जंतर मंतर पर ‘जेन जी’ का आंदोलन हुआ और सरकार बैकफुट पर आई तो उसके बाद आरएसएस में भी इसकी चर्चा शुरू हुई कि आखिर ऐसा क्या हुआ है कि नौजवान इतने नाराज हैं। तब संघ के एक पदाधिकारी ने एक ऐसे बौद्धिक से बात की, जो राइटविंग के हैं लेकिन तार्किक विचार रखते हैं और वास्तविक अर्थों में बौद्धिक हैं। उनसे पूछा गया कि आखिर ऐसा क्या हुआ है कि नई पीढ़ी के युवा इतने नाराज हैं और सार्वजनिक रूप से ऐसी ऐसी बातें कह रहे हैं, जिनके बारे में कभी कल्पना नहीं की गई थी। उनका जवाब था, ‘आपने कॉलेज बरबाद कर दिए, यूनिवर्सिटीज बरबाद कर दी, तकनीकी संस्थान बरबाद कर दिए, लेकिन स्कूल अभी तक बरबाद नहीं कर पाए हैं। स्कूलों को बरबाद कर दीजिए फिर सारी समस्या समाप्त हो जाएगी’।
यह बात उन्होंने तंज के अंदाज में कही। उनका कहना था कि स्कूली शिक्षा का निजीकरण बहुत पहले हो चुका है और अब भी काफी स्कूल हैं, जो बहुत अच्छे हैं। वहां से पढ़ाई करके जो छात्र निकल रहे हैं और कॉलेज पहुंच रहे हैं उनके सामने अचानक शून्य आ जा रहा है। न फैकल्टी अच्छी है, न वाइस चांसलर अच्छे हैं, न रिसर्च की सुविधा अच्छी है, न लाइब्रेरी अच्छी है और किसी तरह से वहां एडजस्ट करें तो परीक्षा की पूरी व्यवस्था प्रदूषित हो गई है। वहां उनके अंदर फ्रस्ट्रेशन बढ़ना शुरू होता है। इसी का प्रकटीकरण जंतर मंतर पर हुआ या सोशल मीडिया में भी ‘जेन जी’ की नाराजगी के रूप में हो रहा है। इसका उपाय यही है कि स्कूली शिक्षा के स्तर पर ही उनकी पढ़ाई लिखाई खराब कर दी जाए तो वे आगे भी शिकायत नहीं करेंगे।
सो प्रधानमंत्री, संघ प्रमुख और केंद्र सरकार के मंत्रियों और राज्यों के नेताओं को पहले तो यह समझना होगा कि छात्र और युवा किस बात से नाराज हैं? वे इस बात से नहीं नाराज हैं कि उनको ठीक तरीके से समझा नहीं जा रहा है। वह समस्या हर पीढ़ी के साथ होती है। वे नाराज इसलिए हैं क्योंकि शिक्षा और परीक्षा दोनों का भट्ठा बैठ गया है। कोई भी परीक्षा बिना त्रुटि के नहीं हो रही है। उनका फ्रस्ट्रेशन इस बात को लेकर है कि नौकिरयों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। वैकेंसी नहीं आ रही है और आ भी रही है तो उसे भरने की प्रक्रिया इतनी लंबी हो जा रही है कि छात्रों की उम्र निकल जा रही है। हर दूसरी या तीसरी परीक्षा के पेपर लीक हो रहे हैं। हर दूसरी या तीसरी परीक्षा में परीक्षा केंद्रों पर सेटिंग हो रही है, ओएमआर शीट में गड़बड़ी हो रही है, उत्तर पुस्तिकों की जांच में धांधली हो रही है और कई जगह तो सीधे नौकरी बेच दी जा रही है। छात्रों की इस बात की नाराजगी है कि न तो शिक्षा का कैलेंडर ठीक से चल रहा है और न परीक्षा का कोई कैलेंडर है। ज्यादातर परीक्षाओं में देरी हो रही है और अभ्यर्थियों की उम्र निकल जा रही है। इस बात को समझने की बजाय हर व्यक्ति उनको ज्ञान देने में लगा है या उनकी भाषा बोल कर उनको खुश करने में लगा है। सिरदर्द के इलाज के लिए सरकार के लोग उंगली पर बैंड एड लगा रहे हैं। मंत्री संसद में खड़े होकर ‘फोमो’, ‘एमआईए’ और ‘डेलुलु’ जैसे शब्द बोल कर समझ रहे हैं कि इससे नौजवान खुश हो जाएंगे और शिक्षा व परीक्षा की गड़बड़ियों को भूल जाएंगे।
