Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

साजिश ट्रंप, पुतिन, शी की या मोदी, शाह की?

मोहन भागवत आरएसएस के सौ साल के सफर की बुद्धि को खुद ही एक्सपोज कर दे रहे हैं। वे विदेशी साजिश की बात कर उस सरकार का बचाव कर रहे हैं, जिसने पूरे संघ परिवार के चाल, चेहरे, चरित्र को भ्रष्ट किया है। जो ट्रंप हों या शी जिनपिंग, सभी के अलग-अलग दबावों में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता को बेच खा रहे हैं। जिन्होने संघ और खुद मोहन भागवत में इतना भी साहस नहीं छोड़ा कि दिन को दिन, रात को रात कह सकें! खुद्दारी, ईमानदारी से सच्ची बात (आलोचना) कर सकें। स्वदेश के हर मामले को जिन्होने बाजार, खरीद-फरोख्त, सत्ता की दलाली में काला बना दिया।

इसलिए मुझे आश्चर्य नहीं हुआ जो युवाओं के आंदोलन के लिए मोहन भागवत ने उस विदेशी साजिश का भाषण दिया, जिसे नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी यानी कांग्रेस भी जन्मजात से पूरे विपक्ष (संघ, जनसंघ भी शामिल) को विदेशी एजेंट करार दे कर, साजिश का हल्ला बनाते थे।

जबकि सोचें, भारत के आज के नौजवानों को किसने कॉकरोच कहा? कॉकरोचों पर पैलेट गन के छर्रे छोड़ने के आदेश किसने दिए? किसने मतदाता सूचियों में नाम कटवाकर चुनाव जीतने की साजिशें रचीं? पश्चिम बंगाल का चुनाव जीता? किसने भारतीयों में मनभेद बनवाए? उन्हें देशद्रोही, गद्दार, टुकड़े-टुकड़े या नक्सली दिमाग जैसे जुमले बोलकर नौजवानों को भड़काया? जेलों में डाला?

क्या अमेरिकी डोनाल्ड ट्रंप, रूसी पुतिन, चीन के शी जिनपिंग या पाकिस्तान के आसिम मुनीर ने भारत को हिंदू बनाम मुसलमान के पानीपत मैदान बनाने की राजनीति की? किस विदेशी खुफिया एजेंसी ने कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी को खड़ा किया?

जाहिर है, विदेशी साजिश की आशंका ही अपने आप में खुद मोदी सरकार की राजनीति की देन है। मोहन भागवत ने इस विजयादशमी के भाषण में चेताया है कि दुनिया में कुछ शक्तियाँ दूसरे देशों में सत्ता परिवर्तन कराती हैं। भारत उनका प्रमुख निशाना है। जबकि इन तमाम शक्तियों के गले लगकर प्रधानमंत्री मोदी ने भारत को इनका ऐसा बाजार बनाया है कि इसी सप्ताह अमेरिका के विदेश मंत्री मुंबई आए। भारत के तीन बड़े औद्योगिक घरानों अंबानी, टाटा, अडानी ग्रुप के टेंटुए दबाते हुए सीधे उनसे ही बात कर उन्हें अमेरिकी हितों के लिए निवेश, धंधे के लिए कहा!

इस नाते एक साहसी के. अन्नामलाई (पूर्व तमिलनाडु प्रदेश भाजपा अध्यक्ष) ने अच्छी प्रतिक्रिया दी। कहा—सरकार के विरोधियों को राष्ट्रविरोधी, विदेशी ताकतों से पैसा पाने वाला या विदेशी एजेंट बताना अब थका देने वाला, बोरिंग हो गया है। अन्नामलाई ने याद दिलाया कि 2011 में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के आंदोलन पर पुलिस कार्रवाई का तीखा विरोध किया था। तब मोदी को मनमोहन सरकार के खिलाफ आंदोलन करना सही लगता था। आज जब दिल्ली में सीजेपी के प्रदर्शनकारी पुलिस कार्रवाई का सामना कर रहे हैं तो उन्हें विदेशी ताकतों का मोहरा बताने की क्या तुक है? और यदि विदेशी पैसा आया है तो सरकार जाँच करे। गृह मंत्रालय के पास एफसीआरए है, खुफिया एजेंसियाँ हैं। प्रमाण के साथ कार्रवाई करे। मगर हर विरोधी को विदेशी एजेंट बताना क्या राजनीति है?

