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उत्तर और दक्षिण का भारत

भारत के अंदर दो भारत की बात करें तो आर्थिक व सामाजिक आधार पर दो विभाजन के साथ साथ भौगोलिक विभाजन के आधार पर भी दो भारत दिखेंगे। यह विभाजन उत्तर और दक्षिण भारत का है। हर मामले में दोनों भौगोलिक इलाकों का अंतर साफ दिखाई देगा। उत्तर भारत या हिंदी पट्टी से बड़ी संख्या में लोग चेन्नई के शंकर नेत्रालय में इलाज के लिए जाते हैं। वहां से लौट कर हर व्यक्ति दक्षिण जाने वाली ट्रेनों की व्यवस्था, साफ सफाई का जिक्र करेगा और यह भी बताएगा कि अस्पताल कितना अच्छा है। दक्षिण के मंदिरों में जाकर लौटने वाले तो उनका गुणगान करते नहीं थकते हैं। खासतौर पर मंदिर की व्यवस्था और सफाई की। लेकिन सवाल है कि मंदिर या अस्पताल या ट्रेन की व्यवस्था उत्तर भारत में भी बेहतर क्यों नहीं हो सकती है? वैसी ही सफाई उत्तर भारत में भी क्यों नहीं होती? यह बुनियादी अंतर कई चीजों में दिखाई देता है।

अगर सिर्फ इस सदी के 25 साल की बात करें तो उत्तर और दक्षिण के दो बुनियादी रूप से अलग भारत की तस्वीर और साफ दिखेगी। इस सदी में ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था और आईटी क्रांति के इर्द गिर्द जैसा काम दक्षिण में हुआ है उसके मुकाबले उत्तर भारत में कुछ नहीं हुआ। दक्षिण में होड़ लगा कर बेंगलुरू और हैदराबाद ने काम किया। यह बहस छिड़ी कि भारत का सिलिकॉन वैली किस शहर को कहा जाए। इस तरह की कोई होड़ उत्तर भारत के राज्यों में नहीं दिखी। एक तरफ कर्नाटक और आंध्र प्रदेश आईटी और आईटी आधारित सेवाओं की इंडस्ट्री को प्रमोट कर रहे थे तो तमिलनाडु ने दूसरी औद्योगिक इकाइयों को प्रमोट किया। चेन्नई से चारों दिशाओं में सौ किलोमीटर के दायरे में देशी, विदेशी कंपनियों के अनगिनत प्लांट लगे हैं। उधर केरल ने अपने यहां शिक्षा व स्वास्थ्य की सबसे अच्छी व्यवस्था विकसित की।

दक्षिण में पिछली एक चौथाई सदी में कई शहर बस गए और कई नए शहर बसाए जा रहे हैं। तेलंगाना में रेवंत रेड्डी की सरकार फोर्थ सिटी बसा रही है। हैदराबाद, सिकंदराबाद और साइबराबाद के बाद अब रंगारेड्डी जिले में फ्यूचर सिटी के नाम से चौथा शहर बस रहा है। इसके लिए 50 हजार एकड़ जमीन लेकर शहर विकसित किया जा रहा है। इस फ्यूचर सिटी में एआई सिटी, हेल्थ सिटी, एंटरटेनमेंट डिस्ट्रिक्ट और स्पोर्ट्स हब अलग अलग बनाए जा रहे हैं। शहर का अपना मेट्रो और रैपिड रेल सिस्टम होगा। यह एक ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट है यानी पूरी तरह से नया शहर विकसित किया जा रहा है। इसे नेट जीरो की तर्ज पर बसाया जा रहा है यानी शून्य कार्बन उत्सर्जन होगा। इस पर कई लाख करोड़ रुपए खर्च होंगे और बनने से पहले ही दुनिया की तमाम बड़ी कंपनियों ने वहां लाखों करोड़ के निवेश का समझौता कर लिया है।

इसी तरह आंध्र प्रदेश में नई राजधानी के तौर पर विजयवाड़ा को विकसित किया जा रहा है। मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू को नए शहर विकसित करने का अनुभव है। विजयवाड़ा के साथ साथ वे विशाखापत्तनम को भी नए सिरे से विकसित कर रहे हैं। बंदरगाह के साथ साथ विशाखापत्तनम अब डाटा सेंटर का हब बन रहा है। इसके मुकाबले उत्तर भारत में राज्यों की राजधानियों के आसपास सेटेलाइट शहर बनाने की घोषणाएं हो रही है, जिनका मकसद सिर्फ जमीन के दाम बढ़ाना है। जो नए शहर बसाए गए चाहे वह नोएडा हो या गुरुग्राम उनकी हालत धीरे धीरे नर्क से बदतर होती जा रही है। पानी निकासी जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। बिना किसी योजना के उनके विकास है। सोचें, सेटेलाइट शहर बसाने के लिए उत्कर भारत में पांच सौ और हजार करोड़ रुपए का बजट घोषित होता है। यह वैसे ही जैसे प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने स्मार्ट सिटी की योजना घोषित की थी। इसके तहत एक एक हजार करोड़ रुपए दिए जाने की खबर आई। इतनी रकम में एक या दो अच्छे फ्लाइओवर बन जाएं तो वह बड़ी बात होगी। तभी एक भी शहर स्मार्ट सिटी के तौर पर विकसित नहीं हुआ है।

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