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निर्दलीय व अन्य को पटाने की कोशिश

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लोकसभा चुनाव, 2024 में भाजपा बहुमत से 32 सीट पीछे रह गई है। उसे 240 सीटें मिली हैं। हालांकि सहयोगी पार्टियों के साथ उसके गठबंधन एनडीए को 292 सीटें मिली हैं, जो बहुमत के जादुई आंकड़े से 20 ज्यादा हैं। लेकिन नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जो तासीर है उसमें यह संभव नहीं लग रहा है कि वे सहयोगी पार्टियों के दबाव में सरकार चलाएं। लेकिन अभी कोई दूसरा रास्ता भी नहीं दिख रहा है। एक रास्ता सहयोगी या विरोधी पार्टियों में तोड़ फोड़ का है, जिसमें ये दोनों नेता माहिर हैं।

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लेकिन यह काम अभी तुरंत नहीं हो सकता है क्योंकि प्रयास विफल हुआ तो सहयोगी पार्टियां भी भड़केंगी और उससे भाजपा की मुश्किलें बढ़ेंगी। तभी भाजपा ने इस बार के चुनाव में जीते निर्दलीय व अन्य सांसदों को पटाने का अभियान शुरू किया है। ध्यान रहे इस बार एनडीए और ‘इंडिया’ के बीच पूरी तरह से आमने सामने का चुनाव था। एनडीए को 292 और एनडीए को 204 सीटें मिली हैं। इसके अलावा एक पार्टी जो अलग लड़ी थी वह तृणमूल कांग्रेस थी, जिसे 29 सीटें मिली हैं। यानी इन तीन की संख्या 525 पहुंच जाती है। बची हुई 18 सीटें अन्य और निर्दलीय के खाते में है। भाजपा की ओर से इनके ऊपर डोरे डाले जा रहे हैं।

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मुश्किल यह है कि इन 18 अन्य में सात निर्दलीय हैं। इनमें से एक महाराष्ट्र की सांगली सीट से निर्दलीय चुनाव जीते विशाल पाटिल ने कांग्रेस को अपना समर्थन दे दिया है। वे कांग्रेस के दिग्गज रहे बसंत दादा पाटिल के पोते हैं। यह सीट उद्धव ठाकरे के खाते में चली गई थी तो कांग्रेस उनको टिकट नहीं दे पाई और वे निर्दलीय लड़े थे। कांग्रेस ने परदे के पीछे से उनका समर्थन किया था। इसी तरह दूसरे निर्दलीय बिहार की पूर्णिया सीट से जीते पप्पू यादव हैं। उन्होंने भी अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया था। लेकिन लालू प्रसाद और तेजस्वी यादव की जिद के चलते कांग्रेस उनको टिकट नहीं दे पाई। उनकी पत्नी कांग्रेस से राज्यसभा सांसद हैं। सो, पप्पू यादव भी कांग्रेस के साथ ही हैं। तीसरे निर्दलीय जम्मू कश्मीर की बारामूला सीट से जीते अब्दुल राशिद शेख उर्फ इंजीनियर राशिद है। वे कई गंभीर आरोपों में दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद हैं। सो, वे भी भाजपा के साथ नहीं जाएंगे और भाजपा भी उनको साथ लेना नहीं चाहेगी।

पंजाब से दो निर्दलीय जीते हैं। खदूर साहिब सीट से अमृतपाल सिंह जीते हैं, जिनको आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार किया गया था और वे असम की जेल में हैं। सो, भाजपा के लिए उनका समर्थन लेना भी आसान नहीं है। पंजाब से दूसरे निर्दलीय सरबजीत सिंह खालसा हैं, जो फरीदकोट सीट से जीते हैं। वे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हत्यारे बेअंत सिंह के पोते हैं। उनका भी साथ भाजपा कैसे लेगी यह देखने वाली बात होगी। ऐसे की लद्दाख की सीट से निर्दलीय मोहम्मद हनीफा जीते हैं, जिनका समर्थन भाजपा को मिलना मुश्किल है। सातवें निर्दलीय सांसद उमेशभाई बाबूभाई पटेल हैं, जो दमन और दियू सीट से जीते हैं। वे भाजपा के साथ जा सकते हैं। यानी सात में निर्दलीय में से सिर्फ एक के भाजपा के साथ जाने की सभावना फिलहाल दिख रही है।

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अब रही 11 अन्य की बात तो उसमें भी कई ऐसे हैं, जो भाजपा के साथ जा सकते हैं और कई ऐसे हैं, जो भाजपा के साथ नहीं जाएंगे। सबसे दिलचस्प स्थिति आंध्र प्रदेश में पांच साल तक सरकार चलाने के बाद बुरी तरह से हार कर सत्ता से बाहर हुए जगन मोहन रेड्डी की है। उनकी पार्टी के चार लोकसभा सांसद जीते हैं। उनको हराने वाले चंद्रबाबू नायडू की पार्टी टीडीपी केंद्र में सरकार का साथ दे रही है। ऐसे में वे क्या करेंगे? टीडीपी उनको सरकार के साथ नहीं आने देगी। अगर वे केंद्र की सत्ता से नहीं जुड़ते हैं तो उनके सांसदों पर खतरा है कि टीडीपी उन्हें तोड़ सकती है। इसलिए वे भाजपा से अंदरखाने बात कर सकते हैं।

अपने सांसदों को बचाने की जिम्मेदारी वे भाजपा पर डाल सकते हैं। जरूरी हुआ तो अपने सांसदों को भाजपा में शामिल भी करा सकते हैं ताकि नायडू उनकी पार्टी नहीं तोड़ सकें। अन्य में इन चार का समर्थन भाजपा के साथ होगा और इसी तरह अकाली दल की इकलौती सांसद हरसिमरत कौर बादल का भी समर्थन सरकार को हो सकता है। उत्तर प्रदेश की नगीना सीट से आजाद समाज पार्टी ने नेता चंद्रशेखर आजाद जीते हैं। उनके बारे में कहा जा रहा है कि वे भाजपा के साथ जा सकते हैं। सो, अन्य में से छह के भाजपा के साथ जाने की प्रबल संभावना है। लेकिन बाकी पांच के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है। जैसे हैदराबाद से एमआईएम के सांसद असदुद्दीन ओवैसी हैं, जिनके भाजपा के साथ जाने की कोई संभावना नहीं है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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