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ट्रंप के आगे मोदी क्यों फेल?

टैरिफ

गौर करें नेहरू से ले कर डॉ. मनमोहन सिंह बनाम नरेंद्र मोदी की कूटनीति के फर्क पर? नेहरू से मनमोहन सिंह तक भारत का एक भी प्रधानमंत्री दुनिया के देशों से अपने लिए तमगे बटोरने में भूखा नहीं था। विदेश मंत्रालय का कभी यह काम ही नहीं रहा जो वह प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा के लिए भीड़ के प्रबंध करे। दूतावासों का काम विदेशी नेता के साथ मेल मुलाकात, लॉबिंग, एजेंडा में राजनयिक भागदौड़, कूटनीतिक फोकस, सौम्यता, भाषाई तौर-तरीकों की बजाय यात्रा को इवेंट बनाने का कतई नहीं होता था। राजदूत लोग प्रधानमंत्री के आगे भीड़ बनवा कर उन्हें खुश करने की विदेश नीति नहीं खेलते थे। या देशहित की बजाय प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय सम्मान दिलवाने, उनका वैयक्तिक रूतबा दिखलाने जैसा तब कोई एजेंडा नहीं था।

मेरी स्मृतियों में विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह से लेकर जसवंत सिंह, नटवर सिंह, सलमान खुर्शीद आदि कई चेहरों की भाव-भंगिमा, उनके खास कूटनीतिक कौशल, भाषण तथा विदेश मंत्रालय की सक्रियताएं याद हैं। श्यामनंदन मिश्र जैसे देशज विदेश मंत्री से भी मेरी गपशप रही है लेकिन पिछले ग्यारह वर्षों में जो हुआ है उसका एक ही अर्थ है और वह विदेश मंत्रालय का भी एक खोखे में बदल जाना है। अर्थात बाकी सब काम हो लेकिन भारत के राष्ट्रीय हितों की असल राजनयिकता, कूटनीति नहीं हुई।

ग्यारह वर्षों में प्रधानमंत्री मोदी, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल, विदेश मंत्री जयशंकर ने वह सब किया जो उनके निजी खोखलेपन व शिक्षा से होना था। इन्होंने सुरक्षा, भूराजनीति, सामरिक रणनीति, राष्ट्रहित में दीर्घकालीन सूझबूझ का एक भी ऐसा काम नहीं किया, जिससे वैश्विक शक्तियों, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति-राजनीति, सामरिक बंदोबस्तों की काबलियत का भारत का झंडा विश्व राजधानियों में, ओबामा-बाइडेन-ट्रंप (मैंने नरसिंह राव के समय, जसवंत सिंह के समय प्रभावी कूटनीति और उसका प्रभाव देखा था) या पुतिन या शी जिनफिंग जैसे विश्व नेता के यहां आस्था का बिंदु बना हो। कहीं वह अपनापन नहीं बना जिससे विश्व नेता भारत के लिए दूसरे देशों में संजीदगी से लॉबिंग करते (मनमोहन सिंह के समय एटमी करार के लिए राष्ट्रपति बुश ने ऐसी संजीदगी दिखाई थी)।

तब ग्यारह वर्षों में क्या हुआ? भारत की विदेश नीति का एकमेव मकसद भारत में लोगों को बहकाने, उल्लू बनाने का औजार बनना था। वैसे ही राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल ने खालिस पुलिसिया अंदाज में बिना दीर्घकालिक सिनेरियो के कनाड़ा, अमेरिका, पाकिस्तान में ऐसे ऑपरेशन रचवाए, जिससे भारत को लेने के देने पड़े हैं। बतौर करियरलिस्ट-नौकरशाह विदेश मंत्री जयशंकर ने वह बड़बोलापन हांका कि अब डोनाल्ड ट्रंप ने सबकी बोलती बंद कर दी है। जरा जवाब में विदेश मंत्री और विदेश मंत्रालय बोल कर बताए कि रूस हमारा स्थायी दोस्त है और उसके साथ हम जीएंगें, मरेंगे! ट्रंप ने बोला फिर पाकिस्तान से करार किया तो इतना भी कहने की हिम्मत नहीं कि आतंकवाद पोषक पाकिस्तान के साथ तेल उत्खलन का अमेरिका का समझौता या ट्रंप का कहा अफसोसजनक है!

असल दिक्कत प्रधानमंत्री की इस सोच, इस अंहकार की है कि जैसे घर में मोहन भागवत, राहुल गांधी आदि सब पप्पू हैं और मैं क्योंकि सर्वज्ञ हूं तो विश्व नेताओं को झूला झुलाकर, पकौड़े खा कर, उनके गले लग कर पटाना उनका बाएं हाथ का काम है। इसे इस उदहारण से समझें कि जसवंत सिंह जैसे कूटनीतिज्ञ अंदाज या मनमोहन सिंह अपनी विद्वता-मौन की भाषा से विश्व नेताओं में सम्मान पाते थे वैसा कुछ भी प्रधानमंत्री मोदी के पास नहीं है। कल्पना करें कि पाकिस्तान के जनरल मुनीर ने लंच पर बात करते हुए ट्रंप को कैसा फील कराया होगा वही मोदी के साथ मुलाकातों-बातों की उन पर क्या छाप पड़ी होगी!

प्रधानमंत्री अंग्रेजी में अपने को व्यक्त नहीं कर सकते तो सौम्य हिंदी से दुभाषिए के जरिए सौम्य-सहज संवाद (जैसे चीन के हर नेता, कूटनीतिज्ञ ने, विदेश मंत्रलाय ने अपने को ढाला हुआ है जबकि मोदी जरूरत के बावजूद विदेश मंत्रालय का ऐसा हिंदीकरण रत्ती भर नहीं किया है) भी नहीं कर सकते। मुझे लगता था कि इस काम के लिए, ट्रंप जैसे धंधेबाज को पटाए रखने के लिए उन्होने अंबानी-अडानी की ड्यूटी लगाई हुई होगी। लेकिन ट्रंप ने तो भंडाफोड़ कर डाला। वे 10 मई के बाद से जिस भाषा और अंदाज में दुनिया में भारत को खोखला बतलाते हुए है उससे साफ लगता है कि ट्रंप सहित तमाम विश्व नेताओं के यहां ऑपरेशन सिंदूर के अनुभव के बाद भारत को केवल इस प्राथमिकता में कोष्ठक में रख जिया है कि भारत महज एक बाजार है। उसकी शक्ति ‘डेड’ है।

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