पिछले कई दिनों से इस बात की चर्चा है कि सरकार बहुत बड़ा कुछ करने जा रही है। कुछ बहुत बड़ा करने की प्लानिंग हो रही है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल के संसद भवन में जाने की तस्वीरें और वीडियो शेयर करके कहा जा रहा है कि कुछ होने वाला है। संसद भवन के कार्यालय में प्रधानमंत्री की बैठक या केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ गृह सचिव गोविंद मोहन, आईबी के प्रमुख महेश दीक्षित और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल की मीटिंग की चर्चाए है। गुरुवार को हुई सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति यानी सीसीएस की बैठक की भी खूब चर्चा हुई। देर रात तक मीटिंग चली और सोशल मीडिया में यह अटकलें चलती रहीं कि क्या फैसला हो रहा है और क्या बड़ा होने वाला है।
अगले दिन यानी शुक्रवार की सुबह अखबारों में सीसीएस की बैठक की कोई खास रिपोर्टिंग नहीं हुई। लेकिन जो रिपोर्ट आई उसमें बताया गया कि सीसीएस की बैठक में वैश्विक हालात पर विचार हुए। ईंधन सुरक्षा को लेकर चर्चा हुई और साथ ही खाद्यान्न सुरक्षा के बारे में भी बातचीत हुई। सोचें, इसके लिए सीसीएस की बैठक की क्या तुक है? इसके लिए तो आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति यानी सीसीई की बैठक होनी चाहिए थी। सो, यह भी कहा जा रहा है कि सीसीएस की बैठक में असल में जो बातचीत हुई उसकी रिपोर्ट सामने नहीं आई है। राइटविंग के अनेक लोग और पूर्व अधिकारी पूरे भरोसे से बता रहे हैं कि कुछ बहुत बड़ा होने वाला है, जिसकी तैयारी हो रही है।
ध्यान रहे इस सरकार का यह ट्रेड मार्क रहा है कि जब भी वह किसी मामले में घिरती है तो कुछ बड़ा किया जाता है या कुछ भी किया जाता है, जिसे बड़ा कह कर प्रचारित किया जाता है। असल में यह न्यूज साइकल बदलने की कोशिश होती है। इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि न्यूज साइकल बदलने के लिए क्या बड़ा किया जाता है?
आज के संदर्भ में सबसे बड़ा काम करने की बात हो तो कहा जा सकता है कि भारत सरकार के लिए मौका है कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को वापस हासिल कर ले। इस समय पीओके में चुनाव हो रहे हैं और उससे पहले लोगों के प्रदर्शन को दबाने के लिए पाकिस्तान की सरकार दमनकारी रवैया अख्तियार किए हुए है। 40 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है। वहां महंगाई चरम पर है और पाकिस्तान विरोधी भावनाएं प्रबल हैं। अगर भारत सरकार दखल दे तो पीओके को मुक्त करा सकती है। ऐसे ही बलोच लिबरेशन आर्मी ने पाकिस्तानी फौज के खिलाफ निर्णायक जंग छेड़ी है। सरकार को कुछ बड़ा करना है तो वह बलोचिस्तान को आजाद करा सकती है। लेकिन सवाल है कि क्या सरकार पाकिस्तान के मामले में कोई सैन्य दखल देने का फैसला करेगी? इसमें संदेह है क्योंकि पीओके और बलोचिस्तान दोनों में चीन के हित जुड़े हैं।
अगर ये नहीं होगा तो क्या बड़ा हो सकता है? सैन्य कार्रवाई के अलावा कुछ भी बड़ा किया जाता है तो वह कोई ऐसा भावनात्मक ज्वार नहीं पैदा करेगा, जिससे नई पीढ़ी के छात्र और युवा अपनी तकलीफें और अपने आंदोलन की स्मृतियां भूल कर सरकार की जय जयकार करें। सरकार के पास करने को यह भी है कि अमेरिका के साथ जल्दी व्यापार संधि करें। लेकिन उससे कुछ नहीं होगा। यह वास्तविकता है कि भारत एक बाजार है और चीन के ऊपर निर्भर है। अमेरिका के साथ व्यापार करार भारत के व्यापार लाभ को घाटे में बदल सकता है। ऊपर से अमेरिका ने रूस के साथ तेल खरीद पर एक सौ फीसदी टैरिफ लगाने की तैयारी शुरू कर दी है। इसका बिल सीनेट से पास हो गया है। सो, कुछ बड़ा करने की बजाय भारत को अमेरिका से अनुरोध करना पड़ सकता है कि वह रूस से तेल खरीदने दे और टैरिफ न लगाए। ध्यान रहे भारत अभी भारत एलपीजी और एलएनजी की अपनी जरुरत का सबसे बड़ा हिस्सा अमेरिका से आयात कर रहा है। यानी तेल, गैस के लिए अमेरिका और अमेरिका के कब्जे वाले वेनेजुएला पर भारत की निर्भरता बढ़ रही है।
सामरिक और आर्थिक मामलों के अलावा सरकार के पास बड़ा कुछ करने के लिए क्या हो सकता है? एक धार्मिक भावनाओं को उभारने का मुद्दा है और दूसरा युवाओं को लुभाने के लिए उनको भी महिला सम्मान निधि की तर्ज पर कुछ नकद पैसे देने की योजना शुरू हो जाए या सभी युवाओं के लिए नौकरी की घोषणा कर दी जाए। कुछ बड़ा क्या हो सकता है, यह सोचना बडा मुश्किल है। सरकार के माली हालात इतने खराब है कि ऐसा कुछ भी करना देश का सोना भी गिरवी रखवाने वाला होगा। लेकिन हमेशा की तरह सरकार नैरेटिव बनवा रही है कुछ न कुछ तो जरूर होगा।
