यह सवाल इसलिए है क्योंकि भाजपा सरकार ने विश्व विद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी से ऐसा नया नियम जारी कराया, जिससे देश के करीब ढाई हजार उच्च शिक्षा संस्थानों की तस्वीर बदल जाती। यह कहना अतिरंजित लग सकता है लेकिन इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि अगर यूजीसी के नियम उसी रूप में लागू होते, जिस रूप में उनको जारी किया गया था तो देश के उच्च शिक्षण संस्थान नब्बे के दशक का बिहार और उत्तर प्रदेश बन सकते थे। लालू यादव की पार्टी की एक प्रवक्ता ने इसका इशारा भी किया था। जब इन नियमों के हवाले उससे पूछा गया कि इसके जरिए तो अगड़ी जाति के छात्रों और शिक्षकों को फंसाया जा सकता है तो उसने दो टूक अंदाज में कहा कि इनको फंसाया जाना चाहिए क्योंकि ये 90 फीसदी बहुजन के अधिकार को स्वीकार नहीं करते हैं। फिर उसने हजारों साल के दमन, अत्याचार वगैरह की बातें भी कहीं। सुप्रीम कोर्ट ने जब यूजीसी के नियमों पर रोक लगाई तो सुनवाई के दौरान लालू यादव की पार्टी की प्रवक्ता के उस बयान का भी जिक्र एक वकील ने किया था।
पहले कानून के हिसाब से देखें तो भारत में माना जाता है कि हर अच्छे कानून का दुरुपयोग हो सकता है। लोग उसमें लूप होल्स निकाल ही लेते हैं। लेकिन जब कानून ही खराब हो तो क्या होगा? तब तो उस कानून के दुरुपयोग की जरुरत नहीं है। फिर तो उसके सदुपयोग से भी लोगों को फंसाया जा सकता है या किसी को बचाया जा सकता है। यूजीसी ने जो नए नियम जारी किए थे वो नियम इस दूसरी श्रेणी में आते हैं। वे इतने खराब हैं कि उनके दुरुपयोग की जरुरत नहीं है। उनके सदुपयोग से भी देश के एक छोटे से जातीय समूह के छात्रों और शिक्षकों को फंसाया जा सकता है और उनके करियर पर ग्रहण लगाया जा सकता है।
ध्यान रहे शिक्षण संस्थानों में किसी तरह का भेदभाव रोकने के नियम पहले से बने थे। यूपीए सरकार के समय यूजीसी ने 2012 में नियम बनाए थे, जिनमें सभी छात्रों के साथ भेदभाव रोकने के प्रावधान किए गए थे। लेकिन 2026 में नरेंद्र मोदी की सरकार के समय जो नियम जारी किए गए उसमें कई चीजें बदल दी गईं। पहले नियम में सिर्फ भेदभाव की बात कही गई थी, जबकि नए नियमों में जाति आधारित भेदभाव की बात जोड़ दी गई और सामान्य वर्ग को छोड़ कर बाकी सबको भेदभाव के संभावित शिकार के तौर पर परिभाषित किया गया। इसी तरह पुराने नियम में गलत शिकायत करने वाले के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान था, जिसे नए नियमों में हटा दिया गया।
इस तरह गलत शिकायत करके किसी को फंसाने का लाइसेंस दिया गया। पुराने नियम में शिकायत सुनने वाली कमेटी में सभी वर्गों के सदस्य रखने का प्रावधान था, जबकि नए नियम में एससी, एसटी, ओबीसी सदस्य रखने को अनिवार्य किया गया और सामान्य वर्ग का सदस्य रखने की अनिवार्यता नहीं रखी गई। नए नियम में भी रैगिंग को शामिल नहीं किया गया, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि अगर रैगिंग का शिकार सामान्य वर्ग का कोई लड़का शिकायत करे तो क्या उसके ऊपर भी भेदभाव की कार्रवाई हो सकती है।
सवाल है कि क्या यूजीसी ने बिना सोचे समझे ये नियम जारी कर दिए या कोई ऐसा बैठा है, जिसके मन में सामान्य वर्ग के प्रति पूर्वाग्रह है और उसने सबक सिखाने के लिए इस तरह के नियम बनाए या सोच समझ कर राजनीतिक योजना के तौर पर ये नियम बनाए गए ताकि राहुल गांधी और दूसरे विपक्षी नेताओं के हाथ से बहुजन राजनीति का कार्ड छीना जा सके? ध्यान रहे लोकसभा चुनाव 2024 के बाद से नरेंद्र मोदी और उनकी टीम बहुत सावधान हो गई है। उससे पहले भाजपा अपने को अजेय मान रही थी और लग रहा था कि कांग्रेस या उसके नेतृत्व में एकजुट विपक्ष भी कभी उसको नहीं हरा पाएगा। लेकिन संविधान बचाओ, आरक्षण बचाओ, आरक्षण बढ़ाओ, जाति गणना कराओ आदि के नारे पर विपक्ष ने भाजपा की हवा निकाल दिया। लोकसभा चुनाव में चार सौ सीट हासिल करने के लक्ष्य को पंक्चर किया। ‘जितनी आबादी उतना हक’ का राहुल गांधी का नारा हिट हुआ। तभी पिछड़ा, दलित और आदिवासी की ओर ध्यान गया। पहले नरेंद्र मोदी जिस तरह ‘मुफ्त की रेवड़ी’ से घबराए उसी तरह जाति वाले दांव से घबराए हुए हैं।
