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मामला भ्रष्टाचार का है ही नहीं

New Delhi, May 22 (ANI): A view of the Supreme Court of India, in New Delhi on Thursday. (ANI Photo/Rahul Singh)

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद एनसीईआईआरटी लाइन पर है और सरकार भी। सब सफाई दे रहे हैं और माफी मांग रहे हैं। एनसीईआरटी ने कोर्ट में माफी मांगी और किताबें वापस लेने का भरोसा दिया पर अदालत इतने पर संतुष्ट नहीं है। चीफ जस्टिस ने किताब पर रोक लगा दी है। लेकिन क्या यह सचमुच न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़ा मुद्दा है या इसके पीछे कोई और कहानी है? असल में एनसीईआरटी की आठवीं की किताब में ‘करप्शन इन ज्यूडिशियरी’ का जो अध्याय शामिल किया गया था वह न्यायपालिका में किसी भी स्तर पर मौजूद भ्रष्टाचार के बारे में छात्रों को बताने का उपक्रम था ही नहीं। ऐसा लग रहा है कि वह न्यायपालिका की साख पर सवाल खड़ा करने और लोगों के बीच धारणा को प्रभावित करने का प्रयास था। ध्यान रहे एनसीईआरटी की किताबें ऐसे नहीं तैयार हो जाती हैं कि किसी ने रैंडम कुछ लिख दिया और किताब छप गई। उसकी एक लंबी प्रक्रिया है। हर विषय की दो कमेटियां हैं, जो सामग्री तैयार कराने से लेकर उसके छपने तक की प्रक्रिया पर नजर रखती हैं।

आठवीं कक्षा के समाज विज्ञान की किताब में यह अध्याय है। यह सिर्फ संयोग है कि समाज विज्ञान की किताब तैयार करने वाले कैरिकुलर एरिया ग्रुप के प्रमुख आईआईटी गांधीनगर के गेस्ट प्रोफेसर मिशेल डेनिनो हैं। यह कमेटी सामाजिक विज्ञान की किताबों की सामग्री के चयन, लेखन आदि पर ध्यान रखती है। इसके बाद नेशनल सिलेबस एंड टीचिंग लर्निंग मैटेरियल्स कमेटी होती है। यह एक उच्चस्तरीय कमेटी है, जिसने किताब को अंतिम रूप दिया है। इस कमेटी के अध्यक्ष नेशनल स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन के चांसलर एमसी पंत हैं। प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मंजुल भार्गव इसके सह अध्यक्ष हैं। इनके अलावा इंफोसिस की सुधा मूर्ति और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के सदस्य संजीय सान्याल सहित 19 सदस्य हैं। सोचें, अगर इन सब लोगों ने सही में अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह किया है तो इसका मतलब होगा कि सबकी नजरों से किताब की सामग्री गुजरी और किसी को इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं दिखा।

तभी सवाल है कि फिर सरकार ने कोर्ट में इसका बचाव क्यों नहीं किया? अगर इतने लोगों ने मिल कर किताब तैयार करने में भूमिका निभाई है तो या तो सब पर कार्रवाई हो या फिर सरकार कोर्ट में किताब का बचाव करे। एक दिलचस्प संयोग यह भी है कि प्रोफेसर मिशेल डेनिन की अध्यक्षता वाली कमेटी ने ही इतिहास की किताबों से मुगल साम्राज्य की कहानियों में कटौती की थी और उसे घटा कर बहुत छोटा कर दिया था।

तभी सवाल है कि जो कमेटी देश में चल रहे सामाजिक और राजनीतिक नैरेटिव के हिसाब से किताबों की सामग्री तैयार कर रही है क्या उसने अनायास न्यायपालिका में कथित भ्रष्टाचार के मामले में आठवीं कक्षा के छात्रों को पढ़ाने का फैसला कर लिया था? किसी को इस पर यकीन नहीं हो सकता है। इस पूरे घटनाक्रम पर सोशल मीडिया में जो नैरेटिव बना है उसे बारीकी से देखें तो लग रहा है कि जिस मकसद से यह अध्याय किताब में शामिल किया गया था वह मकसद पूरा हो गया। न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की चर्चा शुरू हो गई और सर्वोच्च अदालत द्वारा इस चर्चा को रोके जाने को लेकर भी बहस छिड़ गई है। एक बड़ा समूह है, जो कह रहा है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है और उसकी जांच होनी चाहिए, उस पर चर्चा होनी चाहिए। वही समूह यह भी कह रहा है कि न्यायपालिका अपने मामले में तुरंत मर्माहत हो जाती है और नहीं चाहती है कि उसकी बातें लोगों के सामने आए।

सुप्रीम कोर्ट के बड़े वकील और जनहित याचिकाओं के माध्यम से लोगों की आवाज उठाने वाले प्रशांत भूषण ने भी सुप्रीम कोर्ट और कुछ वरिष्ठ वकीलों की टिप्पणियों पर आपत्ति की है। उन्होंने सोशल मीडिया में लिखा है कि 2007 में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने कहा था कि लोगों की नजर में न्यायपालिका दूसरी सबसे भ्रष्टाचार वाली संस्था है। उन्होंने लिखा है कि अगर इस पर चर्चा को दबाया जाएगा तो लोगों की धारणा और मजबूत होगी। बाद में एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक जेएस राजपूत ने भी सुप्रीम कोर्ट के रवैए पर सवाल उठाया और कहा कि अगर न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की चर्चा होती है तो उसे रोकना ठीक नहीं है। जाहिर है कि अब किताब भले प्रतिबंधित हो जाए और न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का अध्याय हटा कर बाद में किताब जारी हो लेकिन लोगों के बीच में यह मैसेज चला गया कि सरकार ने किताब तैयार कराई, जिसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का अध्याय था और उसे न्यायपालिका ने प्रतिबंधित कर दिया। इस तरह न्यायपालिका की साख पर सवाल भी उठ गया और उसके द्वारा अपने मामले को दबा देने की प्रवृत्ति का भी पता चल गया। लोगों के बीच इस घटनाक्रम के बाद न्यायपालिका के प्रति धारणा थोड़ी और बिगड़ेगी।

इस पूरे घटनाक्रम से जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला फिर चर्चा में आ गया है। दिल्ली हाई कोर्ट के जज रहे जस्टिस वर्मा के घर से जले हुए नोट बरामद हुए थे। यह घटना पिछले साल होली के समय की है और फिर होली आ गई। एक साल में कुछ भी नहीं हुआ है। संसद में महाभियोग का प्रस्ताव है, जिसकी जांच होनी है। लोग पूछ रहे हैं कि जज के यहां बोरियों में भरे नोट बरामद हुए तो क्या हुआ? अगर कार्रवाई करके कोई मिसाल बनाई गई होती तो उससे लोगों की धारणा सकारात्मक रूप से प्रभावित होती। लेकिन भ्रष्टाचार के इतने बड़े मुद्दे पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। इस बीच किताब में एक अध्याय जरूर शामिल कर दिया गया। अगर भ्रष्टाचार मुद्दा होता तो किताब में से नहीं हटाया जाता, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र से हटाया जाता, जहां वह शिष्टाचार की तरह स्थापित है। यह तो सिर्फ साख बिगाड़ने और उसके ऊपर दबाव बनाने की कोशिश का एक हिस्सा मात्र है।

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