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अपनी गलतियों को साजिश बना दिया

New Delhi, Apr 16 (ANI): Prime Minister Narendra Modi speaks in Lok Sabha during the Budget Session (2026-27) of Parliament, in New Delhi on Thursday. (Sansad TV/ANI Video Grab)

दुनिया भर के देशों के बीच शह मात का खेल चलता है। अपने फायदे के लिए सब किसी न किसी किस्म की साजिश में शामिल होते हैं। लेकिन साथ ही वे वैश्विक अलायंस भी बनाते हैं और अपने को आर्थिक व सामरिक तौर पर तैयार भी करते हैं। भारत की नरेंद्र मोदी सरकार के साथ समस्या यह है कि उसे वैश्विक साजिशों की या तो परवाह नहीं है या उसने मान लिया है कि उनका मुकाबला नहीं किया जा सकता है। इसलिए उसने अपने राजनीतिक फायदे के लिए वैश्विक साजिशों का बहुत सरलीकरण कर दिया है। उसके लिए भारत के खिलाफ साजिश का मतलब होता है विपक्ष का विरोध, प्रदर्शन या विपक्ष का सरकार से सवाल पूछना। चाहे किसानों का आंदोलन हो या पहलवानों का आंदोलन हो या नौजवानों का आंदोलन हो, सरकार का इकोसिस्टम उसे वैश्विक साजिश बताता है।

हकीकत यह है कि इस तरह के तमाम आंदोलन या सरकार विरोधी प्रदर्शन या तो सरकार के नीतिगत फैसलों की वजह से हुए हैं या सरकार की विफलताओं की वजह से हुए हैं। कॉकरोच जनता पार्टी का जून और जुलाई में जंतर मंतर पर प्रदर्शन नीट यूजी के पेपर लीक की वजह से हुआ था। क्या नीट का पेपर किसी विदेशी साजिश के तहत लीक हुआ था या सरकार के अपने निकम्मेपन की वजह से हुआ था? 2024 और 2026 यानी तीन साल में दो बार नीट के पेपर लीक हुए और परीक्षा में गड़बड़ी हुई। जब इसके विरोध में युवा और छात्र सड़कों पर उतरे तो कहा गया कि विदेशी साजिश है। ऐसे ही तीन कृषि कानून नरेंद्र मोदी की सरकार ने बनाए थे। बहुमत नहीं होने पर राज्यसभा से विपक्ष को मार्शल के जरिए बाहर निकाल कर यह बिल पास कराया गया था। लेकिन जब किसान इसके विरोध में उतरे तो उनको खालिस्तानी, आतंकवादी बताया गया और आंदोलन को विदेशी साजिश करार दिया गया।

सोचें, भारत में विपक्ष को दबाने या खत्म करने का प्रयास किसने शुरू किया? कांग्रेस मुक्त भारत का नारा मोदी ने दिया। मोदी सरकार ने कांग्रेस और दूसरे विपक्षी नेताओं के पीछे केंद्रीय जांच एजेंसियों को लगाया। भाजपा ने सीबीआई, ईडी की कार्रवाई के बाद कथित भ्रष्ट नेताओं को अपनी पार्टी में लिया। इन सबका मकसद विपक्ष को कमजोर करना था। लेकिन जब दुनिया वी डेम जैसी संस्थाएं डेमोक्रेसी की रेटिंग में भारत को बहुत नीचे दिखाती हैं तो कहा जाता है कि विदेशी साजिश हो रही है।

ऐसे ही मोदी सरकार ने मीडिया को व्यवस्थित तरीके से पालतू बनाना शुरू किया। साम, दाम, दंड और भेद का इस्तेमाल करके प्रेस को दबाया गया या अपना बनाया गया। प्रतिबद्ध प्रेस बनाया। सरकार समर्थक कॉरपोरेट ने मीडिया समूहों का अधिग्रहण किया और बहुत प्रत्यक्ष रूप से सरकार की मदद उनको मिली। इससे जनता का भरोसा मीडिया पर से उठ गया। लेकिन जब दुनिया की संस्थाएं प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत को बहुत नीचे स्थान देती हैं तो कहा जाता है कि विदेशी साजिश हो रही है।

संस्थागत तौर पर देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समूह को अलग थलग किया गया। करीब 15 फीसदी आबादी वाले मुसलमानों का भाजपा में एक भी सांसद नहीं है और न एक भी मंत्री है। भाजपा के नेता, सांसद और यहां तक कि मंत्री खुलेआम धर्म के आधार पर भड़काऊ भाषण देते हैं और अल्पसंख्यकों को देश छोड़ने की बात करते हैं। सार्वजनिक कार्यक्रमों में देश का गद्दार बता कर गोली मारने की बात होती है। लेकिन जब अमेरिकी संसद की एजेंसी से लेकर दूसरी संस्थाएं भारत को धार्मिक स्वतंत्रता के इंडेक्स में बहुत नीचे रखती हैं तो कहा जाता है कि भारत के खिलाफ साजिश हो रही है।

भारत प्रति व्यक्ति आय के मामले में बांग्लादेश से पीछे है। प्रति व्यक्ति डॉक्टर, नर्स व बेड की उपलब्धता, शिशु मृत्यु दर, कुपोषण, शिक्षा आदि के मामले में भी दुनिया के छोटे छोटे देशों से पीछे है। प्रदूषण के मामले में दुनिया के सबसे ज्यादा औद्योगिक हो चुके देशों से भी बहुत आगे है। 25 करोड़ लोगों को गरीबी से निकालने का दावा किया जाता है और 80 करोड़ लोगों को पांच किलो अनाज देने के लिए अपनी पीठ थपथपाई जाती है। और इन सबके आधार पर जब दुनिया की संस्थाएं मानव विकास के सूचकांक बनाती हैं और भारत को सबसे नीचे रखती हैं तो कहा जाता है कि विदेशी एजेंसियां साजिश के तहत ऐसा कर रही हैं।

सो, चाहे राजनीतिक दलों के नेताओं को परेशान करने का मामला हो, मीडिया को पालतू बनाने का मामला हो, धार्मिक स्वतंत्रता को बाधित करने का मामला हो या आर्थिक व सामाजिक विकास का मामला हो, इन सबकी जमीनी हकीकत या वैश्विक रिपोर्ट के आधार पर जब विपक्ष सवाल उठाता है उसका एक ही जवाब सरकार के पास होता है कि सब विदेशी साजिश है। सरकार ऐसा दिखाती है, जैसे यह भारत की वास्तविकता न हो।

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