-शास्त्र में भी बार-बार दुहराई गई बात यही है कि सब से वह मतवाद स्वीकार करवाओ। जब तक वह न हो तब तक गैर-मतवादियों को नीच अवस्था में अपमानित रखो, उन से विशेष टैक्स लो, या मार डालो।

उस विशेष अवधारणा के अंतर्गत गैर-मतवादियों से लड़ने, उन्हें लूट कर आपस में माल बाँटने का वर्णन भी है। उस किताब में एक अध्याय का शीर्षक ही है, ‘लडाई में लूटा माल’, जिस के सभी निर्देश गैर-मतवादियों पर हमला करके लूट का माल बाँटने के बारे में है। उस किताब में अन्य लोगों पर आक्रामक लड़ाई को स्थाई बताया गया है। यानी जब तक पूरी दुनिया इस मतवाद की न हो जाए तब तक गैर-मतवादियों को जहाँ पाओ, मार डालो, घात लगाओ, छिप कर वार करो, आदि। इस ने अपने उन मतवादियों को भी फटकारा धमकाया है, जो इस आक्रामक लड़ाई से बचना चाहते हैं।

साथ ही, यह मतवाद अपने समाज को भी डरा-धमका कर रखता है। मतवाद छोड़ने वालों को मार डालने की व्यवस्था रखी गई है। यह अपनी स्त्रियों और बच्चों के प्रति भी हानिकारक विचार रखता है। उन्हें पुरुषों के भोग की निर्जीव संपत्ति जैसा रखा, फेंका, बाँटा, चोट पहुँचाया जा सकता है। कुल मिलाकर स्त्रियाँ और बच्चे भी उस मतवाद की सेवा और प्रसार के उपकरण भर हैं। उस की मूल किताब में परिवार जैसी किसी चिन्ता, या भावना तक का स्थान नहीं मिलता। सब कुछ केवल मतवाद का दबदबा बढ़ाने को समर्पित है। उस से कम या ज्यादा कुछ भी उस में नहीं मिलता। यह उस के समाजों में प्रत्यक्ष दिखता भी है। उसे ज्ञान, विज्ञान, कला, संगीत, साहित्य, आदि से कोई मतलब नहीं रहा है। बल्कि इन में कुछ को तो वह नाजायज घोषित करता है। जिसे उस के पक्के अनुयायी जब-जहाँ बस चले, लागू भी करते हैं।

इस प्रकार, उस मतवाद की अपनी मूल किताबों से आकलन करें तो उस का एक मात्र लक्ष्य है:  जैसे भी हो दूसरों का विनाश। इतनी उग्रता से कि इस के लिए अनुयायियों को अपने सगे-संबंधियों तक से दुराव रखने के लिए कहा गया है। उस में धमकी के साथ यह निर्देश है, ‘‘तुम्हारे पिता, भाई, बीवी, सगे-संबंधी, जायदाद, व्यापार, मकान – अगर ये तुम्हें [इस मतवाद के पूज्य व प्रेरक तथा इन के लिए] लड़ने से ज्यादा प्यारे हों, तो बस इन्तजार करो [पूज्य] तुम्हारा हिसाब करेगा।’’

यह सब केवल कोरी बातें नहीं हैं। पूरी दुनिया में इस मतवाद के अनगिनत संगठनों और नेताओं द्वारा नित्य ठीक वही भावना और क्रिया-कलाप दिखते रहे हैं।  यदि हमारे प्रायोजित बॉन्ड महोदय इस मतवाद को सचमुच जानते, तो इसे भारतीय संस्कृति का गौरव कहकर अपने देशवासियों को अपमानित नहीं करते। पर डफर वही, जो डफर जैसे काम करे।

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By शंकर शरण

हिन्दी लेखक और स्तंभकार। राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। कई पुस्तकें प्रकाशित, जिन में कुछ महत्वपूर्ण हैं: 'भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहासलेखन', 'गाँधी अहिंसा और राजनीति', 'इस्लाम और कम्युनिज्म: तीन चेतावनियाँ', और 'संघ परिवार की राजनीति: एक हिन्दू आलोचना'।

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