चिड़ियां खेत चुग गईं और कल, शुक्रवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, “चिड़ियों को भी चुगने का अधिकार है…” इतना ही नहीं वे आंख मूंदकर ‘जेन-ज़ी’ पर भरोसा करने की बात कर रहे थे। तब प्रश्न है कि सात अगस्त 2026 को मोहन भागवत कहां थे, जब संसद मार्ग पर बच्चे-बच्चियों पर लाठियां बरस रही थीं, पैलेट गन के छर्रे दागे जा रहे थे?
या फिर 15 मई 2026 को वे किस मनःस्थिति में थे, जब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने दिल्ली हाई कोर्ट के वकीलों को फटकारते हुए देश के ही कुछ नागरिकों को ‘परजीवी’ और ‘कॉकरोच’ जैसी श्रेणियों में रख दिया? ध्यान रहे, उस दिन मुख्य न्यायाधीश दिल्ली हाई कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता (Senior Advocate) नामांकन प्रक्रिया में कथित देरी और उससे जुड़े विवाद पर सुनवाई कर रहे थे। याचिकाकर्ताओं की पीड़ा यह थी कि वरिष्ठ पदनाम देने की प्रक्रिया में योग्यता की बजाय पक्षपात और पसंद-नापसंद हावी है। लेकिन उनकी बात सुनने के बजाय उन्हें यह सुनना पड़ा, “समाज में कुछ परजीवी हैं, जो व्यवस्था पर हमला करते हैं। उन्हें रोज़गार नहीं मिलता और पेशेवर ज़िंदगी में कोई जगह नहीं मिलती। उनमें से कुछ मीडिया बन जाते हैं, कुछ सोशल मीडिया पर सक्रिय हो जाते हैं, कुछ आरटीआई कार्यकर्ता बन जाते हैं और फिर हर किसी पर हमला शुरू कर देते हैं”।
संघ परिवार स्वयं को सांस्कृतिक और नैतिक नेतृत्व का ठेकेदार बताता है। यदि ऐसा है तो उसके प्रमुख के नाते मोहन भागवत का दायित्व बनता था कि वे इस भाषा पर तत्काल आपत्ति दर्ज कराते। वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से कहते कि या तो इस शब्दावली पर सार्वजनिक खेद व्यक्त कराया जाए, या स्वयं प्रधानमंत्री स्पष्ट करें कि इस देश में कोई भी नागरिक “कॉकरोच” नहीं है। साथ ही, सरकार औपचारिक रूप से अदालत के आगे आग्रह रखे कि इस प्रकार की शब्दावली को वापस लिया जाए।
सो, जब विवाद चरम पर था, तब चुप्पी थी। मोहन भागवत, दत्तात्रेय होसबाले, कृष्ण गोपाल, अरुण कुमार और पूरे ‘भाईसाहब’ नेटवर्क में रत्ती भर भी जूं नहीं रेंगी। जंतर-मंतर पर हजारों छात्र-युवा बैठे रहे। आमरण अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक को पुलिस उठाकर अस्पताल ले गई। विपक्ष सक्रिय हुआ। तब भी मोहन भागवत के मुख से एक शब्द भी नहीं निकला। हां, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह अतुल लिमये ने उलटे ‘जेन-ज़ी’ और छात्रों के ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ आंदोलन को “संविधान-विरोधी” और “राष्ट्र-विरोधी” बता दिया। और अब मोहन भागवत ने कहा हैं कि “हमें उनकी बात सुननी चाहिए। उनसे बातचीत में कमी थी, इसलिए दिल्ली के जंतर-मंतर पर आंदोलन हुआ”।
आज जमीनी भारत का सीधा-सादा सच है कि देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है। आने वाले दो दशकों तक राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था का केंद्र यही पीढ़ी रहेगी। इस पीढ़ी का पहला सरोकार शिक्षा, परीक्षा, रोजगार और कमाई है।
लेकिन पिछले बारह वर्षों में यदि किसी क्षेत्र की सर्वाधिक बरबादी हुई है तो वह शिक्षा है। कहावत है खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। राजनीति का वही स्वभाव शिक्षा व्यवस्था में दिमाग, बुद्धि, काबलियत, कौशल को खा बैठा है। मोदी राज के स्मृति ईरानी, रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ और धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में शिक्षा कैसी हुई? कैसे चली? ‘भाईसाहब’ लोगों की नेटवर्किंग, भय-भूख-भक्ति की प्रवृति ने विश्वविद्यालयों को खा डाला है। खोखला बना दिया है।
तुलना करें। कांग्रेस काल में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, केएल श्रीमाली, हुमायूं कबीर, पीवी नरसिंह राव और डॉ. करण सिंह जैसे लोग शिक्षा मंत्री थे। वाजपेयी सरकार में डॉ. मुरली मनोहर जोशी थे। इनकी पहचान सबसे पहले एक शिक्षाविद् की थी। डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने भी अपने समय में कुलपति और उपकुलपति नियुक्त किए थे। लेकिन क्या वे इन बारह वर्षों के मोदी राज में विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों के नए खोखे से खुश होंगे? योग्यता से अधिक संघ नेटवर्क और मोदी-शाह के संकेत शिक्षा के मालिकानों की ऐसी दुकान बनी है, जिसका कोई धर्म-ईमान नहीं है। शिक्षा व्यवस्था की गिरावट की नई कहानी का यही मुख्य कारण है।
तभी आश्चर्य नहीं हुआ कि जंतर-मंतर पर एकत्र छात्रों की चिंता में डॉ. मुरली मनोहर जोशी का बयान देखा। पर तब भी मोहन भागवत की नींद नहीं खुली। उनमें साहस नहीं था। शायद मान रहे होंगे अमित शाह आंदोलन को ऐसा मारेगा, ऐसा मारेगा कि नौजवान की तरूणाई भी किसानों की तरह दम तोड़ देगी। इसलिए बेकार पंगा न लो। चुप रहो। तो लडके-ल़डकियां मोदी के रैप में थिरकेंगे या मोहन भागवत कीर्तन करेंगे। या मजा लेते हुए पूछेगें, “Hi buddy Pappu, are you backstage”?
