जब से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं तब से उन्होंने स्वंय, उनकी पार्टी के नेताओं और संघ के पदाधिकारियों ने सैकड़ों बार जनता को उसके कर्तव्यों की याद दिलाई है। बार बार कहा है कि नागरिकों को अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए। यह भी कहा गया कि देश में लोग अधिकार की बात तो करते हैं लेकिन कर्तव्य की बात नहीं करते हैं। दावा किया गया कि अगर नागरिक अपने कर्तव्यों का निर्वहन ठीक ढंग से करेंगे तभी भारत विकास करेगा। अच्छी बात है कि नागरिकों को अपने कर्तव्य निभाने चाहिए। उसे समय पर टैक्स भरना चाहिए। उसे अपने आसपास सफाई रखनी चाहिए। उसे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले काम नहीं करने चाहिए। उसे ईमानदार होना चाहिए। आदि आदि।
सवाल है सरकार का क्या दायित्व है? नागरिक क्यों सरकार चुनते हैं? इसलिए क्योंकि जो काम वे खुद नहीं कर सकते हैं उन कार्यों को जिम्मेदारी और ईमानदारी के साथ करने के लिए सरकार चुनी जाती है। लोग अपने अधिकार का समर्पण करते हैं और अपनी कमाई के पैसे सरकार चलाने के लिए देते हैं। लेकिन बदले में उन्हें क्या मिलता है? नेताओं का भाषण! सरकार उलटे नागरिकों से ही उम्मीद लगाए बैठी हैं कि वे सब काम करेंगे और सरकार में बैठे हुए लोग राज करेंगे।
अब भारत में किसी चीज के लिए सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं है। सरकार का काम सिर्फ इतना दिख रहा है कि वह लोगों से टैक्स वसूले और सरकार में शामिल लोगों के वेतन, भत्ते, पेंशन आदि की व्यवस्था करे। सरकार चलाने में होने वाली हर गड़बड़ी को इस तर्क से ढका जाता है कि इतना बड़ा देश है, इतनी बड़ी व्यवस्था है, इतनी आबादी है तो थोड़ी बहुत गड़बड़ तो होगी ही।
सोचें, इस तर्क पर। यह कितना अवैज्ञानिक और सुविधाजनक तर्क है। क्या व्यवस्था इस तरह से काम करती है? अगर किसी काम के लिए कोई नियम बना है, कोई व्यवस्था बनी है तो वह ठीक तरीके से काम करनी चाहिए और अगर काम ठीक से नहीं हो रहा है तो उसे करने वाले लोगों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। लेकिन इतने बड़े देश का तर्क दिया जाता है इसका मतलब ही है कि सब कुछ संयोगों के सहारे चल रहा है। इतना बड़ा देश कोई आदमी कैसे चला सकता है।
मतलब भगवान ही इस देश को चला रहे हैं। तब भगवान को कोई कैसे जिम्मेदार ठहरा सकता है? हां, भारत अब राज्य की उत्पत्ति के दैवीय सिद्धांत के आधार पर संचालित हो रहा है। राज्य की उत्पत्ति का दैवी सिद्धांत कहता है कि राजा अगर अच्छा है तो इसका मतलब है कि ईश्वर प्रजा से खुश हैं और उन्होंने अच्छा राजा दिया है। राजा अगर बुरा है तो इसका मतलब है कि ईश्वर प्रजा को दंड देना चाहते हैं इसलिए उन्होंने बुरा राजा दिया। सो, जैसा राजा मिला है उसे ईश्वर की मर्जी मान कर स्वीकार करें।
