अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी के नेताओं की मानें तो भारत विश्वगुरू हो गया है। दुनिया भारत की बात को बहुत गंभीरता से सुनती है। लेकिन यह कैसी विश्वगुरूता जो भारत की विदेश नीति के फैसले दूसरे देश करते हैं? भारत दुनिया में किस देश के साथ क्या व्यापार करेगा यह भी दूसरे देश तय करते हैं? अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो भारत आए तो उन्होंने पहले ही ऐलान कर दिया कि वेनेजुएला की कार्यकारी राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्स भारत आएंगी और भारत वेनेजुएला से ज्यादा तेल खरीदेगा।
ध्यान रहे वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अमेरिकी फौज ने उठा कर अमेरिकी जेल में डाल रखा है। उनकी जगह रोड्रिग्स डमी राष्ट्रपति है। वे भारत आएंगी और भारत उनके साथ ज्यादा तेल खरीदने का सौदा करेगा, इसकी घोषणा अमेरिका के विदेश मंत्री कर दे रहे है। इससे पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम की घोषणा की थी तो दर्जनों बार कहा कि भारत और पाकिस्तान को व्यापार व टैरिफ की धमकी देकर उन्होंने युद्धविराम कराया था।
बहरहाल, भारत वैसे भी वेनेजुएला से अब ज्यादा तेल खरीदने लगा है। वेनेजुएला अब भारत का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का आपूर्तिकर्ता है। उसने सऊदी अरब और कई खाड़ी देशों को पीछे छोड़ दिया है। मादुरो का तख्ता पलटे जाने के तुरंत बाद भारत की निजी और सरकारी कंपनियों ने वेनेजुएला से तेल के सौदे शुरू कर दिए थे। अब मार्को रुबियो कह रहे हैं कि भारत जितना चाहेगा उतना तेल अमेरिका देगा और भारत वेनेजुएला से ज्यादा तेल खरीदेगा। रुबियो ने भारत यात्रा शुरू की तो कोलकाता गए और वहां मदर टेरेसा के मिशनरीज ऑफ चैरिटी का दौरा किया।
उसके बाद वे दिल्ली आए तो सबसे पहले प्रधानमंत्री से मिलने गए। संभवतः पहली बार टॉप टू डाउन डिप्लोमेसी देखने को मिली। कायदे से विदेश मंत्री रुबियो को भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर से मिलना चाहिए था। दोनों की दोपक्षीय वार्ता के बाद उनकी मुलाकात प्रधानमंत्री से होती, जहां वे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का संदेश उनको देते। लेकिन रूबियो ने शुरुआत ही प्रधानमंत्री से मुलाकात से की। सोचें, अमेरिका के विदेश मंत्री ने भारत के प्रधानमंत्री के साथ पहले दोपक्षीय वार्ता की। उसके बाद वे जयशंकर के साथ बैठे। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री मोदी से मिल कर निकलने के बाद रुबियो ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट किया, जिसमें लिखा कि भारत ने अगले पांच साल में अमेरिका से पांच सौ अरब डॉलर का सामान खरीदने की प्रतिबद्धता जताई है।
पहली बार यह बात तब सुनने को मिली थी जब अमेरिका के साथ व्यापार समझौते का फ्रेमवर्क जारी हुआ था। लेकिन तब इसका बड़ा विरोध हुआ। विपक्ष ने मुद्दा बनाया तो इसकी भाषा बदली गई। कहा गया कि भारत की अगले पांच साल में पांच सौ अरब डॉलर का सामान खरीदने की मंशा है। यानी प्रतिबद्धता की जगह मंशा कर दिया गया। लेकिन रुबियो ने एक बार फिर प्रतिबद्धता शब्द का लिखित रूप में जिक्र किया है। सवाल है कि क्या भारत सचमुच अमेरिका से हर साल एक सौ अरब डॉलर यानी 10 लाख करोड़ रुपए का सामान खरीदेगा? अभी कुल कारोबार 10 लाख करोड़ रुपए का है, जिसमें से करीब सात लाख करोड़ का सामान भारत बेचता है और ढाई से तीन लाख करोड़ रुपए का सामान खरीदता है। इससे भारत का अमेरिका के साथ व्यापार मुनाफे में चलता है। अगर हर साल 10 लाख करोड़ रुपए का सामान खरीदेंगे तो भारत के लिए व्यापार भारी घाटे का होगा। भारत में इस बात पर पूरा सन्नाटा है। सरकार कुछ नहीं कह रही है। तभी ऐसा लग रहा है कि राष्ट्रपति ट्रंप भारत को जो बेचना चाहेंगे और जैसे बेचना चाहेंगे, भारत उसे खरीदेगा।
