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पुतिन का कहा झुग्गी-झोपड़ी में भी!

Kazan [Russia], Oct 23 (ANI): Russian President Vladimir Putin addresses the Plenary Session of the BRICS Summit, at Kazan Expo Center, in Kazan on Wednesday. (ANI Photo)

गुरुवार को रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने खाड़ी युद्ध को कोविड से बड़ा संकट बताया। वही बात कोई पंद्रह दिन से घरेलू काम करने वाली महिलाएं कह रही हैं। ये कामवालियां कोविड जैसे लॉकडाउन की चिंता में हैं। अपने गांव लौट रही हैं। झुग्गी झोपड़ियों में यह चिंता आम है कि भले लॉकडाउन न हो, लेकिन गैस सिलेंडर, पेट्रोल-डीजल नहीं होगा तो कैसे खाना पकाएंगे और फिर तब कैसे घर लौटेंगें?

पुतिन ने कहा है, युद्ध से कोविड महामारी जैसे हालात इसलिए संभव है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स, उत्पादन और सप्लाई चेन पर गहरा असर पड़ रहा है। पुतिन ने अपने अनुभव से बोला होगा। उनका अनुभव सौ टका ठोस है। इसलिए क्योंकि दुनिया भर के देश उनके सामने आज कतार में हैं। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सरकारें तेल, गैस सप्लाई के लिए गिड़गिड़ा रही होंगी। सो, उन्हें साफ लग रहा है कि आगे कैसे हालात होने हैं। ऐसे ही घर छोड़कर महानगरों की झुग्गी-झोपड़ियों में रह रहे लोग खाना पकाने से लेकर आवाजाही की लॉजिस्टिक्स, सप्लाई चेन से सवाल करते हुए हैं, क्या लॉकडाउन होगा? हमने तो टिकट (रेल) बुक करा लिया है!

जाहिर है लोगों को कोविड की पैदल यात्रा याद हो आई है! कोविड के समय वायरस का डर था, पर अब तो सुबह-शाम की रोटी के गैस सिलेंडर का सवाल है। रात से ही लाइन में लगे रहने की भीड़ है। छोटे सिलेंडर में परचून गैस भराई के मनमाने रेट हैं। रूस ने यदि मनमानी रेट पर तेल बेचा है या बेचे तो प्रभाव अपने आप वैश्विक होगा (याद करें पिछले बारह वर्षों में मोदी सरकार ने कितनी महंगी रेट पर लोगों को पेट्रोल-डीजल बेचा?)। सो, रूस, भारत सरकार सब मनमानी रेट से अर्थिकी की ऊर्जा आवश्यकता को महंगा बनाने पर आमादा है तो परचून गैस भराई का व्यापारी भला क्यों चूके?

इसलिए विश्व व्यापार संगठन का यह कहना भी गंभीर है कि दुनिया 80 साल के सबसे बड़े व्यापार संकट से गुजर रही है! यदि ऐसा है तो पहले जो कोविड संकट सबसे बड़ा समझ आता था, वह सिर्फ ट्रेलर था, मगर असल फिल्म तो अब दिखेगी?

कोविड में दुनिया रुकी थी। इस बार दुनिया चल रही है, लेकिन लड़खड़ाते हुए। तब वायरस दिखता नहीं था, पर दुश्मन साफ था। आज युद्ध है और उससे अर्थव्यवस्थाओं की नसें तीन सप्ताह में ही दब गई हैं। आर्थिकियों को लकवा मार रहा है।

और सोचें, ऐसे में भारत के प्रधानमंत्री क्या कह रहे हैं? मैं हूं न! और मैं हूं तो चिंता की बात ही नहीं। पहले भी संकट आए थे, पर मैंने बेड़ा पार लगाया। ट्रंप, पुतिन, ईरान, खाड़ी के सभी नेता मेरे चेले! सखा और दोस्त इसलिए नहीं क्योंकि पहली बात, भारत रंग बदलता रहता है। दूसरी बात वह वैसे दलाली नहीं करता है, जैसे पाकिस्तान, उसका फील्ड मार्शल मुनीर करता है, आदि-आदि।

इसलिए प्रधानमंत्री आत्मविश्वास से संसद में भाषण दे रहे हैं। अपने घर कैबिनेट की बैठक कर रहे हैं। सर्वदलीय बैठक की है। मुख्यमंत्रियों को समझाया है। ट्रंप-पुतिन-नेतन्याहू से लेकर ईरान के नेताओं सबको फोन कर रहे हैं। उनकी इस जादुई मेहनत का नैरेटिव भी लगातार लाइव, चौबीसों घंटे। यही भारत का संकटमोचन है। जबकि ठीक विपरीत पाकिस्तान से लेकर फिलीपींस, यूरोपीय देश, जापान आदि क्या कर रहे हैं? वे जनता से कह रहे हैं संकट गंभीर है। हमारा इतने दिनों का रिजर्व है। उसे रिलीज कर रहे हैं या खपत घटाने के लिए इमरजेंसी है। स्कूल बंद रहेंगे। घर से काम होगा। पता है दिवालिया पाकिस्तान ने क्या किया? उसने खर्चों, खपत में ढेरों फैसले किए। चौंकाने वाला फैसला यह भी था कि केंद्र सरकार के कर्मचारियों के वेतन में इतनी-इतनी कटौती होगी! जापान से लेकर यूरोपीय देशों ने रिजर्व तेल-गैस भंडार की डिटेल, जानकारी बताते हुए नागरिकों को वास्तविक सूचना दी। ईमानदारी से अपनी व्यवस्था-तैयारी बताई।

भारत में? सब चंगा सी! कैसी गजब बात है कि जिस रूस को संकट से सर्वाधिक फायदा, कमाई है, उसके राष्ट्रपति कह रहे हैं कि कोविड से यह बड़ा संकट है वही 140 करोड़ लोगों की भीड़ को मोदीजी का मैसेज है, देखो, देखो बंदरगाह पर जहाज तेल, गैस लेकर पहुंचे। वही असल खबर सर्वत्र भीड़ लाइन में है। लॉकडाउन या चूल्हाडाउन की चिंता में घर लौटने की तैयारी है!

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