ध्यान रहे नरेंद्र मोदी ने ही ‘मुफ्त की रेवड़ी’ का जुमला बोला था।
उन्होंने कहा था कि इससे देश की अर्थव्यवस्था रसातल में चली जाएगी। लेकिन जब लगा कि ‘मुफ्त की रेवड़ी’ का दांव विपक्ष के लिए काम कर रहा है। कांग्रेस कर्नाटक जीत गई औऱ अरविंद केजरीवाल दिल्ली में नहीं हार रहे हैं। तो उन्होंने भी सबको खजाना खोलने की इजाजत दी। मध्य प्रदेश की लाड़ली बहना योजना को देश भर में भाजपा ने भी आजमाया। उसी तरह बिहार में जाति गणना हुई और राहुल ने कर्नाटक, तेलंगाना में इसकी घोषणा की तो प्रधानमंत्री ने भी आगे बढ़ कर जाति जनगणना कराने का ऐलान कर दिया। अगले साल जनगणना होगी, जिसमें 1931 के बाद पहली बार देश भर की जातियों की गिनती होगी। तो क्या अब बाजी पलट गई है? अब विपक्ष एजेंडा सेट कर रहा है और भाजपा व उसकी सरकार उस पर प्रतिक्रिया दे रही है?
ऐसा लग रहा है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव रोकने के नाम पर जो नियम घोषित किए गए थे वो जाति गणना से आने वाले आंकड़ों को ध्यान में रख कर किए गए थे। पहले से ही सरकार और भाजपा ने तैयारी शुरू कर दी है। बहुजन को साधने का प्रयास चल रहा है। उनको मैसेज दिया जा रहा है कि देखो भाजपा और नरेंद्र मोदी तुम्हारे लिए अपने सबसे मजबूत सवर्ण समर्थकों को भी नाराज करने का जोखिम लेने को तैयार हैं। उत्तर प्रदेश में वाराणसी और इलाहाबाद में जिस तरह के प्रदर्शन हुए, प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीरों पर लोगों ने जूते चलाए और आग लगाई, मोदी-योगी मुर्दाबाद के नारे लगे उन तस्वीरों ने निश्चित रूप से पिछड़े, दलितों में मोदी के प्रति सहानुभूति जगाई होगी।
आगे पता नहीं क्या होगा लेकिन अगड़ी जातियों ने जिस तरह का उबाल दिखाया और जितनी हिंसक प्रतिक्रिया दी उसका राजनीतिक असर निश्चित रूप से हुआ होगा। मन ही मन पिछडी जातियों ने गांठ बांधी होगी। यह भी ध्यान रखने की बात है कि भाजपा के किसी नेता ने इस नियम के खिलाफ बयान नहीं दिया। कई सवर्ण नेता भी इसे डिफेंड करते रहे। यह अहसान बताते रहे कि मोदी ने अगड़ी जातियों को ईडब्लुएस के तहत 10 फीसदी आरक्षण दिया है। तभी सवाल है कि व्यापक हिंदू समाज की एकता बनाने की बात करने वाली भाजपा और आरएसएस की यह कैसी सोच है? एक तरह ‘बंटोगे तो कटोगे’ के नारे हैं और दूसरी ओर हिंदू समाज को ही अगड़ा और पिछड़ा में बांटने की राजनीति हो रही है। यही काम तो नब्बे के दशक में वीपी सिंह करके गए थे। तब भी अगड़ी जातियों ने ऐसे ही प्रदर्शन किए थे, जिसका लाभ आज तक मंडल की पार्टियों को मिल रहा है। क्या नरेंद्र मोदी मंडल की पार्टियों से उनका राजनीतिक दांव छीन रहे हैं? हो सकता है क्योंकि उनके समर्थक भी कहते हैं कि उन्होंने मंडल और कमंडल को मिला दिया है। वाजपेयी, आडवाणी, जोशी के समय दोनों अलग थे लेकिन अब कमंडल ही मंडल हो गया है। लेकिन बड़ा सवाल यह है अगड़ी जाति के अपने वोकल समर्थकों को नाराज कर भाजपा पहले से विभाजित पिछड़े, दलित और आदिवासी वोट के सहारे चुनाव जीत पाएगी? ध्यान रहे राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा ने पहले ही 15 फीसदी मुसलमानों, करीब चार फीसदी ईसाई और दो फीसदी सिख यानी 21 फीसदी अल्पसंख्यकों को अपने से अलग कर दिया है। अब 15 फीसदी ही सही लेकिन अगड़े भी अलग होते हैं या उनका मोहभंग होता है तो क्या भाजपा को इसका नुकसान नहीं होगा?
