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गपशप

सबके अपने अपने राम-सीता

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ऐसा नहीं है कि भगवान राम की भक्ति में सिर्फ भाजपा और नरेंद्र मोदी जुटे हैं। सभी पार्टियां किसी न किसी रूप में अपना हिंदुत्व और अपनी धार्मिकता को दिखाने में लगी हैं। सिर्फ कांग्रेस है, जो शंकराचार्यों के सहारे राजनीति कर रही है। यह कैसी दयनीय स्थिति है कि कांग्रेस के नेता बात बात में शंकराचार्यों का उद्धरण दे रहे हैं और कह रहे हैं कि शंकराचार्य अयोध्या नहीं जा रहे हैं। कांग्रेस के नेता इस भ्रम में हैं कि हिंदुओं के शंकराचार्य इसाइयों के पोप की तरह हैं। जबकि हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। भारत में हजारों मत हैं, जिनमें से एक अद्वैत मत का प्रतिनिधित्व शंकराचार्य करते हैं और उस मत को मानने वाली आबादी एक फीसदी भी नहीं होगी और उसमें भी अलग अलग धर्माचार्यों का अद्वैत मत अलग अलग है। भारत के 95 फीसदी से ज्यादा हिंदू द्वैत मत को मानते हैं। तभी इस देश में गिने-चुने लोग होंगे, जिनको शंकराचार्यों का नाम भी पता होगा। भारत में हर गांव, कस्बे में लोगों के अपने देवता हैं, जिनकी वे पूजा करते हैं। उनको पूजा पाठ में शंकराचार्य की जरुरत नहीं होती है। तीसरे, शास्त्रसम्मत काम तो हिंदू धर्म में बहुत कम होते हैं क्योंकि शास्त्रों की बहुत सी बातें समय के साथ पुरानी और मौजूदा समय की मान्यताओं के हिसाब से बेकार हो चुकी हैं। कुछ समय पहले शास्त्र और सुप्रीम कोर्ट में एक और विवाद हुआ था, जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित होगा। तब शास्त्रों के आधार पर तमाम धर्माचार्यों ने इसका विरोध किया था। उस समय कांग्रेस भी धर्माचार्यों और शास्त्रों के विरोध में खड़ी थी और आज प्राण प्रतिष्ठा के समय शास्त्र की बात कर रही है।

बहरहाल, कांग्रेस, सीपीएम और डीएमके जैसी कुछ पार्टियों को छोड़ दें तो ज्यादातर पार्टियों ने अपने अपने राम-सीता खोज लिए हैं। ममता बनर्जी 22 जनवरी को काली घाट मंदिर में जाएंगी और मां काली की पूजा करेंगी। इसके बाद वे एक सर्व धर्म रैली भी करेंगी। ध्यान रहे पिछले विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने जय श्रीराम के नारे के बरक्स मां काली की पूजा का अभियान चलाया था। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के चंपत राय ने पिछले दिनों कहा था कि राममंदिर रामानुज संप्रदाय का है शिव, शाक्त या संन्यासियों का नहीं है। इस बात को ममता भुना सकती हैं क्योंकि बंगाल में शाक्त संप्रदाय का असर है और लोग देवी की पूजा करते हैं।

इसी तरह शिव सेना के नेता उद्धव ठाकरे नासिक के कालाराम मंदिर में पूजा करेंगे। ऐसी मान्यता है कि वनवास के समय भगवान राम नासिक में उसी जगह पर ठहरे थे। वे अपनी पार्टी के तमाम नेताओं को लेकर 22 जनवरी को नासिक जाएंगे। अरविंद केजरीवाल ने पिछले मंगलवार को पूरी दिल्ली में सुंदरकांड का पाठ कराया। वे अपने को हनुमान भक्त बताते हैं। उन्होंने खुद रोहिणी के एक मंदिर में अपनी पत्नी के साथ सुंदरकांड का पाठ किया। उनकी पार्टी ने तय किया है कि हर महीने के पहले मंगलवार को दिल्ली में सुंदरकांड का पाठ होगा। 22 जनवरी को वे अयोध्या नहीं जा रहे हैं लेकिन उन्होंने कहा है कि वे बाद में अपने माता-पिता को लेकर पूरे परिवार के साथ अयोध्या जाएंगे। यही बात अखिलेश यादव ने भी कही है। उधर बिहार में सीतामढ़ी में सीता जी की जन्मस्थली को विकसित करने का काम बिहार सरकार करा रही है। जदयू नेता और नीतीश सरकार के मंत्री अशोक चौधरी ने राम भजन करते हुए दावा किया कि नीतीश सरकार माता सीता की जन्मस्थली का विकास करवा रही है। कांग्रेस के कुछ नेता निजी हैसियत से 22 जनवरी को अयोध्या जाएंगे। उधर कर्नाटक में कांग्रेस के उप मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने सभी मंदिरों में विशेष पूजा अर्चना का आदेश दिया है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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