Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

ट्रंप (अमेरिका) अब मजाक हैं!

कोई महाशक्ति कैसे मात्र एक नेता से अपने को गंवा बैठती है, अपनी हैसियत-पहचान का फलूदा बना देती है, इसके इन दिनों ढेरों प्रमाण हैं। अमेरिका ढाई सौ साल का होने वाला है। पर देश अपने उस राष्ट्रपति के 80वें जन्मदिन के तमाशों में है, जिसने छह वर्षों में अमेरिका को फूंका कारतूस बना डाला। अमेरिका और ट्रंप की इस मजबूरी पर सोचें कि वह ईरान को मनाने के लिए पाकिस्तान पर निर्भर है। सभी अब ट्रंप के अमेरिका की हैसियत समझ रहे हैं। इजराइल, इस्लामी देश याकि ईरान, कतर, पाकिस्तान, रूस, चीन सभी की निगाहों में अमेरिका मानों थोथा चना बाजे घना। अमेरिका इतना असहाय पहले कब था जो सैनिक मिशन ईरान को खत्म करने का था और अब उसी से समझौते के लिए ट्रंप मरे जा रहे हैं।

सोचें, ट्रंप ने कितनी बार कहा है कि अमेरिकी सेना ने ईरान का सब कुछ खत्म कर दिया। फिर कितनी बार बोला कि ईरान से समझौता बस होने को है। दो दिन पहले ईरान ने खबर उड़ाई कि समझौता होने के कगार पर। ट्रंप हड़बड़ा गए। जवाब था बकवास है, ईरान ने मसौदा जरूर भेजा है पर मैंने  फैसला नहीं किया! उसी दिन फिर ट्रंप ने ईरान के पड़ोसी ओमान को खत्म करने की धमकी दी! इसलिए क्योंकि ईरान-ओमान दोनों होमुर्ज की खाड़ी में टोल वसूली का तानाबाना बुन रहे हैं।

ईरान के ऐसे साहस के गहरे अर्थ हैं। इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने ट्रंप से ईरान पर हमला करवाया। और अब ट्रंप पाकिस्तान के जनरल मुनीर की कूटनीति के झांसे में हैं। पाकिस्तान ने चालाक लोमड़ी की तरह अरब-खाड़ी देशों के इस्लामी देशों और चीन से अपनी ऐसी पंचायत बनाई है कि पश्चिम एशिया से अमेरिका के आउट होने और उसकी जगह पाकिस्तान की सैन्य उपस्थिति के अवसर बन गए हैं। इस कूटनीति को ईरान के सर्वोच्च नेता मोज्तबा खामेनेई ने भी जाहिर किया है। उन्होंने कहा है कि पश्चिम एशिया की ताकतें अब अमेरिकी सैन्य ठिकानों के लिए ढाल नहीं बनेंगी। इस क्षेत्र में अमेरिका के पास सुरक्षित ठिकाना नहीं रहेगा।

क्या अर्थ है? कतर, बहरीन, सऊदी अरब, ओमान, कुवैत, इराक सभी इस्लामी देश मानने लगे हैं कि अमेरिका न काम का न काज का। इसलिए क्योंकि न वह ईरान के घुटने टिका सका और न उसके मिसाइल, ड्रोन हमलों से इन देशों को बचा सका। उलटे अमेरिकी सैन्य अड्‍डों के होने से ईरान ने उन पर भी हमला किया। इलाके के मुसलमानों में ईरान का समर्थन दिखा। इसलिए अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बनाए रखना जोखिम है न कि सुरक्षा की गारंटी। ऐसे में अरब-खाड़ी के इस्लामी देशों को किसकी जरूरत है? इस्लामी सैन्य महाशक्ति पाकिस्तान की है, व्यापार और कमाई वाले चीन की है। गाजा, लेबनान में इजराइल के तांडव के आगे ईरान की भी है।

इस तरह सामरिक, रणनीतिक, कूटनीतिक आदि के कामों में कभी वॉशिंगटन विश्व गुरू था। तभी उसकी वैश्विक चौधराहट थी। विश्व व्यवस्था में स्थिरता थी, संतुलन था। लेकिन सिर्फ और सिर्फ पैसे के लोभी तथा प्रॉपर्टी डीलर की तासीर में रंगे हुए ट्रंप ने, अपने आपको ईसा का अवतार जतलाते हुए अमेरिकियों को ऐसा मूर्ख बनाया जो अमेरिकी दिमाग भी कॉकरोच की दशा की और है। बुद्धि हाशिए में और झूठ का बोलबाला। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय, पेंटागन हो या विदेश-वाणिज्य-वित्त संबंधी मंत्रालय और उसके तमाम दिमागी थिंक टैंक सभी की सांसें वैसी ही खोखली हैं, जैसे बारह वर्षों से भारत में है।

सोचें, कभी जी-7 देशों, यूरोपीय नेताओं के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति का विचार-विमर्श व साझा था। अब ट्रंप पाकिस्तानी नेताओं, कतर, सऊदी अरब, बहरीन के शेखों, इजराइल के नेतन्याहू या पुतिन, शी जिनपिंग से चोंच लड़ाते हैं। गुजरे सप्ताह गजब हुआ जो नेतन्याहू के प्रभाव में ट्रंप ने मुस्लिम नेताओं से बात की। तुर्किए के राष्ट्रपति एर्दोआन, सउदी अरब, यूएई, मिस्र और पाकिस्तान, शेखों, प्रधानमंत्रियों, राष्ट्रपति से बात कर उन्होंने कहा इस्लामी देशों को अब्राहम अकॉर्ड्स मानते हुए इजराइल से कूटनीतिक रिश्ते बना कर दोस्ती करनी चाहिए। तभी शांति होगी। एक तरफ दुनिया का हर मुसलमान गाजा, लेबनान, ईरान में इजराइल-अमेरिका के हमलों के विध्वंस का लाइव साक्षी है वही ट्रंप की ऐसी खामोख्याली।

पाकिस्तान ने ट्रंप को तुरंत हैसियत दिखाई। उसके रक्षा मंत्री याकि जनरल मुनीर के बॉस ख्वाजा आसिफ ने कहा पाकिस्तान अपनी मौलिक विचारधाराओं से कतई समझौता नहीं कर सकता। ‘हम उन लोगों के साथ कैसे बैठ सकते हैं, जिनकी बात पर एक दिन के लिए भी भरोसा नहीं किया जा सकता’। बावजूद इसके वही ट्रंप प्रशासन उम्मीद में है कि पाकिस्तान जैसे-तैसे ईरान से सौदा पटाए। ऐसे अमेरिका की क्या कभी किसी ने कल्पना की?

Exit mobile version