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मणिपुर, ठहाके लगाने का विषय!

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विपक्षी पार्टियों की ओर से लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव लाने का एक खास मकसद था। संसद का मानसून सत्र शुरू होने से एक दिन पहले मणिपुर की दो महिलाओं को निर्वस्त्र करके घुमाने और उनके साथ यौन हिंसा किए जाने का एक वीभत्स वीडियो आया था। राज्य में जातीय दंगे तीन मई को शुरू हुए थे और वह घटना चार मई की थी लेकिन वीडियो 19 जुलाई को सामने आया था। यानी घटना के 76 दिन के बाद और उसके एक दिन बाद 20 जुलाई को सत्र शुरू हुआ तो संसद भवन परिसर में मीडिया से औपचारिक मुलाकात में प्रधानमंत्री ने पहली बार मणिपुर पर मुंह खोला था। उससे पहले 76 दिन तक वे खामोश रहे थे। खामोशी टूटी भी तो सिर्फ 36 सेकेंड के लिए। सत्र शुरू होने के बाद पूरा विपक्ष प्रधानमंत्री से बयान देने की मांग करता रहा लेकिन वे संसद में नहीं बोले। इसी वजह से अविश्वास प्रस्ताव लाया गया ताकि प्रधानमंत्री बोलें। इसलिए उनके बोलने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा भी कि मणिपुर की घटना पर प्रधानमंत्री से बुलवाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव की संवैधानिक व्यवस्था का इस्तेमाल करना पड़ा।

सोचें, कैसी पृष्ठभूमि में अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था? मणिपुर में 160 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, सैकड़ों लोग घायल हैं और 60 हजार से ज्यादा लोग राहत शिविरों में रह रहे हैं, महिलाओं के साथ अत्याचार की वीभत्स घटनाएं हुई हैं लेकिन प्रधानमंत्री के लिए अविश्वास प्रस्ताव पर जवाब देना हंसी-ठहाकों का विषय था, विपक्ष का मजाक उड़ाने का विषय था और अपनी राजनीति साधने का विषय था! अपने दो घंटे 13 मिनट के भाषण में पहले 90 मिनट यानी डेढ़ घंटे तक वे मणिपुर पर कुछ बोले ही नहीं। जिस विषय को लेकर अविश्वास प्रस्ताव पेश किया गया था उसी पर नहीं बोले। जब विपक्षी पार्टियों ने इसका विरोध करते हुए वाकआउट किया तब वे दो-तीन मिनट के लिए इस पर बोले। वह भी इस अंदाज में कि वे 50 बार पूर्वोत्तर गए हैं और उनके मंत्री चार सौ बार गए हैं। उन्होंने मणिपुर की हिंसा का दोष भी कांग्रेस के ऊपर डाल दिया।

मणिपुर का मसला दुख और चिंता का है। महिलाओं के प्रति सहानुभूति का है और उनको साहस दिलाने का है। लेकिन ऐसे मुद्दे पर भी लगभग पूरे समय या तो विपक्ष के ऊपर हमला होता रहा या हंसी-मजाक चलता रहा। प्रधानमंत्री मजाक सुनाते रहे और उनकी पार्टी के सांसद ठहाके लगाते रहे। मेज थपथपाते रहे। ऐसा लग रहा था, जैसे चुनावी रैली चल रही हो और जश्न का माहौल हो। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा था कि इस बार वे दिमाग से नहीं, दिल से बोलेंगे तो प्रधानमंत्री ने इसका भी मजाक उड़ाया। उन्होंने कहा कि आपके दिमाग का हाल तो देश पहले से जानता था अब दिल का हाल भी जान गया। इस पर भाजपा सांसदो ने जैसा ठहाका लगाया वह हैरान करने वाला था। किसी ने यह नहीं सोचा कि मणिपुर का मसला दिल दहलाने वाला ही है और राहुल गांधी वहां से होकर आए हैं। वे दिल के लिए वहां गए थे और राहत शिविरों में जाकर लोगों का हाल देखा था।

इसी तरह से प्रधानमंत्री ने लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अविश्वास प्रस्ताव पर कांग्रेस ने सदन के अपने नेता को बोलने नहीं दिया। स्पीकर की ओर इशारा करते हुए मोदी ने कहा कि आपने उदारता दिखाते हुए समय नहीं होने के बावजूद उनको बोलने दिया लेकिन गुड़ का गोबर कैसे करते हैं इसमें वे माहिर हैं। उनकी इस बात पर भी उनकी पार्टी के सांसदों ने खूब ठहाके लगाए और मेज थपथपाई। ऐसा लग रहा था, जैसे किसी स्टैंड अप कॉमेडी शो में पंच लाइन बोली जा रही है और बैकग्राउंड से रिकॉर्डेड ठहाकों की आवाज आ रही है। सोचें, भाजपा के सबसे वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी आदि को भाजपा ने बोलने का मौका नहीं दिया लेकिन प्रधानमंत्री इस बात का मजाक उड़ा रहे थे कि कांग्रेस ने अधीर रंजन को नहीं बोलने दिया। मणिपुर से भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टी के दो सांसद हैं और उनको भी नहीं बोलने दिया गया। बहरहाल, प्रधानमंत्री ने कहा कि विपक्ष ने 2018 में अविश्वास  प्रस्ताव पेश किया था और फिर 2023 में पेश किया। वे 2028 में भी अविश्वास प्रस्ताव पेश करेंगे और तब तक देश दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला बना होगा। उनके इस आशावाद पर भाजपा और एनडीए के सांसद ऐसे किलकारी मार रहे थे, जैसे छोटे बच्चे को चांद मिल गया हो।

एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रधानमंत्री ने अविश्वास प्रस्ताव पर किसी भी दूसरे प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए भाषण का रिकॉर्ड तोड़ दिया। इससे पहले लाल बहादुर शास्त्री ने दो घंटे 12 मिनट का भाषण दिया था, जबकि मोदी का भाषण एक मिनट ज्यादा का रहा। इस रिकार्ड तोड़ भाषण में मणिपुर की चिंता और वहां के लोगों के प्रति हमदर्दी का भाव नहीं दिखा। बल्कि अपनी पार्टी के पूर्ण बहुमत से सरकार में होने का अहंकार झलक रहा था और विपक्ष के प्रति हिकारत का भाव दिख रहा था। पूरा भाषण विपक्ष को और उसके नेताओं को नीचा दिखाने और अपने को सर्वश्रेष्ठ साबित करने का था। मणिपुर में सरकार की नाकामी को स्वीकार करने, शांति बहाली का रास्ता दिखाने और वहां के लोगों को भरोसा दिलाने की बजाय पूरा भाषण अपनी सरकार की झूठी-सच्ची उपलब्धियों के बखान वाला रहा। लगातार नौ साल राज करने वाले प्रधानमंत्री से जिस तरह की जवाबदेही वाले भाषण की उम्मीद की जा रही थी उसकी बजाय पूरा भाषण पिछली सरकारों पर दोष मंढ़ने वाला था।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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