Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

पतंगबाजी का भी पखवाड़ा

अच्छा लगा यह देख जो अहमदाबाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पतंग उड़ाई और जर्मनी के चांसलर फ़्रिड्रिख़ मर्त्ज़ को मजा आया। मोदी राज की विदेश नीति की पहचान है पतंगबाजी। तभी यह जान अच्छा लगा जो भारत को पतंग और धागा बेचने वाले चीन के कम्युनिस्ट नेताओं ने भारत आ कर भाजपा-संघ पदाधिकारियों से बातचीत की। निश्चित ही उन्होंने यह विश्वास दिलाया होगा कि हमारे साथ पतंगबाजी में मजा ही मजा है। हम पतंग भी देंगे, धागा भी देंगे तो डमरू व ढोल भी देंगे। ऐसा ही कुछ एजेंडा जर्मन चांसलर की भारत यात्रा का भी रहा होगा। जर्मनी की कारों का बाजार घट रहा है तो भारत का बाजार खुले यह जर्मनी चाहेगा तो यूरोपीय संघ भी चाहेगा।

तभी आश्चर्य नहीं जो दस दिन बाद आगे 26 जनवरी की परेड में योरोपीय संघ के अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लियेन और यूरोपीय परिषद् के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा मुख्य अतिथि होंगे। संभव है जर्मनी के चासंलर, यूरोपीय संघ के प्रमुखों की यात्रा के बाद अंततः प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) दस्तखत होने के कगार पर पहुंच जाए।

यह होना बडी बात होगी। मेरा मानना रहा कि भारत का असल-टिकाऊ साझा ब्रिटेन, यूरोपीय संघ साथ ही संभव है। इसलिए क्योंकि यूरोप के पास वह ज्ञान-विज्ञान, तकनीक, कौशल, पूंजी और उदारता है, जिससे यदि भारत का बाजार समझदारी दिखाए तो वह कुछ आत्मनिर्भरता साध सकता है जो रूस, चीन, अमेरिका की मदद से संभव नहीं है। चीन का स्वार्थ भारत का बाजार है, सिर्फ बेचना है। अमेरिका की सोच बिना तकनीक ट्रांसफर के भारत को हथियार या परमाणु रिएक्टर बेचने की है। वही रूस की क्षमता, तकनीक, रक्षा उत्पादन यूक्रेन के साथ युद्ध से जाहिर है। उसके चीन से हथियार लेने से लेकर उत्तर कोरिया से सैनिक मंगाने की बातों के बावजूद वह  यूक्रेन को हरा नहीं पाया। जबकि रूस ने जंग शुरू की थी तब भारत के रक्षा-सामरिक विशेषज्ञ दो दिन में कीव पर रूसी कब्जा बनने की पतंग उड़ा रहे थे। कुछ वैसे ही विदेश मंत्री जयशंकर तीन वर्षों से यह पतंगबाजी करते हुए थे कि यूरोप तो ऐवें ही है। अपने ही ख्यालों (माइंडसेट) में खोया हुआ!

बहराहल, पखवाड़े में ग्रीनलैंड पर ट्रंप की नजरों और चाइनीज निर्यात के रिकॉर्ड तोड़ आंकड़े ने यूरोप और भारत को सोचने का अवसर दिया है। इसलिए जर्मनी के चांसलर की भारत यात्रा थी। फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों पहले से ही भारत पक्षधर हैं। भारत को अमेरिकी बाजार का आज विकल्प चाहिए तो यूरोप को भारत का बाजार। इसलिए अहमदाबाद में मोदी-मर्त्ज की पतंगबाजी गुल खिलाए और भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार संधि हो जाए तो वह नए साल की पहली ठोस खबर होगी।

Exit mobile version