तमिलनाडु में सिने अभिनेता विजय के मुख्यमंत्री बनने को उत्तर भारत में किस तरह समझा गया? ऐसे मानों विजय नाम का चेहरा ऐवें ही है। तमिल लोगों में फिल्मी दुनिया के लोगों के प्रति कैसी दीवानगी! लेकिन मेरा करुणानिधि, एमजीआर, जयललिता की राजनीति, उनके शासन की खबरों और चुनावी रैलियों-प्रचार को देखने के अनुभव का यह निचोड़ है कि तमिल मिजाज भले चटकदार लाल-काले रंग का हो, लेकिन भीड़ अपने भीतर संस्कृति का गर्व लिए होती है। वहां भाषा और पहचान की ढाल में सभ्यता अपने ही रंग में रंगी हुई है। नायकर, पेरियार, करुणानिधि, एमजीआर, जयललिता से लेकर स्टालिन व उनके बेटे उदयनिधि ने सामाजिक आंदोलन (याकि ब्राह्मण विरोधी, मंडलवादी सामाजिक न्याय) और सनातन को चाहे जितनी गालियां दी हों, लेकिन जरा तुलना करें उत्तर भारत के मंडलवादी लालू यादव बनाम तमिलनाडु के करुणानिधि की राजनीति के फर्क पर?
तमिल मानस ने विविधता के भीतर सभी का स्थान बनाए रखा। नायकर-पेरियार के ही आंदोलन की पार्टी की ब्राह्मण मुख्यमंत्री जयललिता ने ‘अम्मा’ के नाते लंबा राज किया! इन सभी नेताओं की मूर्तियां बन गईं, लेकिन एक की भी समाज विभाजक जैसी नहीं।
वही उत्तर भारत, गोबरपट्टी में क्या है? सिर्फ बंटना और बांटना। यह सत्य कटु है। लेकिन सोचें, गांधी से लेकर मोदी के अस्सी सालों पर? क्या उत्तर भारत के ही हिंदू बनाम मुस्लिम से देश विभाजित नहीं हुआ? फिर मंडल, कमंडल से आज समाज ऐसा विभाजित है, जिसकी वोटों की इंजीनियरिंग में शासन, राजनीति और चुनाव सब ठगी से तरबतर!
देश विभाजन के लिए यूनाइटेड प्रोविंस (उत्तर प्रदेश) की हिंदू-मुस्लिम (कांग्रेस बनाम मुस्लिम लीग) राजनीति जिम्मेदार थी तो समाज विभाजन के लिए भी वीपी सिंह के समय का मंडल-कमंडल जिम्मेदार। सोचें, हिंदी राष्ट्रभाषा है लेकिन हिंदी भाषियों में हिंदी न आत्म-सम्मान की रीढ़ है और न संस्कृति की जिद। ऐसे फर्क उत्तर बनाम दक्षिण के साधु-संत, धर्म आचरण, धार्मिक उत्सवों, साफ-सफाई आदि तमाम पहलुओं में प्रकट हैं। उत्तर भारत भीड़, नारे, जुमले, धर्म, तेरे-मेरे, “हम बनाम वे”, भय, भूख, भक्ति के उन भावों में लगातार जीता है, जिसके हर राष्ट्रवादी हुंकारे में दक्षिण भारत की भाषाएं, लोकभावनाएं छिटकती होती हैं।
तमिलनाडु, दक्षिण भारत का राजनीतिक मनोविज्ञान अलग ही है। केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना क्यों कभी संघ-भाजपा परिवार के रंग में घुले-मिले नहीं? क्यों वहां कांग्रेस स्वीकार्य है, भाजपा नहीं? हर प्रदेश क्यों वहां हमेशा अपने बूते, अपनी जमीन बनाने वाला ही मुख्यमंत्री लिए होता है? यह सच्चाई कम्युनिस्ट सीपीएम की केंद्रीकृत कमान का भी इतिहास है। मोटामोटी केरल में नंबूदरीपाद से विजयन तक जितने मुख्यमंत्री हुए, वे ऊपर से नहीं थोपे गए। ऐसे ही कांग्रेस का है। इसलिए कांग्रेस टिकी हुई है। कांग्रेस ने एक ही बार बिना पैंदे के अंजैया को आंध्र प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया था और प्रदेश में ऐसा हल्ला हुआ कि एनटी रामाराव उभरे। प्रदेश राजनीति का रंग ही बदल गया।
विजय इसलिए जीते क्योंकि तमिल मानस (खासकर नौजवान) दशकों पुराने परिवारवादी ढांचे से थक चुका था। उन्हें लगा विजय से “पोस्ट-द्रविड़” क्षण है। विजय ने होशियारी दिखाई जो तमिल पहचान को आक्रामक नारे में नहीं बदला। तमिल पहचान की सहज भावना को मात्र हवा दी। वे मोदी जैसे गरजे नहीं। भीड़ उन्मादी थी लेकिन विजय का अंदाज लगभग फुसफुसाहट का था।
ऐसा रुख केरल में सतीशन का भी था तो तेलंगाना में रेवंत रेड्डी का भी रहा है। आंध्र में चंद्रबाबू का दशकों से चला आ रहा है तो कर्नाटक में सिद्धारमैया, शिवकुमार व भाजपा के इकलौते जमीनी नेता येदियुरप्पा का भी ऐसा ही रहा है।
तभी इन राज्यों में कोई नेता उत्तर भारत की राजनीति, खासकर मोदी-शाह की शैली में फिट नहीं है। सब स्वयंभू हैं। वही उत्तर भारत का सत्य? चाहे जो लुढ़कता या अनाम लोट हो उसे सर्वज्ञ नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री पद पर बैठा देंगे और अमित शाह को रिमोट थमा कर प्रदेश में राज चलवाएंगे।