मेरा मानना है कि मोहन भागवत हों या नरेंद्र मोदी या अमित शाह, सभी जानते हैं कि कांग्रेस ने अपने समय में लगातार आंदोलनों के पीछे विदेशी साजिश का राग गाया। जवाहरलाल नेहरू लगातार अमेरिकी प्रभाव, साजिश की चिंता में जिए तो विरोधियों को विदेशी शक्तियों का एजेंट बताने के जुमले भी खूब थे। इंदिरा गांधी ने अमेरिकी एजेंसी सीआईए का नाम लेकर कानफाड़ू माहौल बनाया। तब स्वतंत्र पार्टी के नेता पीलू मोदी संसद में गले में तख्ती डाले रहते थे। उस पर लिखा होता था, ‘I am a CIA agent’। सो पचास वर्ष पहले भी कम्युनिस्टों का तेलंगाना विद्रोह हो या निर्गुट विदेश नीति का समय हो या जेपी आंदोलन हो, सभी सरकारों ने विरोध, आंदोलन, विपक्ष को विदेशी एजेंट करार दिया। और जरा मोहन भागवत की बुद्धि पर सोचें, जो इंदिरा गांधी की ही भाषा बोल रहे हैं और उस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रतिक्रिया दे रहे हैं—कितनी सही बात बोली है मोहनजी ने!

इंदिरा गांधी ने विदेशी हाथ और सरकार को अस्थिर करने की साजिश में आपातकाल लगाया। विपक्षी नेताओं को जेल में डाला। अखबारों पर सेंसरशिप लगी। मगर मार्च 1977 में जनता ने क्या जवाब दिया? बिना कुछ बोले इंदिरा गांधी को बेरहमी से वोट के जरिए सत्ता बाहर किया। ध्यान रहे, राजीव गांधी ने भी मई 1987 को दिल्ली के बोट क्लब पर कांग्रेस की रैली में विदेशी शक्तियों और भारत में उनके एजेंटों (वीपी सिंह, आडवाणी एंड पार्टी) पर देश को अस्थिर करने का आरोप लगाया था। हुआ क्या? लोकसभा की 425 सीटें जीतने वाले राजीव गांधी को जनता ने 1989 में सत्ता से निकाल बाहर किया।

मेरा मानना है कि शायद इसी की चिंता और मुगालतों में नरेंद्र मोदी, अमित शाह, ज्ञानेश कुमार येन-केन प्रकारेण चुनावों को ही अपने भक्त मतदाताओं से जेबी बना देना चाहते हैं। तभी एसआईआर के बहाने और कथित ‘बांग्लादेशी’ जुमले से तेरह करोड़ मतदाताओं के नामों, दस्तावेजों और उनकी पात्रता पर तलवार लटकाई है। सोचें, यदि किसी गरीब महिला के माता-पिता के पुराने दस्तावेज नहीं हैं, यदि किसी नौजवान का नाम सूची से हटता है, यदि किसी परिवार को अपनी पहचान फिर साबित करनी पड़ती है तो वह सवाल किससे पूछेगा? ट्रंप से? पुतिन से? शी जिनपिंग से? या आसिम मुनीर से? या भारत के चुनाव आयोग और भारत सरकार से? आखिर अपने देश में अपने मताधिकार को लेकर उसका सवाल उठाना विदेशी एजेंडा कैसे हो सकता है?

क्या ट्रंप, पुतिन, शी जिनपिंग या मुनीर में से किसी ने एसआईआर के खिलाफ आंदोलन खड़ा किया है? क्या किसी विदेशी सरकार ने प्रशांत भूषण को सत्ता परिवर्तन की माँग करने का निर्देश दिया? क्या सीजेपी के प्रदर्शनकारियों के पीछे किसी विदेशी खुफिया एजेंसी होने का कोई प्रमाण है?

Exit mobile version