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बंदर, तेंदुआ और भालू की लड़ाई!

दुनिया गदगद है! पहले धारणा थी अमेरिका छींक मारता है तो दुनिया को जुकाम हो जाता है। पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समय में दुनिया कुछ और ही देख रही है। हर दिन सुबह सबको इंतजार होता है कि आज बंदर के उस्तरे से अमेरिका कितना लहूलुहान हुआ! अमेरिका अब मजाक है। हाथी (महाशक्ति) की भीड़ के बीच ऐसा ढोल बजाता बंदर है, जिससे अमेरिका भले शर्मसार न हो, लेकिन दुनिया के भले मनुष्य जरूर शर्मिंदा हैं। अमेरिका कभी ऐसा हो जाएगा, किसने इसकी कल्पना की थी?

हाथियों के समाज ने एक ऐसा नेता पैदा किया जो उस्तरे से अमेरिका को भीतर और बाहर लहूलुहान कर दे रहा है। ट्रंप ने इस पुरानी बात को तो सही साबित किया है कि जिसके हाथ में लाठी, उसी की भैंस। पर साथ ही यह भी जताया है कि लाठी यदि बंदर का उस्तरा हो, तो डाल-डाल कूदता-उछलता बंदर हर संस्था, हर कायदे को अनिवार्यत लहूलुहान करेगा।

मैं पहले दिन से लिख रहा हूं खाड़ी की लड़ाई कुछ दिनों की नहीं, बल्कि महीनों, सालों का मामला है। सोचें, यूक्रेन युद्ध कितने सालों से चल रहा है? इज़राइल का गाज़ा ऑपरेशन कब से है? ट्रंप यदि, उस्तरा लिए तमाशाबाज बाजीगर हैं, तो नेतन्याहू की संगत उनके लिए सोने में सुहागा है? नेतन्याहू का व्यवहार घात लगाए बैठे तेंदुए जैसा है। घात पश्चिम एशिया की उन तमाम ताकतों को मारना है, जो इज़राइल को नक्शे से मिटा देने की बातें करते थे। इस मकसद में नंबर एक टारगेट खामेनेई राज है। नेतन्याहू ने ही ट्रंप को प्रेरित किया, उनका भरोसा बनाया कि उस्तरे के एक वार से चुटकियों में ईरान खत्म हो जाएगा। सो, ट्रंप वेनेजुएला, क्यूबा, ग्रीनलैंड की डालियों से उछलते-कूदते पश्चिम एशिया पहुंच गए। सपना देखा आधी रात के चंद घंटों में ईरान की लीडरशिप खत्म हो गई! 48 घंटों में अमेरिका में ढोल बजाया, हम जीते, अमेरिका फर्स्ट!

पर ईरान सभ्यताओं के इतिहास का वह भालू (रूस भी) है, जो घायल होकर भी डटा रहता है। वह सीधे नहीं दौड़ता, बल्कि घेरकर पकड़ता है। तभी बाकी अरब देशों ने 1948 से 1973 के बीच इज़राइल से सीधे लड़ कर दम तोड़ दिया। वही  अयातुल्लाह राज 48 वर्षों से अलग-अलग आतंकी संगठन बनाकर इज़राइल को घेरने की कोशिश में रहा है। हमास, हिज़्बुल्लाह, हूती या इराक में उसके बनाए सभी संगठन तेहरान के इस भालू स्वभाव से जुड़े हैं कि घेरकर मारना है!

पर समय ने नेतन्याहू का मौका बनाया। अक्टूबर 2023 में हमास ने आतंक मचाया और नेतन्याहू का मिशन शुरू। इसलिए ट्रंप के रहने तक अमेरिका अब खाड़ी लड़ाई से पीछे नहीं हट सकता। वही नेतन्याहू आकाश से कितने ही हमले करें, कितने ही लोगों को मारें, ईरान भी पस्त नहीं होना है। घायल भालू का भूगोल (ईरान) इतना लंबा-चौड़ा और जटिल है कि उसका पस्त होना मुश्किल है। इस हकीकत को समझ नेतन्याहू ने ट्रंप के दिमाग में अमेरिका की सेना को ईरान में उतारने की आवश्यकता पैदा कर दी है। अगले सप्ताह तक अमेरिकी सैनिक ईरानी जमीन पर उतरे हुए होंगे। फालतू बात है जो पाकिस्तान या मुनीर ईरान से समझौता करा दें। उलटे संभव है कि जनरल मुनीर फेल हुए तो ट्रंप पाकिस्तान के रास्ते से अपने सैनिक ईरान में घुसाएं। खाड़ी द्वीप, इराक और पाकिस्तान तीनों तरफ से तब घायल भालू को घेरने, मारने की तेंदुए की ग्रैंड रणनीति को दुनिया देखेगी!

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