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गपशप

बिहार में राजनीतिक नैतिकता गटर में

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झारखंड में अगर संवैधानिक मर्यादा का मजाक बना तो उससे पहले बिहार में राजनीतिक नैतिकता का मजाक बना। सोचें, ये दोनों घटनाएं अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के उद्घाटन और रामलला की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा के बाद हुई हैं। भाजपा और हिंदुवादी संगठन महीनों से प्रचार कर रहे थे कि राम आएंगे। फिर राम आ गए। लेकिन क्या राम के साथ उनकी मर्यादा भी आई है? क्या यही राम की मर्यादा है कि फायदे के लिए जानी दुश्मन को भी गले लगा लो या फायदे के लिए संवैधानिक व राजनीतिक मर्यादा को ताक पर रख दो? क्या भगवान राम ने अयोध्या की गद्दी पर बैठने के लिए इस तरह के काम किए थे? कथित तौर पर राम को लाने वालों को क्या राम की मर्यादा, वीरता, साहस, विनम्रता, त्याग, उद्दात चरित्र का जरा सा भी पालन नहीं करना चाहिए?

भाजपा के नेता पानी पी-पीकर नीतीश को कोस रहे थे और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कई बार बिहार जाकर ऐलान किया था कि नीतीश कुमार के लिए भाजपा के खिड़की दरवाजे सब बंद हैं। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा था कि भाजपा अब किसी को कंधे पर नहीं बैठाएगी। भाजपा के प्रदेश के नेता रोज नीतीश को गालियां दे रहे थे और नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर रहे थे। लेकिन अचानक किसी फीडबैक से भाजपा को लगा कि बिना नीतीश के चुनाव लड़ने पर भाजपा को नुकसान हो सकता है। इसलिए सारी बातें भूल कर उनको फिर से गले लगा लिया गया। रातों रात नीतीश कुमार फिर सुशासन बाबू बन गए। प्रधानमंत्री उनको बधाई और शुभकामना देने लगे और राज्यपाल ने पलक झपकते उनकी सरकार बनवा दी। उनके सारे अवगुण धुल गए। उन्होंने विपक्ष को एकजुट किया था और ‘इंडिया’ के गठन की नींव रखी थी। उन्होंने केंद्र की सरकार से भाजपा को हराने का संकल्प किया था। नीतीश ने हिसाब बताया था कि 50 सीटें कम कर दी जाएं तो भाजपा का बहुमत कम हो जाएगा। वह 272 के जादुई आंकड़े से नीचे आ जाएगी। तभी भाजपा चिंता में थी और चिंता दूर करने का तरीका यह निकाला गया कि नीतीश कुमार को फिर मुख्यमंत्री बना कर उनको अपने साथ मिला लिया गया।

सोचें, बिहार में नीतीश कुमार को भाजपा ने अपना जानी दुश्मन माना था। जब वे पहली बार भाजपा को छोड़ कर गए थे तब नरेंद्र मोदी ने उनके डीएनए में गड़बड़ी का आरोप लगाया था। असल में मोदी का उनसे विवाद बरसों पुराना है, जब नीतीश बिहार के मुख्यमंत्री थे और भाजपा जूनियर पार्टनर थी, तब सन 2010 में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक पटना में हुई थी और नीतीश कुमार ने भाजपा के सभी नेताओं को रात्रिभोज का न्योता दिया था। जिस दिन रात्रिभोज रखा गया था उसी दिन बिहार के अखबारों में गुजरात के तब के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का एक विज्ञापन छप गया, जिसमें किसी चुनाव प्रचार के दौरान वे नीतीश कुमार का हाथ उठा कर खड़े हैं। इस विज्ञापन से नीतीश इतना भड़के कि उन्होंने रात्रिभोज रद्द कर दिया। उसके बाद उन्होंने ऐलान किया था कि अगर भाजपा मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाती है तो वे तालमेल खत्म कर लेंगे। उन्होंने 2013 में भाजपा की घोषणा के बाद तालमेल खत्म कर लिया। उसके बाद ही मोदी ने उनके डीएनए में गड़बड़ी का आरोप लगाया था।

इसके बाद चार साल तक दोनों पार्टियां अलग अलग रहीं। 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी ने नीतीश को हराया तो 2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश ने लालू प्रसाद के साथ मिल कर मोदी को शिकस्त दी। लेकिन दो साल बाद 2017 में भाजपा अपने सारे अपमान भूल गई औऱ नीतीश कुमार के साथ मिल कर बिहार में सरकार बना ली। 2015 के चुनाव की हार से भाजपा ने यह सबक लिया कि चाहे उसने नीतीश को कुछ भी कहा हो या नीतीश ने उसक साथ कुछ भी किया हो चुनाव नीतीश के बगैर नहीं लड़ना है। अभी तो लोकसभा चुनाव है, जिसमें नरेंद्र मोदी की सत्ता दांव पर लगी है। इसलिए भी कोई जोखिम लेने का सवाल नहीं था।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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