संकट शिक्षा और परीक्षा की व्यवस्था में आई गड़बड़ियों का है। इसकी शुरुआत 2014 में उसी दिन हो गई थी, जिस दिन नरेंद्र मोदी की पहली सरकार में स्मृति ईरानी को शिक्षा मंत्री बनाया गया था। सोचें, वे डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी की रिप्लेसमेंट थीं! भाजपा की आखिरी सरकार यानी 1999 से 2004 के बीच वाली अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मुरली मनोहर जोशी शिक्षा मंत्री थे। उसके बाद भाजपा को सरकार बनाने का मौका 2014 में मिला तो स्मृति ईरानी को शिक्षा मंत्री बनाया। इससे शिक्षा के प्रति सरकार की गंभीरता, प्रतिबद्धता का पता चलता है। ध्यान रहे 31 दिसंबर 2012 को ‘जेन जी’ के आखिरी बच्चे का जन्म हुआ था। उसके बाद जन्मे बच्चे ‘जेन अल्फा’ यानी 2014 में बनीं शिक्षा मंत्री के ऊपर ही ‘जेन जी’ का भविष्य संवारने की जिम्मेदारी थी। उनके ऊपर यह जवाबदेही थी कि 1997 से 2012 के बीच जन्मे बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा, अच्छे संस्कार, अच्छे प्रशिक्षण और नौकरी व रोजगार की व्यवस्था करें। क्या स्मृति ईरानी इस काम के लिए उपयुक्त थीं?
उसी दिन पता चल गया कि इस सरकार को शिक्षा के साथ क्या करना है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश की बौद्धिक जमात से नाराज थे। गुजरात में मुख्यमंत्री रहते बौद्धिक जमात ने उनको बहुत निशाना बनाया था। दिल्ली यूनिवर्सिटी से लेकर जेएनयू और देश के दूसरे शिक्षा केंद्रों में बैठे लोग उनके ऊपर हमला थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद उनको इसका बदला लेना था। उन्होंने देश की बौद्धिक जमात को, विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को, महाविद्यालयों के प्राचार्यों को, बड़े शैक्षिक संस्थानों को निदेशकों आदि को अपमानित करना था और इसके लिए ही स्मृति ईरानी के शिक्षा मंत्री बनाया गया। उन्होंने यह जिम्मेदारी बखूबी निभाई। हालांकि यह परंपरा वही पर समाप्त नहीं हो गई। स्मृति ईरानी के बाद प्रकाश जावडेकर, रमेश पोखरियाल निशंक और धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री बनाया गया। सबने मिल कर देश के नामी विश्वविद्यालयों में ऐसे कुलपति नियुक्त किए, जिनका शिक्षा और गुणवत्ता से कोई लेना देना नहीं रहा। आईआईटी, आईआईएम, एम्स जैसे संस्थानों में ऐसे निदेशक नियुक्त किए गए, जिनकी योग्यता ‘भाई साहब’ लोगों की परिक्रमा से ज्यादा कुछ नहीं थी। रिसर्च संस्थानों में ऐसे लोगों को जिम्मेदारी दी गई जिनका शोध कार्य से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं था। बिल्कुल अलग कसौटियों पर लोगों को नियुक्त किया गया। केंद्र से लेकर राज्यों तक में पाठ्यक्रम तैयार करने और नई किताबें लिखने के लिए जो लोग चुने गए उन्हें इस विधा का कोई अंदाजा नहीं था।
